कुत्ते की चेन से गला घोंटा, यौन उत्पीड़न हुआ...42 साल तक 'जिंदा लाश' बनकर रहीं अरुणा शॉनबाग, हरीश राणा की तरह नहीं मिली इच्छामृत्यु

27 नवंबर 1973 को केईएम अस्पताल के वार्ड बॉय सोहनलाल ने ड्यूटी खत्म कर कपड़े बदल रही नर्स अरुणा पर कुत्ते की जंजीर से हमला कर उनका गला घोंटा। इस हमले के कारण उनके मस्तिष्क को स्थायी क्षति पहुँची और वे अगले 42 वर्षों तक अस्पताल के बिस्तर पर अचेतन अवस्था में रहीं।
हरीश राणा और अरुणा शानबाग
27 नवंबर 1973 को केईएम अस्पताल के वार्ड बॉय सोहनलाल ने ड्यूटी खत्म कर कपड़े बदल रही नर्स अरुणा पर कुत्ते की जंजीर से हमला कर उनका गला घोंटा। इस हमले के कारण उनके मस्तिष्क को स्थायी क्षति पहुँची और वे अगले 42 वर्षों तक अस्पताल के बिस्तर पर अचेतन अवस्था में रहीं।X
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Summary
  • 27 नवंबर 1973 को केईएम अस्पताल के वार्ड बॉय सोहनलाल ने ड्यूटी खत्म कर कपड़े बदल रही नर्स अरुणा पर कुत्ते की जंजीर से हमला कर उनका गला घोंटा और बलात्कार किया। इस हमले के कारण उनके मस्तिष्क को स्थायी क्षति पहुँची और वे अगले 42 वर्षों तक अस्पताल के बिस्तर पर अचेतन अवस्था में रहीं।

  • अरुणा की शादी डॉ. संदीप सरदेसाई से होने वाली थी, लेकिन इस हादसे ने सब बदल दिया। आर्थिक तंगी के कारण जब सगे परिवार ने साथ छोड़ दिया, तब केईएम अस्पताल की नर्सों ने साथ दिया।

  • लेखिका पिंकी विरानी ने 2009 में अरुणा के लिए पैसिव यूथेनेसिया की मांग की, जिसे कोर्ट ने 2011 में खारिज कर दिया।

Summary

27 सितंबर 1973 किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल (King Edward Memorial Hospital) में शाम का वक्त था। अचानक सोहनलाल भरता वाल्मीकि ने एक महिला के ऊपर हमला किया, महिला घायल हो गई। सोहनलाल भरता वाल्मीकि (Sohanlal Bharta Valmiki) ने महिला का यौन उत्पीड़न किया। इस शैतानीयत हमले के कारण महिला लगभग 42 साल तक बेड पर पड़ी रही और अंत में 18 मई, 2015 को किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल (King Edward Memorial Hospital) में दम तोड़ दिया। इस महिला का नाम अरुणा शानबाग था जो जीवन और मृत्यु के बीच लगभग 42 साल तक फंसी रही। हरीश राणा को पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत सुप्रीम कोर्ट ने दे दी लेकिन अरुणा को पैसिव यूथएनेसिया की इजाजत नहीं मिली थी। 

कौन थी अरुणा शानबाग 

अरुणा शानबाग (Aruna Shanbaug) कर्नाटक की रहने वाली थी जो कि किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल (King Edward Memorial Hospital) में एक नर्स के तौर पर काम कर रही थी। जन्म 1 जून, 1948 को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में जन्मी अरुणा के घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। रामचंद्र शानबाग की बेटी अरुणा शानबाग ने  किसी तरीके से किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल (King Edward Memorial Hospital) में एक नर्स के तौर पर नौकरी ले ली थी। मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी अरुणा के कुल नौ भाई-बहन थे। संख्या के हिसाब से अरुणा का परिवार एक लंबा परिवार था। 

