

चुनाव आयोग ने 15 मार्च 2026 को पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल फूंक दिया है, जिसमें 9 अप्रैल 2026 को केरल, असम और पुडुचेरी में एक ही चरण में मतदान होना है। इस चुनावी गहमागहमी के बीच ADR की रिपोर्ट ने केरल के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
ADR रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, केरल के 132 विधायकों में से लगभग 70% आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं। इनमें से 25% पर गंभीर मामले दर्ज हैं, जबकि 3 विधायक महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे शर्मनाक मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
अपराधियों के लिए राजनीति एक सुरक्षित पनाहगाह बन गई है, जहाँ सफेद कुर्ते की आड़ में वे कानून बनाने वाली संस्थाओं का हिस्सा बनकर लोकतांत्रिक मूल्यों और सुरक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं।
देश के पांच राज्यों में साल 2026 में चुनाव की घोषणा 15 मार्च 2026 को चुनाव आयोग ने कर दी है। असम केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में मतदान होना सुनिश्चित हुआ है।
सभी दलों ने चुनावी रणभूमि में अपना अपना मुद्दा थाम रखा है। इसी बीच एडीआर ने अपनी रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाली खबर सामने आई है। चुनाव में सभी नेता जनता का विश्वास जीतने के लिए अलग-अलग हथकंडा अपना रखा है। केरल में ADR की रिपोर्ट को सही तरीके से देखा जाए तो यही समझ आता है कि आधे से अधिक नेता भ्रष्ट और बाहुबली छवि वाले नेता हैं।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट ने सबको चकाचौंध कर दिया है। रिपोर्ट में केरल के नताओं की आपराधिक मामलों की कलई खुल गई है। रिपोर्ट के मुताबिक केरल में 132 विधायक हैं और इसमें से लगभग 70 फीसद ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की घोषणा की है। 25 फीसद अर्थात 33 ऐसे नेता हैं, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक रिकार्ड पाया गया है। वहीं लगभग 92 नेता ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज है। तीन विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ महिलाओं से रेप के मामले में मुकदमा चल रहा है।
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अगर दलगत आंकड़ों की बात की जाए तो सीपीआईएम (CPI-M) के 74 फीसदी नेताओं पर आपराधिक मुकदमा दर्ज है। लगभग 58 में से 43 विधायकों पर इस तरीके के मामले चल रहे हैं। वहीं कांग्रेस में लगभग 90 फीसदी नेताओं पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। कांग्रेस के 21 में से 19 विधायक ऐसे हैं जो दागदार पाए गए हैं।
सीपीआई (CPI) में लगभग 44 फीसद विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। ये आँकड़े सिर्फ आँकड़े नहीं हैं बल्कि इससे यह भी उजागर होता है कि शासन में अपराधी किस्म के नताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इन आंकड़ों से शासन के असलियत का अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीति भविष्य में अपराध की गुलामी करते नजर आ सकती है।
दरअसल,भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) में यह परंपरा काफी समय से चली आ रही है। चुनाव में सफलता हासिल करने के लिए राजनीतिक पार्टियां अपराधियों का सहारा लेती हैं। नेताओं का माफियाओं के साथ गठबंधन करके वोट लेने की परंपरा, भारत के लोकतंत्र को दीमक की तरह खाकर खत्म कर रही है।
यही कारण है कि सुरक्षा का वादा करने वाली सरकार स्वयं असुरक्षित हो जाती है। अपराधियों के पास अपने आपको बचाने का सबसे आसान तरीका होता है कि वे राजनेताओं के शरण में चले जाते हैं। जिस विधान से अपराध को खत्म करने की बात की जाती है, उसी विधिनिर्माता के शरण में अपराधी चले जाते हैं। एक अच्छी और सुरक्षित पनाह मिलने के बाद अपराधी खुद ही सरकार का हिस्सा बन जाते हैं और सरकार के मूल उद्देश्यों का सर्वनाश हो जाता है।
अपराध के तमाम मामलों को ढकने के लिए राजनीति का एक सफेद कुर्ता काफी होता है। राजनीतिक मूल्यों के पतन में, ‘राजनीति में अपराध को बढ़ावा’ एक बहुत बड़ा कारण है।
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