जूते बनाने आए थे, अब चुनाव जिताते हैं! कोलकाता के 'चीनी वोटर्स' का वो पावर गेम जो कोई नहीं जानता

कोलकाता में चीनी समुदाय (Kolkata Chinese community) का इतिहास काफी पुराना और समृद्ध रहा है। 18वीं सदी के अंत में टोंग आचू नामक व्यक्ति के आगमन से इस समुदाय की शुरुआत मानी जाती है। उनके नाम पर ही “आचीपुर” (Achipur) इलाके का नाम पड़ा।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दल हर छोटे-बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसी रणनीति के तहत तृणमूल कांग्रेस अब कोलकाता के चीनी समुदाय पर खास ध्यान दे रही है।
कोलकाता में चीनी समुदाय (Kolkata Chinese community) का इतिहास काफी पुराना और समृद्ध रहा है। 18वीं सदी के अंत में टोंग आचू नामक व्यक्ति के आगमन से इस समुदाय की शुरुआत मानी जाती है। उनके नाम पर ही “आचीपुर” (Achipur) इलाके का नाम पड़ा। Wikimedia Commons
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West Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दल हर छोटे-बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसी रणनीति के तहत तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब कोलकाता के चीनी समुदाय पर खास ध्यान दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी इस समुदाय से जुड़ने के लिए उनकी अपनी भाषा मैंडरिन का इस्तेमाल कर रही है। चाइनाटाउन जैसे इलाकों में मैंडरिन में संदेश और ग्रैफिटी बनवाकर TMC यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह हर समुदाय को सम्मान देती है और उनसे सीधे संवाद करना चाहती है।

कोलकाता में चीनी समुदाय (Kolkata Chinese community) का इतिहास काफी पुराना और समृद्ध रहा है। 18वीं सदी के अंत में टोंग आचू नामक व्यक्ति के आगमन से इस समुदाय की शुरुआत मानी जाती है। उनके नाम पर ही “आचीपुर” (Achipur) इलाके का नाम पड़ा। समय के साथ यह समुदाय तिरेटा बाजार और टांगरा जैसे इलाकों में बस गया और यहां की संस्कृति का अहम हिस्सा बन गया। ये लोग मुख्य रूप से चमड़ा उद्योग में जूते-चप्पल, लॉन्ड्री, छोटे-मोटे होटल/रेस्टोरेंट में खाना बनाना, हेयर सैलून और ब्यूटी पार्लर, और चिकित्सक के तौर पर आदि व्यवसायों से जुड़े रहे l 

हालांकि, आज इस समुदाय की संख्या पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है। 1960 के दशक में जहां इनकी आबादी लगभग 50 हजार के आसपास थी, वहीं अब यह घटकर करीब 3 से 4 हजार रह गई है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान इस समुदाय के कई लोगों को संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उन्हें अपने व्यवसाय और घरों में काफी नुकसान उठाना पड़ा, जिससे बड़ी संख्या में लोग विदेशों की ओर पलायन कर गए। इसी वजह से यह समुदाय धीरे-धीरे सिमटता चला गया।

संख्या में कमी आने के बावजूद, चुनावी राजनीति में इस समुदाय की अहमियत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। खासतौर पर कोलकाता के कुछ इलाकों में इनका प्रभाव आज भी देखा जाता है। राजनीतिक दल यह समझते हैं कि भले ही संख्या कम हो, लेकिन स्थानीय समर्थन, नेटवर्क और फंडिंग के लिहाज से यह समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इसके अलावा, इस समुदाय की नई पीढ़ी अब पहले से ज्यादा जागरूक हो रही है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी बढ़ा रही है। युवा वर्ग मतदान के प्रति सजग है और अपने अधिकारों को लेकर गंभीर नजर आते  है। यही कारण है कि राजनीतिक पार्टियां अब इस समुदाय को नजरअंदाज करने की बजाय उन्हें जोड़ने की कोशिश कर रही हैं।

कोलकाता का चीनी समुदाय भले ही आज छोटा हो गया हो, लेकिन उसका ऐतिहासिक महत्व और चुनावी प्रभाव अभी भी कायम है। यही वजह है कि TMC जैसे दल उनसे जुड़ने के लिए नई रणनीतियां अपना रहे हैं, जिसमें भाषा और संस्कृति को अहम माध्यम बनाया जा रहा है।

[VT]

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