डॉ. राम मनोहर लोहिया ने बचपन से ही गांधी के विचारों से प्रभावित होकर समाजवादी सोच विकसित की और आगे चलकर नेहरू की सत्ता को संसद से सड़क तक खुलकर चुनौती दी। विद्यासागर कॉलेज में औपनिवेशिक इतिहास को चुनौती देने से लेकर बर्लिन विश्वविद्यालय से पीएचडी तक उनकी बौद्धिक यात्रा ने भारतीय राजनीति में समाजवादी आंदोलन की मजबूत नींव रखी।
जिंदा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करती हैं। जब सड़कें सुनी हो जाए तो संसद आवारा हो जाती है। ये बोल देश के महान शख्सियत डॉ राम मनोहर लोहिया के हैं। देश की राजनीति को नई दिशा देने में और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में डॉ राम मनोहर लोहिया के योगदान को यह मुल्क अनंत काल तक स्मरण में रखेगा। नेहरू की सत्ता को मुखर होकर चुनौती देने वाले डॉ राम मनोहर लोहिया ने भारतीय राजनीति में समाजवादी आंदोलन की नींव रखी थी।
23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद अर्थात अयोध्या में जन्में डॉ राम मनोहर लोहिया बचपन से ही बड़े कुशाग्र बुद्धि के थे। पिता श्री हीरालाल शुरू से महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। देश में महात्मा गांधी के नाम का चारों तरफ शोर था। लोहिया के पिता हीरालाल, महात्मा गांधी को सुनने के लिए अक्सर उनके पास जाया करते थे। लोहिया जब 8-9 साल के थे तब महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात हुई। यह मुलाकात गुजरात के अहमदाबाद में हुई थी। बचपन में पिता से महात्मा गांधी के बारे में सुनकर लोहिया के मन में समाजवाद का बीज अंकुरित हो रहा था।
फैजाबाद से मुंबई गए हीरालाल ने अपने बेटे का दाखिला मारवाड़ी स्कूल में कराया। मैट्रिक की पढ़ाई बंबई से करने के बाद लोहिया का दाखिला काशी के सेंट्रल हिन्दू स्कूल (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) में कराया गया। काशी से पढ़ाई पूरी करने के बाद लोहिया ने स्नातक की पढ़ाई हेतु बंगाल का रुख किया। उस समय शांति निकेतन बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। लोहिया की ख्वाहिश थी कि उनका दाखिल शांति निकेतन में हो जाए, परंतु लोहिया की आर्थिक तंगी शांति निकेतन तक पहुँचने में बाधक साबित हुई। साल 1925 में इंटर की पढ़ाई बनारस से करने के बाद लोहिया ने एक साल के अंतराल पर कलकत्ता के विद्यासागर कॉलेज में दाखिला लिया।
लोहिया जब विद्यासागर कॉलेज में पढ़ाई करते थे तो उनके शिक्षक ने ब्लैक हॉल घटना (Black Hole Tragedy) का जिक्र किया। इस घटना में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को एक क्रूर शासक साबित किया गया था। लोहिया प्रोफेसर से असहमत होते हुए बोले, आप जो हमें बता रहे हैं वह अंग्रेजों द्वारा रची गई कहानी है। लोहिया ने कहा कि हॉवेल ने इस घटना के माध्यम से भारतीय शासकों को क्रूर साबित करके अपने अत्याचारों को जायज ठहराने की कोशिश की है। लोहिया इसके आगे तर्क भी देते हैं कि 18x14 फीट के कमरे में 146 लोग एक साथ नहीं आ सकते हैं, यह तर्कसंगत नहीं है।
विद्यासागर कॉलेज से पढ़ाई करने के के बाद लोहिया ने जर्मनी के बर्लिन यूनिवर्सिटी से पीएचडी किया। 22 वर्ष की आयु में पीएचडी करके लोहिया भारत लौटे। इसके बाद गांधी जी से लगातार संपर्क में बने रहे।
