काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple)  Ai
धर्म

Mahashivratri Special: तोड़ने वाले हार गए! काशी विश्वनाथ मंदिर की अद्भुत वापसी की गाथा

महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर आज हम भगवान शिव के पवित्र स्थान काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में जानेंगे जहां मान्यता है कि इस मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ।

Author : Sarita Prasad

इस साल 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि (Mahashivratri) का दिव्य पर्व मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है जो शिव भक्तों के लिए आस्था और साधना का विशेष अवसर लेकर आता है। ऐसा माना जाता है कि इसी पावन रात्रि में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए इस दिन को शिव शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक भी माना जाता है।

महाशिवरात्रि (Mahashivratri) के शुभ अवसर पर आज हम भगवान शिव के पवित्र स्थान काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में जानेंगे जहां मान्यता है कि इस मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ। लेकिन पौराणिक मान्यताओं की मानें तो काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास युगो युगांतर से है। तो चलिए आज हम थोड़े विस्तार से जानते हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास क्या है और क्या सच में मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया था?

कहां है काशी विश्वनाथ मंदिर?

भगवान शिव का काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple) उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में गंगा नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर को विशेश्वर नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है ब्रह्मांड का शासक। यह मंदिर पिछले कई हजार वर्षों से वाराणसी में ही स्थित है और इसका इतिहास बड़ा रोचक है। ऐसा कहा जाता है कि मुगल शासकों द्वारा कई बार इस मंदिर को ध्वस्त किया गया था। मुगल शासकों द्वारा कई बार ध्वस्त किए गए इस काशी विश्वनाथ मंदिर को हिंदू धर्म का प्रतीक और पावन मंदिरों में से एक माना जाता है।

हरिश्चंद्र ने करवाया था इस मंदिर का निर्माण

काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple) का इतिहास हजारों साल पुराना है। यह मंदिर गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का दोबारा निर्माण 11वीं सदी में राजा हरिश्चंद्र (Raja Harishchandra) ने करवाया था। लेकिन जब मोहम्मद गोरी का भारत पर आक्रमण हुआ तो उसने 1194 में इस मंदिर को भी ध्वस्त कर दिया था। मोहम्मद गौरी के आक्रमण के बाद इस का पुन:र्निर्माण हुआ लेकिन फिर एक बार जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने इस मंदिर को तुड़वा दिया। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने और उसे पुनः निर्माण करवाने का या सिलसिला 11वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक चलता ही रहा। 1585 में राजा टोडरमल की मदद से पंडित नारायण भट्ट ने विश्वनाथ मंदिर का एक बार फिर से निर्माण करवाया लेकिन फिर 18 अप्रैल 1669 में औरंगजेब ने इस मंदिर को तुड़वा दिया।

अहिल्या बाई होल्कर ने रखी मंदिर की नींव

अहिल्याबाई होल्कर (Ahilyabai Holkar)

औरंगजेब के बाद लगभग 125 साल तक काशी विश्वनाथ मंदिर का कोई अस्तित्व नहीं था। आपको बता दें कि वर्तमान में जो बाबा विश्वनाथ मंदिर स्थित है उसका निर्माण महारानी अहिल्याबाई होल्कर (Ahilyabai Holkar) ने 1780 में करवाया था और उसके बाद महाराजा रणजीत सिंह ने 1853 में 1000 किलोग्राम सोना दान किया। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास जैसे महापुरुष आ चुके हैं।

ज्ञानवापी को लेकर क्यों होते है विवाद?

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanwapi Mosque) को लेकर जो अक्सर विवाद होता है, इसका कारण यह है कि मंदिर के एकदम पास ही ज्ञानवापी मस्जिद है और कहा जाता है की मस्जिद मंदिर की ही मूल जगह पर बनाई गई है। ज्ञानवापी मस्जिद को मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर बनवाया था। इसके पीछे भी एक दिलचस्प कथा है जिसका उल्लेख मशहूर इतिहासकार डॉक्टर विश्व सांभर नाथ पांडे की पुस्तक भारतीय संस्कृति मुगल विरासत औरंगजेब के फरमान में मिलता है। तो आईए जानते हैं कि इस किताब के मुताबिक पूरी कथा है क्या?

ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanwapi Mosque)

क्या है इतिहास?

डॉक्टर विश्वंभर नाथ पांडे (Dr Vishwambhar Nath Pandey) की किताब में काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ी घटनाओं का जिक्र मिलता है। उनके अनुसार एक बार औरंगजेब बनारस के निकट से गुजर रहा था। सभी हिंदू दरबारी अपने परिवार के साथ गंगा स्नान और विश्वनाथ दर्शन के लिए काशी जा रहे थे। विश्वनाथ दर्शन कर जब लोग बाहर आए तो पता चला कि कच्छ के राजा की एक रानी गायब हो गई जब उनकी खोज की गई तो मंदिर के नीचे तहखाना में वस्त्र भूषण विहीन दिखाई पड़ी। जब औरंगजेब को पंडित की यह काली करतूत पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और बोला कि जहां मंदिर के गर्भ ग्रह के नीचे इस प्रकार के डकैती और बलात्कार हो, वह निसंदेह ईश्वर का घर नहीं हो सकता। उसने मंदिर को तुरंत ध्वस्त करने का आदेश जारी कर दिया।

काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple)

औरंगजेब के आदेश का तत्काल पालन हुआ लेकिन जब यह बात कच्छ की रानी ने सुना तो उन्होंने उसके पास संदेश भिजवाया कि इसमें मंदिर का क्या दोष है, दोषी तो वहां के पंडे हैं, रानी ने इच्छा प्रकट की कि मंदिर का पुनः निर्माण करवाया जाए लेकिन औरंगजेब के लिए अपने धार्मिक विश्वास के कारण फिर से नया मंदिर बनवाना संभव था। इसलिए उसने मंदिर की जगह मस्जिद खड़ी करके रानी की इच्छा पूरी की। इस बात की पुष्टि कई इतिहासकारों ने करते हुए कहां है कि औरंगजेब का या फरमान हिंदू विरोध या हिंदू के प्रति किसी घृणा की वजह से नहीं बल्कि उन पंडितों के खिलाफ गुस्सा था जिन्होंने कच्छ की रानी के साथ दुर्व्यवहार किया था।

स्कंद पुराण में मिलता है ज्ञानवापी का ज़िक्र

विश्वनाथ मंदिर का प्रमुख शिवलिंग 60 सेंटीमीटर लंबा और 90 सेंटीमीटर की परिधि में है। मुख्य मंदिर के आसपास काल, भैरव, कार्तिकेय, विष्णु, गणेश, पार्वती और शनि के छोटे-छोटे मंदिर है। मंदिर में तीन सोने के गुंबद हैं जिन्हें 1849 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने लगाया था। मंदिर मस्जिद के बीच एक कुआं है जिसे ज्ञानवापी कुआं कहा जाता है। ज्ञानवापी कुएं का जिक्र स्कंद पुराण में भी मिलता है। कहा जाता है कि मुगलों के आक्रमण के दौरान शिवलिंग को ज्ञानवापी कुएं में छुपा दिया गया था। समय समय पर इससे जुड़ी कई कथाएं और मान्यताएं प्रचलित होती रहती हैं और यही कारण है कि मंदिर और मस्जिद को लेकर काफी विवाद भी सामने आता है। [SP/MK]