मध्य प्रदेश (नीमच, मंदसौर, रतलाम) के बाँछड़ा समुदाय में घर की बड़ी बेटी को देह व्यापार में धकेलना एक सामाजिक परंपराबन गया है। यहाँ परिवार की सहमति से बेटियाँ सड़क किनारे देह व्यापार के जरिए घर की रोजी-रोटी चलाती हैं। AI Generated
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भारत का वो समुदाय जहां बड़ी बेटी को करना पड़ता है देह व्यापार, अजीब सी परंपरा जानकर रह जाएंगे हैरान

मध्य प्रदेश (नीमच, मंदसौर, रतलाम) के बाँछड़ा समुदाय में घर की बड़ी बेटी को देह व्यापार में धकेलना एक सामाजिक परंपराबन गया है। यहाँ परिवार की सहमति से बेटियाँ सड़क किनारे देह व्यापार के जरिए घर की रोजी-रोटी चलाती हैं।

Author : Pradeep Yadav

  • मध्य प्रदेश (नीमच, मंदसौर, रतलाम) के बाँछड़ा समुदाय में घर की बड़ी बेटी को देह व्यापार में धकेलना एक सामाजिक 'परंपरा' बन गया है। यहाँ परिवार की सहमति से बेटियाँ सड़क किनारे देह व्यापार के जरिए घर की रोजी-रोटी चलाती हैं।

  • इस समुदाय में विवाह की प्रथा भी अलग है, जहाँ दूल्हे को दुल्हन के परिवार को भारी दहेज देना पड़ता है।

  • बाँछड़ा समुदाय के इस दलदल में फँसे होने का मुख्य कारण उनका घुमंतू इतिहास, भीषण गरीबी और शिक्षा का अभाव है। सरकारी योजनाओं का इन समुदायों तक न पहुँच पाना इन्हें विकास की मुख्यधारा से दूर रखता है।

देह व्यापार भारत में एक अनकही सच्चाई है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में देह व्यापार को लेकर समय-समय पर स्थानीय पुलिस के छापे भी पड़ते हैं, परंतु इस व्यापार का प्रचलन बरकरार है। प्रायः ये समझा जाता है कि इस तरीके के धंधे में जो शामिल होते हैं उनकी अपनी मजबूरी होती है। लेकिन यह जानकर हैरानी हो जाती है, जब परिवार में यह प्रथा हो कि बेटी का देह व्यापार करवाना है। असल में मध्य प्रदेश और राजस्थान के इलाकों में कुछ समुदाय ऐसे हैं जहां परिवार ही बेटी के देह व्यापार को प्रचारित करता है।

संस्कृति का हिस्सा है देह व्यापार !

दरअसल,  मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के नीमच, मंदसौर और रतलाम (Neemuch, Mandsaur and Ratlam) ऐसे जिले हैं जहां सड़क के किनारे बाँछड़ा समुदाय जीवनयापन करते दिखाई पड़ते हैं। बाँछड़ा समुदाय में घर की बड़ी बेटी को देह व्यापार (Prostitution) के लिए, परिवार स्वयं सहमति देता है। बहुत सारे ट्रक वाले एवं अन्य आगंतुक इस इलाके से गुजरते हुए अपने ट्रक को रात के समय में रोककर इन इलाकों में आराम करते हैं। यहीं रात में देह व्यापार का असली खेल शुरू होता है। परिवार की बड़ी बेटी को शारीरिक संबंध बनाने के लिए परिवार वाले खुद बोलते हैं। यह सिलसिला सिर्फ एक घर में नहीं बल्कि बाँछड़ा समुदाय के लगभग हर उस घर में चलता है जो सड़क के किनारे रहते हैं। 

समुदाय के लोग स्वयं बताते हैं कि यह उनके संस्कृति का हिस्सा है कि बड़ी कन्या से देह व्यापार कराकर घर की रोजी रोटी चलाया जाए। 

लड़कियों को मिलता है दहेज !

भारत में प्रायः समझा जाता है कि दहेज केवल लड़का पक्ष को मिलता है, लेकिन बाँछड़ा समुदाय की संस्कृति में इससे उलट कहानी है। कोई भी शख्स जो बाँछड़ा समुदाय की लड़की शादी करना चाहता है तो उसे पहले लड़की के घर वालों को एक महंगी रकम चुकानी पड़ती है।

सामान्य तौर पर यही प्रचलित है कि लगभग 15 लाख रुपए लड़की के घर में देने देने पर लड़की से शादी हो जाती है। यह प्रथा बड़ा अजीब है लेकिन बाँछड़ा समुदाय में ऐसा ही होता है। एक तरफ जहां अन्य घरों में लड़की होने पर मायूसी होती है, वहीं बाँछड़ा समुदाय में लड़की पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है। यह इसलिए होता है कि लड़की जवान होगी तो कमाई का जरिया बनेगी। जिस्मफरोशी के धंधे की आग में बेटी को डालकर पैसा कमाना यहाँ का रीति रिवाज है। 

गहरे संदेह को जन्म देता है यह इलाका 

प्रायः ये समझा जाता है कि जो लड़कियां देह व्यापार में संलिप्त होती हैं, उनको परिवार की तरफ से कहा जाता है। लेकिन कभी–कभी कहानी इससे उलट समझ आती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यहाँ पर कुछ लड़कियों को किडनैप करके लाया जाता है और उन्हें इस तरीके के देह व्यापार के कुचक्र का हिस्सा बना दिया जाता है।

बाँछड़ा समुदाय की संस्कृति (Culture of the Banchhada community) का यह हिस्सा है, ऐसा समझकर कोई विशेष जांच पड़ताल नहीं हो पाता है। मंदसौर में सितामऊ फाटक के पास में बाल सुधार गृह में कार्यरत शख्स का कहना है कि बाँछड़ा समुदाय को आधार बनाकर लड़कियों के देह व्यापार (Prostitution) के काले धंधे को सफल बनाया जाता है। 

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इतने पिछड़ेपन का क्या है कारण ?

दरअसल, बाँछड़ा समुदाय पहले घुमंतू समुदाय था। यहाँ के लोगों तक सरकारी योजनाएं बहुत मुश्किल से ही पहुँच पाती हैं। शिक्षा का अभाव और गरीबी की भरमार से इस समुदाय के लोग विकास की मुख्यधारा से कटते चले गए।

सरकारों की योजनाएं इन समुदायों के दलहलीज तक पहुँचने में दम तोड़ देती हैं। यही कारण है कि इस समुदाय के लोग सड़क के किनारे रात के अंधेरे में अपने जीवनयापन का आधार ढूंढते है। कुछ न मिलने पर शरीर को जीवित रखने के लिए शरीर को ही धंधे का माध्यम बना देते हैं। 

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