यहूदी धर्म का मानना है कि एक गैर-यहूदी व्यक्ति भी एक अच्छा इंसान बनकर ईश्वर के रास्ते पर चल सकता है। इसीलिए वे सक्रिय रूप से धर्म परिवर्तन नहीं कराते और इच्छुक व्यक्ति को भी रब्बी (धर्मगुरु) द्वारा तीन बार मना करने की परंपरा है।  AI Generated
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धर्मांतरण से दूरी क्यों रखते हैं यहूदी? वजह जानकर बदल जाएगी सोच

यहूदी धर्म का मानना है कि एक गैर-यहूदी व्यक्ति भी एक अच्छा इंसान बनकर ईश्वर के रास्ते पर चल सकता है। इसीलिए वे सक्रिय रूप से धर्म परिवर्तन नहीं कराते और इच्छुक व्यक्ति को भी रब्बी (धर्मगुरु) द्वारा तीन बार मना करने की परंपरा है।

Author : Pradeep Yadav

  • यहूदी धर्म का मानना है कि एक गैर-यहूदी व्यक्ति भी एक अच्छा इंसान बनकर ईश्वर के रास्ते पर चल सकता है। इसीलिए वे सक्रिय रूप से धर्म परिवर्तन नहीं कराते और इच्छुक व्यक्ति को भी रब्बी (धर्मगुरु) द्वारा तीन बार मना करने की परंपरा है।

  • यहूदियों और मुसलमानों के बीच विवाद की मुख्य जड़ यरूशलेम का एक ही पवित्र स्थल है। यहूदियों के लिए यह टेंपल माउंटऔर वेस्टर्न वॉल है, जबकि मुसलमानों के लिए यह अल-अक्सा मस्जिद है।

  • 1948 में इजरायल के गठन के बाद से ही संघर्ष जारी है। जहाँ इजरायल इसे अपना ऐतिहासिक अधिकार और सुरक्षित आश्रय मानता है, वहीं अरब देश और फिलिस्तीन इसे अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप मानते हैं।

पूरी दुनिया में इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष का असर देखने को मिल रहा है। इजरायल में ज्यादा संख्या यहूदियों की है। लेकिन पूरी दुनिया में यहूदियों की संख्या काफी कम है। ईसाइयों और मुसलमानों की तुलना में यहूदियों की संख्या बहुत कम है। इतना कम होने के बावजूद यहूदी लोग धर्म परिवर्तन में विश्वास नहीं करते हैं इसके पीछे बहुत बड़ा कारण है।

क्यों नहीं मानते धर्म परिवर्तन को यहूदी 

दुनिया के हर धर्म में लगभग यह प्रथा प्रचलित है कि धर्मांतरण (Religious conversion) कराकर लोगों को अपने धर्म में शामिल करना। धर्मांतरण आज के समय में जब एक विवादित विषय बना हुआ है, ऐसे समय में यह सवाल उठ रहे हैं कि यहूदी धर्म में धर्मांतरण को इतनी तवज्जो क्यों नहीं दी जाती है। दरअसल, यहूदी धर्म में यह मान्यता है कि किसी भी धर्म में जन्म लेने वाले शख्स के पास ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करने के अपने तरीके होते हैं।

उनका मानना है कि दुनिया में अगर इतने धर्म (Religion) बने है तो इसका मतलब है कि दुनिया को अलग-अलग धर्मों की आवश्यकता है। यहूदी धर्म में टोरा के अनुसार, यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर को पाने के अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं। यहूदी धर्म के अनुसार, सत्य किसी प्रतियोगिता की मोहताज नहीं होती है। उनके अनुसार जो लोग यहूदी नहीं हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि वे गलत हैं। भले ही वह यहूदी न हो लेकिन एक अच्छा इंसान बनकर भी ईश्वर के रास्ते पर चल सकता है, किसी भी धर्म को मान सकता है। 

परंपरा यह है कि अगर कोई शख्स यहूदी धर्म स्वीकार करने की इच्छा जाहिर करता है तो रब्बी जो कि यहूदी धर्मगुरु होते हैं, कम से कम तीन बार उस शख्स को मना करते हैं। 

यहूदियों और मुसलमानों का विवाद 

यहूदी लोग और मुसलमानों (Jewish people and Muslims) में के बीच एक समानता यह है कि दोनों हजरत इब्राहिम को अपना पूर्वज मानते हैं। लेकिन दोनों के बीच सबसे बड़ा विवाद यरूशलेम को लेकर है। यहूदी लोगों का मानना है कि यहां पर उनके राजा सुलेमान ने सबसे पहला मंदिर टेंपल माउंट बनवाया था। इस मंदिर को बेबीलोन के राजा नबूकदनेज्जर द्वितीय ने लगभग 586 ई पू नष्ट कर दिया था। इसके बाद यहूदियों को बहुत सालों तक कैद में रखा गया था। इसी टूटे मंदिर की मरम्मत बाद में करवाया गया था। इसके बाद फारस के राजा सायरस ने 539 ईसा पूर्व (BCE) में बेबीलोन को जीतने के बाद यहूदियों को आजाद किया । मंदिर लगभग 516 ईसा पूर्व (BCE)  में फिर से बनाई गई लेकिन रोमनों द्वारा पुनः नष्ट कर दिया गया।

इसी नष्ट मंदिर का एक हिस्सा है जिसे वेस्टर्न वॉल (Western Wall) कहा जाता है। यहाँ पर यहूदी आकर प्रार्थना करते हैं। यह स्थल आज भी पूरे धरती पर यहूदियों के लिए सबसे पवित्र जगह है। 

इसी जगह पर मुसलमानों के अल-अक्सा मस्जिद है। मुसलमानों का मानना है कि इस जगह से हजरत मोहम्मद ने स्वर्ग की यात्रा की थी। मुसलमानों के लिए यह जगह मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र जगह माना जाता है। 

इस जगह को  लेकर दोनों में समय-समय पर विवाद भी होता रहता है। साल 1967 में छह दिवसीय युद्ध हुआ था जिसमें एक तरफ इजरायल था तो दूसरी तरफ इराक सीरिया और जार्डन था। इस युद्ध में इजरायल ने पूर्वी यरूशलेम पर अपना कब्जा कर लिया। इसके बाद समझौता हुआ। 

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इजरायल से राष्ट्रीय अस्मिता पर विवाद 

दरअसल, साल 1948 में इजरायल (Israel) एक राष्ट्र बनकर दुनिया के बीच आया। लेकिन इस्लामी देशों ने इसको स्वीकार नहीं किया। फिलिस्तीन का मानना है कि यह उसके संप्रभुता पर बाहरी और अनावश्यक हस्तक्षेप है वहीं इजरायल का मानना है कि यह उनके खोया हुआ अधिकार है जिसे उन्होंने दोबारा हासिल की है।  

इतना सब कुछ होने के बावजूद यहूदियों (Jewish) ने धर्म परिवर्तन (Religious conversion) का रास्ता नहीं चुना और धर्म परिवर्तन को अपने धार्मिक प्रसार का हथियार नहीं बनाया।

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