24 मार्च 2026 को हरीश राणा की मृत्यु दिल्ली एम्स में हो गई। हरीश को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत 11 मार्च 2026 मिला था। उनके परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार 25 मार्च 2026 को कर दिया है। X
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क्या होती है पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया, जिसकी वजह से हरीश राणा ने दुनिया को कहा अलविदा ?

24 मार्च 2026 को हरीश राणा की मृत्यु दिल्ली एम्स में हो गई। हरीश को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत 11 मार्च 2026 मिला था। उनके परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार 25 मार्च 2026 को कर दिया है।

Author : Pradeep Yadav

  • 24 मार्च 2026 को दिल्ली एम्स में हरीश राणा की मृत्यु हो गई।

  • हरीश को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत 11 मार्च 2026 मिला था।

  • भारत में केवल पैसिव यूथेनेसिया को सशर्त अनुमति है ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके। इसके विपरीत एक्टिव यूथेनेसिया अभी भी भारत में अपराध माना जाता है।

24 मार्च 2026 को हरीश राणा की मृत्यु दिल्ली एम्स में हो गई। हरीश पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे। हरीश को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत 11 मार्च 2026 मिला था। सुप्रीम कोर्ट के जज जे बी परदीवाला ने यह फैसला 11 मार्च 2026 को सुनाया था। उनके परिजनों ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा कई बार खटखटाया था। अब हरीश राणा नहीं रहे, उनके परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार 25 मार्च 2026 को कर दिया है।

कौन थे हरीश राणा ?

हरीश राणा के पिता अशोक राणा उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के रहने वाले हैं। हरीश साल 2013 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पंजाब गए थे। हरीश अपने पीजी के चौथी मंजिल से अचानक गिर गए थे। हरीश उस समय लगभग 20 साल के थे। बच्चे के इलाज हेतु माता-पिता ने अपने दिल्ली के घर को बेच दिया था। हरीश की हालत में बिल्कुल सुधार नहीं हुआ। माता-पिता की यह उम्मीद अब टूट रही थी कि बच्चे की हालत में सुधार हो सकता था। इसलिए उन्होंने हरीश के लिए पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत सुप्रीम कोर्ट से मांगी थी। हरीश फिलहाल दिल्ली एम्स में भर्ती थे।

क्या है यूथेनेसिया ?

यूथेनेसिया एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसके तहत किसी बीमारी या पीड़ा से जूझ रहे शख्स को मृत्यु दे दी जाति है। यूथेनेसिया दो प्रकार की होती है। एक है एक्टिव यूथेनेसिया, इसे सक्रिय इच्छामृत्यु भी कहते हैं।  इसमें किसी मरीज को डॉक्टर द्वारा सक्रिय रूप से कुछ किया जाता है जिससे मरीज की मौत हो सके, जैसे इंजेक्शन लगाना आदि। 

वहीं पैसिव यूथेनेसिया जिसका मतलब होता है निष्क्रिय इच्छामृत्यु। इसमें बीमार शख्स या मरीज के लाइफ सपोर्ट सिस्टम जैसे कि वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां इत्यादि रोक दी जाती हैं। आसान भाषा में कहें तो मरीज को जीवित रहने के लिए चलाए जा रहे दवाइयों को बंद कर दिया जाता है, या फिर वेंटिलेटर को हटा दिया जाता है, जिससे कि मरीज की प्राकृतिक मौत हो सके।

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भारत में वैध है पैसिव यूथेनेसिया ?

भारत में साल 2018 से पहले पैसिव यूथेनेसिया वैध नहीं था। लेकिन साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इसे सशर्त वैध माना। साल 2018 में 'कॉमन कॉज बनाम भारत संघ' (Common Cause vs Union of India) मामले में पाँच जजों की पीठ ने फैसला सुनाया। इस पीठ में जस्टिस दीपक मिश्रा (Justice Dipak Misra) जो कि पीठ के अध्यक्ष, जस्टिस ए.के. सीकरी (Justice A.K. Sikri), जस्टिस ए.एम. खानविलकर (Justice A.M. Khanwilkar), जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ (Justice D.Y. Chandrachud), जस्टिस अशोक भूषण (Justice Ashok bhushan) शामिल थे। 

पाँच जजों की पीठ ने अपने फैसले में बताया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार में, गरिमा के साथ मृत्यु को प्राप्त होने का अधिकार भी शामिल है। कोर्ट ने आगे बताया कि 18 वर्ष से ऊपर का शख्स अपने वसीयत में यह घोषणा कर सकता है कि भविष्य में उसके लाइलाज होने की स्थिति में उसे किसी भी प्रकार के मेडिकल लाइफ सपोर्ट के आधार पर जीवित न रखा जाए। इसी के साथ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई शख्स यह वसीयत नहीं कर पाता है और कोमा में चला जाता है तो फिर उसके घर वालों में से बेहद करीबी (जैसे माता-पिता) दो लोग कोर्ट में अपील कर सकते हैं। 

भारत में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु को ही कानूनी इजाजत है, किसी भी प्रकार से सक्रिय इच्छा मृत्यु को अपराध माना गया है।

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