केरल जैसे अत्यधिक साक्षर राज्य में भी विधायी प्रतिनिधित्व काफी विविध है। जहाँ ई. के. विजयन जैसे जमीनी नेता केवल 5वीं पास हैं, वहीं विधानसभा में डॉ. आर. बिंदु और डॉ. मैथ्यू कुझालनदन जैसे उच्च शिक्षित पीएचडी धारक भी शामिल हैं।
भारतीय संसदीय प्रणाली में किसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता इसलिए नहीं रखी गई ताकि समाज के हर वर्ग (गरीब, वंचित और कम शिक्षित) की आवाज दब न जाए।
राजनीति में केवल डिग्री सफलता की गारंटी नहीं है। एक सफल नेता वही माना जाता है जो समस्याओं की जड़ों तक पहुँच सके और उनके निदान के लिए नीति निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाए।
केरल में 9 अप्रैल 2026 को मतदान होना तय हुआ है। केरल की साक्षरता दर को लेकर पूरे देश में चर्चा किया जाता है। देश में सभी राज्यों में केरल सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य माना जाता है। इसी बीच केरल में जनप्रतिनिधियों के साक्षरता को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। केरल में 140 विधायकों में 132 विधायकों के हलफनामे के आधार पर साक्षरता को लेकर बहस तेज हो गई है।
ADR (Association for Democratic Reforms) रिपोर्ट के अनुसार, केरल में विधायकों की डिग्रियों को उजागर किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक केरल में एक विधायक ऐसे हैं जो सिर्फ 5 वीं तक पढ़ाई किये हैं। ई. के. विजयन (E. K. Vijayan) ने बताया है कि उनकी पढ़ाई केवल 5 वीं तक हुई है। ई. के. विजयन (E. K. Vijayan) केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हैं और साल 2021 के चुनाव में नादापुरम (Nadapuram) विधानसभा सीट से विधायक चुने गए।
वहीं 16 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने सिर्फ 12 वीं तक पढ़ाई की है। 32 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने स्नातक पूर्ण किया है। इसके अलावा 22 विधायकों ने परास्नातक की डिग्री हासिल किया है। हैरानी की बात है कि सिर्फ 4 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने पीएचडी किया है।
डॉ. आर. बिंदु (Dr. R. Bindu) सीपीआईएम की नेता हैं और केरल में इरिनजालकुडा (Irinjalakuda) से विधायक हैं। इन्होंने अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी किया है। साल 2021 में जीतने के बाद केरल सरकार में उच्च शिक्षा और सामाजिक न्याय मंत्री बने।
डॉ. के. टी. जलील (Dr. K. T. Jaleel) साल 2021 में केरल के तवनूर (Thavanur) से विधायक चुने गए थे। निर्दलीय विधायक चुने जाने में केरल में एलडीएफ का हाथ रहा अर्थात एल डी एफ के समर्थन से विधायक चुने गए थे। इन्होंने कालीकट विश्वविद्यालय (University of Calicut) से इतिहास विषय में पीएचडी किया है।
इसके अलावा डॉ. मैथ्यू कुझालनदन (Dr. Mathew Kuzhalnadan) ने केरल के मुवत्तुपुझा (Muvattupuzha) से काँग्रेस पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से क्षेत्रीय व्यापार समझौते (Regional Trade Agreements) टॉपिक पर अपनी पीएचडी साल 2014 में पूर्ण की है।
वहीं इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के नेता डॉ. एम. के. मुनीर (Dr. M. K. Muneer) हैं। इन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई कालीकट मेडिकल कॉलेज से किया है। साल 2021 में केरल के कोडुवल्ली (Koduvally) से विधायकी का चुनाव जीत चुके हैं।
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भारत में संसद (विशेषकर लोकसभा) या विधान सभा का सदस्य बनने के लिए किसी भी प्रकार के शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं है। यह इसलिए किया गया है ताकि प्रतिनिधित्व के सवाल को दबाया न जा सके। संसदीय परंपरा में पहचान आधारित संस्कृति और परंपराओं (Identity-based culture and traditions) को सुरक्षित रखने के लिए हर क्षेत्र से प्रतिनिधि लेने की कोशिश की जाती है ताकि हर किसी की बात संसद के बीच में आ सके और उनके मांग के अनुरूप नीतियों का निर्माण हो सके।
परंतु यदा कदा यह काफी हानिकारक भी साबित हो जाता है। जनप्रतिनिधि के निरक्षर होने से या समझदार नहीं होने से बहुत सारी चूक सामने आ जाती हैं। राजनीति में जनता के समस्याओं से रूबरू होने वाला तथा उन समस्याओं के निदान पर विचार करने वाला जनप्रतिनिधि सही माना जाता है, इसलिए कभी-कभी यह मायने नहीं रखता कि उसने किस विषय में पढ़ाई की है। अच्छे डिग्रीधारियों को भारतीय राजनीति में बहुत अच्छे से परखा जा रहा है, कई बार ऐसा हुआ है कि बहुत अच्छा डिग्रीधारी जनप्रतिनिधि, एक सफल जनप्रतिनिधि नहीं बन पाता है क्योंकि वह समस्याओं की जड़ों तक नहीं पहुँच पता है।
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