अचानक हमला हुआ और रेप का शिकार बनी अरुणा 

रोज की तरह अरुणा शाम के वक्त में बेसमेंट में ड्यूटी खत्म करके कपड़े चेंज करने के लिए बेसमेंट में गई थी। अचानक एक शख्स ने अरुणा के ऊपर किसी बड़े हथियार से हमला कर दिया अरुणा घायल हो गई। हमला करने वाले आदमी का नाम सोहनलाल भरता (Sohanlal Bharta) था। सोहनलाल अस्पताल में ही वार्ड बॉय (Ward Boy) था। उसने अरुणा का गला कुत्ते बांधने वाली जंजीर से घोंट दिया। इसके कारण अरुणा ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी। यह समय करीब 8 बजे रात का था। सुबह तक अरुणा का शरीर खून से लथपथ था। अरुणा को अस्पताल में भर्ती किया गया और इलाज शुरू हुआ। 

शादी होने वाली थी अरुणा की 

जब अरुणा के ऊपर हमला हुआ उस वक्त तक अरुणा की सगाई हो चुकी थी। अरुणा के मंगेतर डॉ. संदीप सरदेसाई, उसी अस्पताल में एक डॉक्टर थे। अरुणा और संदीप की शादी लगभग तय हो चुकी थी और दोनों की शादी होने वाली थी। लेकिन तब तक अरुणा के ऊपर ऐसी मुसीबत आई कि अरुणा इस मुसीबत को चुनौती न दे सकी और अस्पताल में ही दम तोड़ दिया। 

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42 साल तक अस्पताल के बेड पर पड़ी रही

अरुणा के 27 नवंबर 1973 को हमला होने के बाद से अरुणा उसी अस्पताल में भर्ती रही। इलाज का सिलसिला जारी था। पर धीरे-धीरे डाक्टरों ने यह बताना शुरू किया कि अरुणा शायद कभी भी ठीक नहीं हो सकती। परिवार वालों ने शुरू में अरुणा का साथ देने की पूरी कोशिश की परंतु परिवार की स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए परिवार वालों ने भी धीरे-धीरे अस्पताल आना कम कर दिया। 

अस्पताल ही बन गया अरुणा का परिवार 

दरअसल, अरुणा के घर वालों के पास उतनी दौलत नहीं थी कि अरुणा के इलाज को इतने लंबे समय तक वहन कर सके इलसिए परिवार वाले अस्पताल आना धीरे-धीरे छोड़ रहे थे क्योंकि अरुणा से उनकी उम्मीद भी छूट रही थी। इसी बीच अरुणा के आसपास जो नर्स काम करती थी उन्होंने अरुणा का काफी साथ दिया। केईएम अस्पताल (KEM Hospital) की नर्सों ने अरुणा का इतना ख्याल रखा कि अरुणा से उनका लगाव बढ़ गया था। एक बार तो ऐसा नौबत आया कि अरुणा को किसी दूसरे सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने की बात उठी लेकिन नर्सों ने इसके खिलाफ हड़ताल कर दिया और कहा कि अरुणा कहीं नहीं जाएगी। 

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नहीं मिल पैसिव यूथेनेसिया (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) की इजाजत 

हाल ही में को जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) की इजाजत दे दी वैसे अरुणा को पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। दरअसल, पत्रकार पिंकी विरानी (Journalist Pinki Virani) ने 16 दिसंबर 2009 को सुप्रीम कोर्ट में अरुणा के पैसिव यूथेनेसिया के लिए याचिका दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 7 मार्च, 2011को इस याचिका को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरुणा के पास जो नर्स हैं, वे अरुणा की नेक्स्ट फ्रेंड हैं और वे लोग अरुणा को जिंदा रखना चाहती हैं इसलिए पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत नहीं दी जा सकती है।

42 साल बाद बेड पर ही तोड़ा दम 

केईएम अस्पताल में ही अरुणा लगभग 42 साल तक बेड पर पड़ी रही। लेकिन बेड पर पड़े-पड़े अरुणा को अन्य बीमारियाँ भी होने लगी थी इसी बीच अरुणा को निमोनिया नामक बीमारी हो गई जिसकी वजह से 18 मई 2015 को अरुणा की मृत्यु हो गई। अरुणा की मृत्यु होने पर नर्सों के बीच एक शोक की लहर थी क्योंकि उन्हें अरुणा से लगाव हो गया था। अरुणा की मृत्यु होने के बाद साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) की वैधता पर अपनी मुहर लगा दी।

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