

16 अगस्त 1946 को मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा घोषित ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के बाद कोलकाता में भयानक सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई, जिसने पूरे शहर को दंगों की आग में झोंक दिया।
दंगों में हजारों लोग मारे गए, हजारों घायल हुए और करीब एक लाख लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। कई इलाकों में घरों और दुकानों को जला दिया गया।
इस भीषण हिंसा ने हिंदू-मुस्लिम तनाव को चरम पर पहुंचा दिया और बाद में भारत के विभाजन की प्रक्रिया को और तेज कर दिया।
कहते हैं, "नरसंहार की आग में सिर्फ घर नहीं जलते, पूरी इंसानियत राख हो जाती है।" आज जिस कहानी का हम जिक्र कर रहे हैं, वो भारत की आज़ादी से पहले की दास्तां है। ये कहानी आज से करीब 80 साल पुरानी है, जब कलकत्ता की गलियां खून से लाल हो गईं थीं। महज 72 घंटों के भीतर 5 हज़ार से ज्यादा लोग मारे गए और एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए।
हिंदू-मुस्लिम के बीच हुए इस दंगे में हज़ार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गँवाई। कई रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 20000 से ऊपर का है। इस घटना को 'ग्रेट कलकत्ता किलिंग' भी कहा जाता है। रमजान का महीना चल रहा था और इस दौरान कलकत्ता खून से लाल हो गया था। क्या है पूरी कहानी, आइये इसे समझते हैं।
यह घटना 16 अगस्त 1946 की है। भारत की आज़ादी से ठीक एक साल पहले की दास्ताँ। रमजान का महीना चल रहा था और इसी दौरान पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' की घोषणा की और चारों तरफ कत्लेआम मच गया। इस दिन जो कुछ भी हुआ, वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। भारत की आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस और भारतीय मुस्लिम लीग साथ-साथ थे लेकिन जैसे-जैसे आज़ादी की तारीख नजदीक आ रही थी, दोनों पार्टियों के बीच मतभेद के साथ मनभेद भी शुरू हो गए। जिन्ना ने 1940 में लाहौर प्रस्ताव रखा। इसके बाद से ही मुसलमानों ने अलग राज्य की मांग शुरू कर दी। उनके मुताबिक हिन्दू बाहुल्य राज्य में उनकी मांग कभी नहीं सुनी जाएगी।
ऐसे में एक ऐसा राज्य हो जहाँ सिर्फ मुसलमान रहें। यह मांग उन राज्यों से उठी थी, जहाँ मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी। बंगाल उनमें से एक था। हालांकि, उस समय तक देश का बंटवारा कर पाकिस्तान बनाने की बात शुरू नहीं हुई थी। जिन्ना के इस प्रस्ताव का महात्मा गाँधी ने कड़ा विरोध किया था। उनका कहना था कि हिंदू और मुस्लिम भाई-भाई की तरह रहेंगे, अलग राज्य की कोई जरूरत नहीं है। वक्त बदलता गया और 1946 आ गया। इस बदलते वक्त के साथ जिन्ना अपने मांग पर अडिग रहे और उनकी यह मांग जिद में तब्दील हो गई जिसके बाद साल 1946 में मुसलामानों ने एक अलग देश पाकिस्तान की मांग उठा दी।
साल 1946 में क्लिमेंट एटली के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने ब्रिटेन से 3 मंत्रियों का दल भारत भेजा ताकि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो पाए। इस दौरान ब्रिटेन के दल ने मुस्लिम लीग के अगल देश की मांग को ठुकरा दिया लेकिन उन्होंने भारत को चलाने के लिए एक तीन स्तरीय ढांचे का सुझाव दिया। ये ढांचा केंद्र सरकार, प्रांतों के समूह और अलग-अलग प्रांतों का था। उनका कहना था कि इन "प्रांतों के समूहों" में मुस्लिम लीग की मुस्लिम-बहुल इलाकों को अलग देश बनाने की मांग को पूरा किया जा सकता है। इसपर कांग्रेस और मुस्लिम लीग राजी भी हो गए थे।
हालांकि, इसके बाद 10 जुलाई 1946 को बम्बई (मुंबई) में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने एक बयान दिया जिसके बाद सारी चीजें बदल गईं। उन्होंने कहा कि पार्टी को कैबिनेट मिशन की योजना को संशोधित करने का अधिकार है, जिसपर मुस्लिम लीग के नेताओं का पारा चढ़ गया। उन्हें इस बात का डर था कि कहीं सत्ता हस्तांतरण के बाद भारत में जो सरकार बनेगी, वो हिन्दुओं का पक्ष लेना ना शुरू कर दे।
मुस्लिम लीग के नेताओं की बातें सुनकर जिन्ना ने भी हाँ में हाँ मिलाई और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की योजना को अस्वीकार कर दिया। साथ ही उन्होंने संविधान सभा के बहिष्कार का ऐलान भी किया। अगस्त 1946 तक मुस्लिम लीग और कांग्रेस के रिश्ते काफी ख़राब हो गए थे और इतने ख़राब की ये सुधारे भी नहीं जा सकते थे। आलम यह था कि मुस्लिम लीग की ओर से भारत के विभाजन की बात उठने लगी, जिसे गाँधी-नेहरू ने ख़ारिज कर दिया।
