कोलकाता का टांगरा इलाका "चाइनाटाउन" के नाम से मशहूर है। यहाँ दशकों से चीनी मूल के लोग रहते आए हैं। इसी इलाके की एक संकरी गली में काली मंदिर स्थित है। पहली नज़र में यह मंदिर किसी भी अन्य मंदिर जैसा ही लगता है, लेकिन इसके रीति-रिवाज और परंपराएँ इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती हैं। AI Generated
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पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: कोलकाता का अनोखा मंदिर, यहाँ देवी को फल मिठाई नहीं, चढ़ता है चाउमीन-मोमोज, जानें वजह

कोलकाता का टांगरा इलाका "चाइनाटाउन" के नाम से मशहूर है। यहाँ दशकों से चीनी मूल के लोग रहते आए हैं। इसी इलाके की एक संकरी गली में काली मंदिर स्थित है। पहली नज़र में यह मंदिर किसी भी अन्य मंदिर जैसा ही लगता है, लेकिन इसके रीति-रिवाज और परंपराएँ इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती हैं।

Author : Vikas Tiwari

West Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए मतदान दो चरणों में होगा। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को 152 सीटों के लिए होगा, जबकि दूसरे चरण का मतदान बाकी 142 सीटों के लिए 29 अप्रैल को होगा। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे। इस चुनावी माहौल के बीच, पश्चिम बंगाल का चाइनीज काली मंदिर सुर्खियों में है।

आइए जानते हैं इस अनोखे मंदिर के इतिहास और इसके पीछे की रोचक कहानी के बारे में l

भारत विविधताओं का देश है, जहाँ भाषा, खान-पान और परंपराएँ हर कुछ किलोमीटर पर बदल जाती हैं। हमारा देश आस्था के मामले में भी अनूठा है। आपने अक्सर मंदिरों में देवी-देवताओं को लड्डू, पेड़ा, हलवा या फल चढ़ाते देखा होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ मंदिरों में देवी काली को चाउमीन, मोमोज, नूडल्स और स्प्रिंग रोल भी चढ़ाए जाते हैं? जी हाँ, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक ऐसा ही मंदिर है, जो दुनिया भर में "चीनी काली मंदिर" के नाम से प्रसिद्ध है।

कोलकाता के टांगरा क्षेत्र में स्थित यह मंदिर न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि भारतीय और चीनी दो संस्कृतियों (Indian-Chinese culture) के अद्भुत संगम का जीवंत उदाहरण भी है।

टांगरा का चाइनीज काली मंदिर:संस्कृतियों का अनूठा संगम 

कोलकाता का टांगरा इलाका "चाइनाटाउन" के नाम से मशहूर है। यहाँ दशकों से चीनी मूल के लोग रहते आए हैं। इसी इलाके की एक संकरी गली में काली मंदिर स्थित है। पहली नज़र में यह मंदिर किसी भी अन्य मंदिर जैसा ही लगता है, लेकिन इसके रीति-रिवाज और परंपराएँ इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती हैं।

इस मंदिर (Chinese Kali Mandir) की सबसे खास बात यहाँ का प्रसाद है।जहां देश के अन्य काली मूर्तियों में रोटी या मिठाई का वितरण होता है, वहीं यहां भक्तों को प्रसाद के रूप में आटा, चाउमीन, मोमोज और अन्य सांस्कृतिक व्यंजन मिलते हैं। मंदिर में पूजा करने वाले लोग भी केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि चीनी समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

