

पश्चिम बंगाल के 22वें राज्यपाल के रूप में आर. एन. रवि को शपथ दिलाने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल पहुंचे। इस दौरान उनका लाल-हरे रोब और औपनिवेशिक शैली का विग लोगों का ध्यान खींचने लगा।
कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थापना 1862 में हुई थी। उस समय ब्रिटिश परंपरा के अनुसार जजों के लिए सिल्क गाउन, स्कारलेट रोब, विंग कॉलर और सफेद नेक-बैंड जैसे विशेष पहनावे तय किए गए थे, ताकि जज सामान्य लोगों से अलग और न्याय की गरिमा के प्रतीक स्वरूप दिखें।
आजादी के बाद कई ब्रिटिश परंपराएं हटाई गईं, लेकिन कुछ न्यायालयों में अब भी बनी हुई हैं। एडवोकेट्स एक्ट 1961 के तहत कोर्ट में काला कोट और सफेद बैंड अनिवार्य हैं, जबकि विग अब वैकल्पिक है। खास अवसरों पर कलकत्ता हाई कोर्ट में आज भी पारंपरिक ब्रिटिश शैली का रोब और विग पहना जाता है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में नए राज्यपाल की नियुक्ति हुई है। राज्यपाल को कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने शपथ दिलाई। इसी बीच जज साहब के पहनावे ने सबका ध्यान खींच लिया है। लोगों के मन में यह सवाल है कि इस तरीके के पहनावे का प्रचलन कहाँ से और कैसे शुरू हुआ, इसकी चर्चा आगे की जा रही है।
आर. एन. रवि पश्चिम बंगाल के 22वें गवर्नर के रूप में नियुक्त किए गए हैं। राज्यपाल को शपथ दिलाने की जिम्मेदारी संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की होती है। इसी नियम का अनुपालन करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल (Justice Sujoy Paul) राज्यपाल को शपथ दिलाने लोकभवन पहुंचे थे। इसी बीच न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल के पहनावे ने सबका ध्यान खींच लिया। दरअसल, न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल ने हरे लाल रंग का रोब और उसके साथ औपनिवेशिक-शैली का कोर्ट विग पहना हुआ था। इस तरीके का यूनिफॉर्म पुराने ब्रिटिश काल को स्मरण दिला गया।
दरअसल, कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थापना 1 जुलाई, 1862 में हुई थी। उस समय ब्रिटेन (Britain) के कोर्ट में जज के पहनावे का जो प्रचलन था, उसी प्रचलन को ब्रिटिश भरतीय कोर्ट में लागू किया गया था। जानकारी के मुताबिक भारत में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के तहत जजों के पहनावे को औपचारिक रूप दिया गया।
नियम के मुताबिक जजों को और वरिष्ठ वकीलों के पहनावे को निर्धारित किया गया कि जज सिल्क गाउन (Silk Gown), लाल रंग के रोब (Scarlet Robes), विंग कॉलर (Wing Collar), सफेद नेक-बैंड (White Bands) इत्यादि धारण करेंगे। जज के इस तरीके के पहनावे को निर्धारित करने के पीछे का उद्देश्य यह था कि जज सामान्य लोगों से अलग है और उसे दैवीय रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई थी।
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1947 में भारत की आजादी के साथ बहुत सारे ब्रिटिश परंपराओं को हटाया गया। न्यायालयों में बहुत सारे ब्रिटिश परंपराओं को जीवित रखा गया है। इसी क्रम में आज भी यह परंपरा जीवित है कि जज विशेष अवसरों पर इस तरीके के पहनावे के साथ सार्वजनिक समारोहों में शरीक होते हैं। एडवोकेट्स एक्ट 1961 के तहत भारत में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को यह शक्ति दी गई, कोर्ट में ड्रेस के नियम का निर्माण BCI ही करेगा।
इसके तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि कोर्ट में काले कोट और सफेद बैंड को पहनकर ही आना है। वहीं विग (Wig) की अनिवार्यता को स्वैच्छिकता में बदल दिया गया और नियम के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में गाउन को बहस के दौरान पहनने की अनिवार्यता को बरकरार रखा गया। जिला न्यायालयों में इसके लिए छूट दी गई है।
सबके अलावा कलकत्ता उच्च न्यायालय में ब्रिटिश परंपराओं को आज भी जीवित रखा गया है। इसलिए विशेष अवसरों पर कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) के जज पुराने ब्रिटिश काल के यूनिफॉर्म में दिखाई देते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे कोर्ट की निष्पक्षता बरकरार रहती है। विग और रोब को पहनना आज भी निष्पक्षता और न्याय की गरिमा के रूप में देखा जाता है। विग और रोब पहनने से जज की व्यक्तिगत पहचान छुपाने का प्रयास किया जाता है जिससे वह न्याय की मूर्ति के समान दिखे। जज की असल में यही पहचान मानी जाती है।
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