गाँधी-नेहरू ने जब पाकिस्तान के प्रस्ताव को ख़ारिज किया, तब मोहम्मद अली जिन्ना का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने कांग्रेस और गाँधी खुलेआम चेतावनी दी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिन्ना ने कहा था कि ''हम लड़ाई नहीं चाहते लेकिन अगर आप चाहते हैं, तो आपके प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं। भारत विभाजित होगा या फिर नष्ट हो जाएगा।''
अंत में जिन्ना ने एक बात और कही कि "16 अगस्त 1946 डायरेक्ट एक्शन डे होगा।'' इतना कहने के बाद उन्होंने बंबई में जुलाई के महीने में अपने घर पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी और उसमें कहा कि मुस्लिम लीग अपने मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क पाकिस्तान की तैयारी कर रही है। 16 अगस्त की तारीख ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ होगा। वैसे, उस दिन क्या होने वाला था, ये बात कोई भी नहीं जानता था। किसी को इसकी भनक तक नहीं थी।
16 अगस्त 1946 की तारीख जब आई, तो हमेशा की तरह सुबह सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलता गया, सांप्रादायिक हिंसक घटनाओं की खबरें आने लगीं। रमजान का महीना चल रहा था और दोपहर की नमाज के बाद माहौल पूरी तरह बदल गया। उस समय बंगाल एक मुस्लिम बहुल राज्य था। वहां 54% मुसलमान और 44% हिंदू आबादी थी।
ज्यादातर मुसलमान पूर्वी बंगाल में रहते थे, जो आज का बांग्लादेश है। वहीं, कोलकाता में 73% हिंदू और 23% मुसलमान थे। बंगाल के मस्जिदों में सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा भीड़ दिखी। इतनी भीड़ कहाँ से आई थी, ये कोई नहीं जानता था। ये भीड़ करीब 5 लाख की संख्या में थी, जिनके पास भारी मात्रा में हथियार थे।
इसके बाद हिन्दुओं को जमकर निशाना बनाया गया। राजा बाजार, केला बागान, कॉलेज स्ट्रीट, हैरिसन रोड और बर्राबाजार जैसे इलाकों में हिन्दुओं के घरों और दुकानों को जलाया गया। शाम होते-होते बंगाल में जहाँ-जहाँ दंगे हुए थे, वहां कर्फ्यू लगा दिया गया। उम्मीद थी 17 अगस्त की सुबह सब कुछ शांत हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 17 अगस्त की हिंसा कई गुना ज्यादा थी।
हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। कई सम्पतियों को भी जला दिया गया। इसके साथ ही कहा यह भी जाता है छोटे बच्चों को गर्म खौलते पानी में डाल दिया गया था। पूर्वी बंगाल के नोआखाली में भी हिन्दुओं के साथ भीषण नरसंहार हुआ था। जहाँ-जहाँ सैनिकों की तैनाती हुई, मामला काबू में आया लेकिन जहाँ सेना नहीं पहुँच पाया, वहां हालत बद से बदतर हो गए।
बंगाल में यह हिंसा करीब 7 दिन तक चली थी, यानी 22 अगस्त। कहा जाता है कि बंगाल में जो हिंसा हुई थी, इसके पीछे हुसैन सुहरावर्दी का भी हाथ था, जो उस समय बंगाली मुसलमानों के सबसे बड़े नेता थे और उस राज्य के मुख्यमंत्री भी थे। उन्होंने एक भड़काऊ भाषण दिया था, जिसके बाद यह हिंसा शुरू हुई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 16 अगस्त से एक हफ्ते पहले सुहरावर्दी ने एक जनसभा में कहा था कि न्होंने 'डायरेक्ट एक्शन डे' पर पुलिस को काबू में रखने के लिए प्लान तैयार कर रखा है।
बंगाल में जो हिंसा हुई थी, उसके बारे में ऐसा कहा जाता है कि करीब 6000 हिन्दुओं की मौत इसमें हुई थी और वो भी मात्र 72 घंटों के भीतर, लेकिन ये स्पष्ट आंकड़ा नहीं है। ये ज्यादा भी हो सकता है। इस हिंसा ने कई हिन्दुओं को कलकत्ता छोड़ने को मजबूर किया। इस दंगे में करीब 20,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए और लगभग एक लाख लोगों को अपना सबकुछ छोड़ना पड़ा।
अमेरिकी पत्रकार फिलिप टैलबॉट ने बंगाल की इस घटना पर अपनी नज़र बनाए रखी थी। उन्होंने ‘इंस्टीट्यूट ऑफ करंट वर्ल्ड अफेयर्स’ को एक पत्र में लिखा था कि प्रांतीय सरकार ने मरने वालों का आंकड़ा 750 बताया है लेकिन ये 7 से 10 हज़ार के बीच हो सकता है। 3500 लाश सामने आई है लेकिन हुगली नदी में कितने फेंके गए हैं या कितने बंद नालों में दम घुटने से मरे हैं, कितने ज़िंदा जलकर मरे हैं, कितनों का अंतिम सस्कार चुपचाप हुआ, ये कहना मुश्किल है।
तो ये थी कहानी बंगाल के नरसंहार की।