पुडुचेरी विधानसभा (Puducherry Assembly) सीटों पर 9 अप्रैल 2026 को मतदान किया जाएगा, जबकि चुनाव के नतीजे 4 मई 2026 को घोषित किए जाएंगे। लेकिन उस से पहले ही पुडुचेरी विधानसभा चुनाव (Puducherry Assembly Election 2026) को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। चुनाव में उतरने वाले उम्मीदवारों में से करीब 23 फीसदी के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि 38 उम्मीदवारों पर गंभीर आरोप लगे हुए हैं। अगर आंकड़ों की गहराई में जाएं, तो यह सिर्फ प्रतिशत नहीं बल्कि लोकतंत्र के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती है। कुल उम्मीदवारों में से हर चौथा उम्मीदवार किसी न किसी केस में शामिल है, और इनमें से लगभग आधे गंभीर अपराधों का सामना कर रहे हैं।
लोकतंत्र में चुनाव को जनता की आवाज माना जाता है, लेकिन जब इतने बड़े स्तर पर दागी उम्मीदवार सामने आते हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राजनीति साफ-सुथरी रह गई है? खास बात यह है कि ये आंकड़े केवल छोटे-मोटे मामलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं के खिलाफ अपराध और गंभीर हिंसा जैसे आरोप भी शामिल हैं। चिंताजनक बात यह है कि पिछले चुनावों की तुलना में इस बार भी स्थिति में कोई बड़ा सुधार देखने को नहीं मिला। यानी समस्या सिर्फ एक चुनाव की नहीं, बल्कि एक ट्रेंड बनती जा रही है। ऐसे में मतदाताओं के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे विकास, जाति-समर्थन और साफ छवि के बीच कैसे सही फैसला लें। यही वजह है कि राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण अब सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुका है।
Association for Democratic Reforms (ADR) की रिपोर्ट के मुताबिक, पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2021 में कुल 324 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से 74 पर आपराधिक मामले दर्ज थे और 38 पर गंभीर आरोप थे। पार्टीवार देखें तो कांग्रेस (Indian National Congress) के लगभग 30 उम्मीदवारों में से 8 पर केस, अखिल भारतीय एन.आर. कांग्रेस (All India N.R. Congress (AINRC) के 28 में से 7, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 23 में से 5 और DMK के 13 में से 3 उम्मीदवार आपराधिक मामलों का सामना कर रहे थे। निर्दलीय और छोटे दलों को मिलाकर 25–30 उम्मीदवार ऐसे थे जिन पर केस दर्ज थे।
इसे और दिलचस्प तरीके से समझें तो हर चौथे उम्मीदवार पर केस था, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई उम्मीदवार “विनिंग प्रोफाइल” माने जाते हैं यानी जिन पर केस हैं, उनके जीतने की संभावना भी कम नहीं होती। ADR के पिछले ट्रेंड्स बताते हैं कि जिन उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले होते हैं, उनकी जीतने की दर साफ छवि वाले उम्मीदवारों से कई बार ज्यादा देखी गई है।
अगर विधानसभा की 30 सीटों की बात करें, तो चुने गए विधायकों में भी करीब 8 - 10 (25–30%) ऐसे थे जिनका आपराधिक बैकग्राउंड था, यानी यह समस्या सिर्फ उम्मीदवारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता तक पहुंच जाती है। और भी अहम बात यह है कि कई उम्मीदवारों की संपत्ति करोड़ों में है, जिससे यह संकेत मिलता है कि धनबल और बाहुबल का कॉम्बिनेशन चुनाव में बड़ा फैक्टर बन चुका है। 2016 में जहां करीब 20% उम्मीदवारों पर केस थे, वहीं 2021 में यह बढ़कर 23% हो गया। यानी 5 साल में भले बढ़ोतरी ज्यादा न दिखे, लेकिन कमी भी नहीं आई। यही ट्रेंड बताता है कि राजनीति में “क्रिमिनलाइजेशन” (“Criminalization”) अब अपवाद नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक सामान्य स्थिति बनती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है।
राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण अब कोई नई बात नहीं रह गई, बल्कि यह एक ऐसा “सिस्टम” बनता जा रहा है, जिसे तोड़ना आसान नहीं है। सबसे बड़ी वजह है “विनिंग फैक्टर” यानी जो उम्मीदवार चुनाव जीत सकता है, उसे ही प्राथमिकता दी जाती है। राजनीतिक दल (Political Party) अक्सर यह मान लेते हैं कि मजबूत पकड़, पैसा और प्रभाव रखने वाले उम्मीदवार ही सीट जिता सकते हैं, चाहे उनकी छवि कितनी भी विवादित क्यों न हो।
दूसरी बड़ी समस्या है धीमी न्यायिक प्रक्रिया (Slow Justice System)। कई मामलों में 5–10 साल तक फैसला नहीं आता, जिससे आरोपी उम्मीदवार बार-बार चुनाव लड़ते रहते हैं और धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत कर लेते हैं।
इसके साथ ही धनबल और बाहुबल का गठजोड़ इस समस्या को और गहरा करता है। जिन लोगों के पास पैसा और ताकत होती है, वे चुनावी मैदान में बढ़त बना लेते हैं। वहीं, जमीनी हकीकत यह भी है कि कई बार मतदाता जाति, धर्म या स्थानीय समीकरणों के आधार पर वोट करते हैं, जिससे साफ छवि वाले उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं।
यही वजह है कि सख्त नियमों और बहसों के बावजूद राजनीति से अपराध का पूरी तरह खत्म होना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। [SP/MK]