टाइम कैप्सूल एक कंटेनर होता है जिसमें किसी समय की ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक जानकारी सुरक्षित रखी जाती है ताकि भविष्य में खुदाई होने पर उस दौर के बारे में जानकारी मिल सके।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आजादी के 25 साल पूरे होने पर लालकिले में ‘कालपत्र’ नाम से टाइम कैप्सूल दफन कराया था।
विपक्ष ने इंदिरा गांधी पर अपने परिवार का महिमामंडन करने का आरोप लगाया। 1977 में मोरारजी देसाई सरकार ने कैप्सूल निकलवाया, लेकिन उसमें क्या था यह आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ।
टाइम कैप्सूल (Time Capsule) का नाम बहुत बहुत सारे लोगों के लिए नया होगा क्योंकि इस प्रकार की चीजें अक्सर सुनने को नहीं मिलती हैं। आखिरी बार यह नाम 2020 में चर्चा में आया था, जब अयोध्या में राम मंदिर के 200 फीट नीचे एक कंटेनर के रूप में टाइम कैप्सूल डाला गया था। इसे एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी कहा जाता है, जैसी की सदियों बाद अगर खुदाई हो, तो भविष्य में लोगों को यह पता चल सके कि इतिहास में उस जगह का या किसी घटना का क्या महत्व था। इस कैप्सूल में काल की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति का उल्लेख भी होता है।
भारत में पहले भी इसकी नींव डाली जा चुकी है और शायद यही कारण है कि कुछ जगह जब खुदाई होती है, हमें उसके बारे में जानकारी आसानी से मिलती है। कुछ ऐसी ही कोशिश साल 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) ने की थी। उन्होंने लालकिले की प्राचीर में ऐसा ही एक टाइम कैप्सूल (Time Capsule) डाला था। इसे कालपत्र का नाम दिया गया था। इसका काफी विरोध भी हुआ था लेकिन आज तक यह पता नहीं चल पाया कि उसमें लिखा क्या था? आइये जानते हैं पूरी कहानी।
यह बात साल 1970 की है। इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) की लोकप्रियता अपने चरम पर थी और वो सत्ता के शिखर पर भी सातवें आसमान पर थीं। उस समय की तत्कालीन कांग्रेस सरकार यह चाहती थी कि आजादी के 25 साल बाद की स्थिति को संजोकर रखा जाए। इसके लिए टाइम कैप्सूल (Time Capsule) का सहारा लिया गया। इसमें आज़ादी के 25 साल के बाद की उपलब्धियां और संघर्षों को संजोकर रखा गया।
इंदिरा सरकार ने इसे कालपत्र नाम दिया था। इन सारी चीजों को इकठ्ठा करना और पूरा मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्ट्रिकल रिसर्च (आईसीएचआर) को सौंपा गया। मद्रास क्रिस्चन कॉलेज के इतिहास के प्रफेसर एस.कृष्णासामी को पूरी पाण्डुलिपि तैयार करने की जिम्मेदारी मिली थी। इसके बाद इंदिरा गाँधी ने इसे 15 अगस्त, 1973 को इसे लाल किले की प्राचीर में इसे दफ़न किया लेकिन बाद में इसपर विवाद शुरू हो गया।
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टाइम कैप्सूल (Time Capsule) को जब लालकिले के परिसर में दफनाया गया, तो इसके बाद इंदिरा सरकार पर काफी इल्जाम लगे। विपक्ष का कहना था कि इंदिरा गाँधी ने इसमें सिर्फ अपना और अपने वंश का महिमामंडन किया है। भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानियों को नज़रअंदाज किया है। जनता पार्टी की सरकार ने लोगों से यह वादा किया था कि जब कभी भी उनकी सरकार आएगी, तो वो इस कालपत्र को बाहर निकलेगी।
इसके बाद सत्ता का समीकरण बदला और साल 1977 में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई और मोरारजी देसाई ने सरकार गठन के कुछ दिनों के बाद ही टाइम कैप्सूल (Time Capsule) को बाहर निकलवाया लेकिन उसमें क्या था, जनता पार्टी ने कभी लोगों के सामने खुलासा नहीं किया। ये राज आज भी राज ही है।
वहीं, हैरानी की बात यह थी कि 2013 में एक जानकारी सामने आई कि PMO (वर्तमान में सेवातीर्थ) इस बात से इनकार किया कि उन्हें इस कैप्सूल के बारे में कोई जानकारी नहीं है। लेखक मधु पूर्णिमा किश्वर ने इस संबंध में सूचना मांगी थी और तब PMO का यह जवाब आया था।
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बहरहाल, साल 2011 में नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इस दौरान उनपर विपक्ष ने यह आरोप लगाया था कि उन्होंने गांधीनगर में निर्मित महात्मा मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल (Time Capsule) दफनाया है और इसमें सिर्फ उनकी खूबियों का बखान हुआ है। इन सारी बातों के इतर आपको यह भी बता दें कि इस कैप्सूल की खासियत यह होती है कि इस हर प्रकार के मौसम का सामना कर सकता है और इसके अंदर रखे हुए दस्तावेज ख़राब नहीं होते हैं। करीब हज़ार सालों तक यह सुरक्षित रह सकता है।