डॉ राम मनोहर लोहिया का संबंध दोनों लोगों से अच्छा था। गांधी जी के बेहद प्रिय माने जाने वाले नेहरू से उनकी पहली मुलाकात 1932-33 में इलाहाबाद के आनंद भवन में हुई थी। यहीं से दोनों के रिश्तों को एक नया आयाम मिला। नेहरू उस समय युवाओं में बहुत चर्चित चेहरे माने जाते थे। लोहिया जब नेहरू से मुलाकात किए तो नेहरू उनके बातों से बहुत प्रभावित हुए। गांधी जी से लोहिया के संबंध पिता और पुत्र जैसा था। लोहिया गांधी से बहस बहुत करते थे। गांधी कभी-कभी ये बात कहते थे कि हीरालाल तो मेरा भक्त था तुम इतने बहसबाज कैसे बन गए। एक बार गांधीजी ने कहा, लोहिया सिगरेट पीना छोड़ दो, लोहिया थोड़ी देर बाद बोले सोचकर बताऊँगा। तीन महीने बाद लोहिया ने महात्मा गांधी को बताया कि उन्होंने सिगरेट छोड़ दिया है।
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लोहिया ने अपनी किताब भारत विभाजन के गुनहगार में बंटवारे के समय की परिस्थितियों को उजागर किया है। उन्होंने बताया है कि गांधी पूरी तरीके से बंटवारे के खिलाफ थे। लोहिया ने विभाजन के 8 प्रमुख कारणों का जिक्र किया है। ब्रिटिश षड्यंत्र, कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व (नेहरू और पटेल) में कमी, सांप्रदायिक दंगों का भय, जनता की उदासीनता, गांधी जी के अहिंसा की सीमाएं, मुस्लिम लीग की कट्टरता (जिन्ना की अड़ियल नीति), हिंदू कट्टरवाद, अखंड भारत के प्रति वैचारिक स्पष्टता की कमी ये सारे भारत विभाजन के प्रमुख कारण थे। उन्होंने बताया कि आरएसएस जैसे संगठनों ने भारत में धार्मिक कट्टरता फैलाया। उन्होंने आरएसएस की तुलना मुस्लिम लीग से करते हुए बताया कि दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं।
आजादी के बाद लोहिया, नेहरू के खिलाफ लोकतंत्र की एक नई लकीर खींच रहे थे। नेहरू के खिलाफ उन्होंने फूलपुर लोकसभा से चुनाव (1962) भी लड़ा। इस चुनाव में लोहिया ने नेहरू को कड़ी टक्कर दी लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। इसके बाद 1963 में फर्रुखाबाद से उपचुनाव जीतकर लोहिया संसद में पहुंचे। संसद में 3 आना बनाम 15 आना की बहस आज भी भारतीय राजनीति में एक मिसाल माना जाता है। लोहिया ने 1954 में उत्तर प्रदेश में नहर रेट आंदोलन चलाया। इस आंदोलन से यूपी के सियासत में मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक बीजारोपण हुआ। लोहिया ने अपने सामाजिक न्याय की राजनीति मुलायम सिंह को विरासत में सौंप दी। लोहिया का दिया हुआ नारा “संसोपा ने बांधी गांठ पिछड़े पावे सौ में साठ” आज भी समाजवादी पार्टी में लगाया जाता है।
डॉ राम मनोहर लोहिया दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल (Willingdon Hospital) में 1967 में इसलिए भर्ती हुए कि उनको प्रोस्टेट की समस्या थी। ऑपरेशन करने के बाद लोहिया की हालत बिगड़ती चली गई। लोहिया ने अपने मित्र मधु लिमये से यह बात कहा था कि डॉक्टरों की वजह उनकी मौत हो रही है। 12 अक्टूबर 1967 को इस महान विभूति ने अपनी आंखे भारतीय लोकतंत्र से फेर लिया और उनकी मृत्यु हो गई। जिस अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई आज वह अस्पताल लोहिया के नाम से जाना जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोहिया की मृत्यु के समय उनके जेब में महज 10 रुपए थे, यह घटना आज के नेताओं के लिए एक सबक है।
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