मंदिर के पीछे की चमत्कारिक और पौराणिक कथा

इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक मार्मिक कहानी है। स्थानीय मान्यताओं और धार्मिक विद्वानों के अनुसार, दशकों पहले इस स्थान पर कोई भव्य मंदिर नहीं था, बल्कि एक पेड़ के नीचे रखे दो काले पत्थरों की पूजा की जाती थी। ऐसा कहा जाता है कि लगभग 60-70 साल पहले, इस इलाके में रहने वाले एक चीनी परिवार का एक छोटा बच्चा बहुत बीमार पड़ गया। डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी और बच्चे के बचने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी। तब उस चीनी दंपति ने हार मानकर उसी पेड़ के नीचे स्थित पत्थरों (देवी काली की मूर्तियों) के सामने सिर झुकाया और अपने बच्चे के जीवन की भीख मांगी। आश्चर्य की बात ये है कि कुछ ही दिनों में बच्चा पूरी तरह से ठीक हो गया। इस चमत्कार ने न केवल उस परिवार बल्कि पूरे चीनी समुदाय की काली माता में आस्था को और मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने वहां एक छोटा मंदिर बनवाया, और तब से इसे "चीनी काली मंदिर" के नाम से जाना जाता है।

चाऊमीन और मोमोज का भोग क्यों चढ़ाया जाता है?

यह स्वाभाविक है कि मन में यह सवाल उठे कि देवी को नूडल्स क्यों चढ़ाए जाते हैं। इसका जवाब इस क्षेत्र के जनसांख्यिकीय इतिहास में छिपा है। 1930 के दशक में चीन गृहयुद्ध में उलझा हुआ था, जिसके चलते बड़ी संख्या में चीनी लोग भारत में आकर बस गए। कोलकाता के तंगरा में बसने के बाद, इन लोगों ने स्थानीय संस्कृति को तो अपना लिया, लेकिन अपनी खान-पान की परंपराओं को नहीं भूले।

जब चीनी समुदाय ने इस मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू की, तो उन्होंने अपनी श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए अपने पसंदीदा भोजन का सहारा लिया। उनका मानना ​​था कि भगवान को केवल वही अर्पित करना चाहिए जो हमें सबसे प्रिय हो। इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने देवी काली को चाउमीन और मोमोज अर्पित करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह परंपरा एक नियमित परंपरा बन गई और आज स्थानीय भारतीय निवासी भी गर्व से इसका पालन करते हैं।

अनोखी पूजा पद्धति: अगरबत्ती भी है खास

इस मंदिर में न केवल चढ़ावे अलग हैं, बल्कि पूजा-पाठ का तरीका भी थोड़ा भिन्न है। चीनी संस्कृति का प्रभाव यहाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मंदिर में पूजा के दौरान जलाई जाने वाली अगरबत्तियाँ भी विशेष हैं, जिनका उपयोग अक्सर चीनी नव वर्ष या अन्य चीनी त्योहारों के दौरान किया जाता है। इसके अलावा, मंदिर के प्रवेश द्वार और आंतरिक दीवारों पर भी चीनी वास्तुकला और और नकाशी देखने को मिलता है l तांगरा का यह मंदिर एकता का संदेश देता है। मुख्य पुजारी हिंदू हैं, लेकिन मंदिर के रखरखाव और प्रबंधन में चीनी समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका है। दिवाली और काली पूजा के दौरान दृश्य सचमुच अद्भुत होता है। चीनी समुदाय के लोग पूरी श्रद्धा से देवी के सामने घुटने टेकते हैं, प्रार्थना करते हैं और धूप व दीपक जलाते हैं।पर्यटन और आस्था का केंद्र

यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि कोलकाता का एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन गया है। लोग दूर-दूर से यह देखने आते हैं कि कैसे एक प्राचीन भारतीय देवी को आधुनिक चीनी व्यंजन परोसे जाते हैं।

कैसे पहुँचें?

यदि आप भी इस मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं, तो आपको कोलकाता पहुंचना होगा। यदि आप हवाई मार्ग से आते हैं तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है। कम किराए में आप रेल मार्ग से भी पहुँच सकते हैं l रेल मार्ग से आप हावड़ा या सियालदह रेलवे स्टेशन से टैक्सी या बस ले सकते हैं।आप मेट्रो से फूलबागान स्टेशन पहुंच सकते हैं, जो मात्र 2.7 किलोमीटर दूर है। यहां से आप रिक्शा या ऑटो से आसानी से चाइनाटाउन में स्थित इस मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

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