एक शख्स ने Indira Gandhi की आवाज की नकल कर SBI से 60 लाख रुपये निकलवा लिए।
रुस्तम सोहराब नागरवाला उसी रात पकड़ा गया और तीन दिन में उसे 4 साल की सजा सुना दी गई।
उसकी रहस्यमयी मौत और केस की अधूरी जांच के कारण कई सवाल आज भी बाकी हैं।
साल 2018 में एक फिल्म आई थी 'रेड', अजय देवगन मुख्य किरदार में थे और वो एक इनकम टैक्स अधिकारी की भूमिका में थे। फिल्म में उनका नाम अमय पटनायक था। इस फिल्म में एक दृश्य है जहाँ अमय पटनायक और इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) के बीच टेलीफोन पर संवाद होता है। इंदिरा गाँधी पटनायक से रेड रोकने की बात करती हैं। इसके जवाब में पटनायक कहते हैं कि वो रेड रोक देंगे लेकिन इसके लिए सरकार की तरफ से एक लिखित आदेश उन्हें मिलना चाहिए क्योंकि उन्हें यह नहीं पता कि टेलीफोन की दूसरी ओर खुद पीएम बात कर रही हैं या कोई और।
ये तो एक फिल्म का दृश्य था लेकिन क्या आप सोच सकते हैं, असलियत में कोई इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) की आवाज निकाल ले और 60 लाख रुपए ठग ले। जी हाँ, ऐसा हुआ है। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को एक टेलीफोन जाता है, इंदिरा गाँधी की आवाज सुनाई देती है और 60 लाख रुपए SBI से ठग लिए जाते हैं। क्या है पूरा मामला, आइये समझते हैं।
घटना 24 मई 1971 की है, सोमवार का दिन था और दिल्ली के ससंद मार्ग स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा जैसे ही खुलती है, एक फोन आता है। फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का सचिव पीएन हक्सर बताया। फोन उठाने वाले ब्रांच के हेड कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा थे। जैसे ही वो फोन उठाते हैं, एक आवाज आती है, मैडम पीएम आपसे बात करना चाहती हैं। इसके बाद इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) की आवाज में 60 लाख रुपये की तत्काल डिलीवरी का आदेश दिया जाता है और यही से सारा खेल शुरू होता है।
वेद प्रकाश मल्होत्रा को पहले तो यकीन नहीं होता है लेकिन उनसे यह कहा जाता है कि लीजिये पीएम से बात कर लीजिये। इसके बाद उनके कानों में एक महिला की आवाज आती है, जो उनसे कहती है कि आप ये रुपये ले कर खुद बाइबिल भवन पर आइए, वहां एक व्यक्ति मिलेगा, वो एक कोड वर्ड कहेगा ‘बांग्लादेश का बाबू.’ इसके जवाब में आप कहेंगे बार एट लॉ।’ इसके बाद आप पैसे उसे देंगे और बात को गुप्त रखेंगे।
इसके बाद कैशियर हेड वेद प्रकाश मल्होत्रा पीएम के आदेश का पालन करते हैं, उन्हें लगता है कि मामला गंभीर है। वो उप मुख्य कैशियर राम प्रकाश बत्रा से एक कैश बॉक्स में 60 लाख रुपये रखने के लिए कहते हैं। डिप्टी हेड कैशियर रुहेल सिंह ने रजिस्टर में हुई एंट्री पर अपने दस्तख़त किए। फिर वो गाड़ी में बैठते हैं, बाइबल रोड जाते हैं, कोड वर्ड आपस में साझा होता है और फिर उस व्यक्ति को गाड़ी में बिठा लेते हैं क्योंकि ऐसा ही आदेश आया था। इसके बाद मल्होत्रा ने उस शख्स को सरदार पटेल मार्ग और पंचशील मार्ग के जंक्शन के टैक्सी स्टैंड पर उतारा। वो व्यक्ति 60 लाख रुपये के कैश लेकर उतर जाता है और कैशियर हेड वेद प्रकाश मल्होत्रा को कहता है कि पीएम आवास जाकर बाउचर ले लेना।
उस शख़्स का नाम रुस्तम सोहराब नागरवाला था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वो पहले भारतीय सेना में कैप्टन के पद पर था। साथ ही भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के लिए काम कर रहा था।
रुस्तम सोहराब नागरवाला को अलविदा कहने के बाद वेद प्रकाश मल्होत्रा सीधे पीएम हाउस गए जहाँ उन्हें पता चला की इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) संसद में हैं। वो तुरंत संसद भवन पहुंचे, पीएम तो नहीं मिलीं लेकिन उनके सचिव परमेश्वर नारायण हक्सर मिले। हक्सर को उन्होंने सारी बात बताई, तो वो भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा कि पीमएओ (वर्तमान में सेवा तीर्थ) से कोई फोन नहीं गया है। उन्हें ठग लिया गया है।
मल्होत्रा को तुरंत आदेश मिला कि पुलिस में जाकर FIR करें। इधर इतना सब कुछ घटा था, जबकि दूसरी ओर बैंक में हाय तौबा मचा था कि मल्होत्रा अब तक 60 लाख रुपए के वाउचर लेकर क्यों नहीं लौटे? जब वो वापस नहीं आए तो कैशियर बत्रा ने इस मामले की रिपोर्ट उच्चाधिकारियों से कर दी। संसद मार्ग थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई और इसके बाद पुलिस जाँच में जुट गई।
रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस छानबीन में जुटी और रात करीब पौने दस बजे नागरवाला को दिल्ली गेट के पास पारसी धर्मशाला से दबोच लिया। इसे ऑपरेशन तूफ़ान नाम दिया गया था। नागरवाला जब पकड़ा गया तब डिफेंस कॉलोनी में उसके एक मित्र के घर से 59 लाख 95 हज़ार रुपये बरामद हुए।
जाँच में यह बात सामने आई कि नागरवाला टैक्सी स्टैंड से सीधा राजेंद्र नगर गया और वहां से सूटकेस लिया और फिर पुरानी दिल्ली के निकलसन रोड पहुंचा। ड्राइवर के सामने ही उसने ट्रंक से पैसे निकाले और पैसे को सूटकेस में रखा। ड्राइवर उसका भेद ना खोले, इसके लिए उसने उसे 500 रुपये टिप भी दी।
पुलिस द्वारा दबोचे जाने के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट के पी खन्ना की अदालत में उसका मुकदमा चला जहाँ तीन दिन के भीतर नागरवाला को सजा भी सुना दी गई। ये भारत की न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ था, जब किसी को इतनी जल्दी सजा मिली थी। उसे 4 साल कारावास की सजा मिली थी और 1000 रुपए जुर्माना भी लगाया। अदालत में उसने यह कबूल भी किया कि उसने बांग्लादेश अभियान का बहाना बनाकर मल्होत्रा को बेवकूफ़ बनाया था। हालांकि, बड़ा में वो अपने बयान से मुकर भी गया और अदालत के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की। 28 अक्टूबर 1971 को कोर्ट ने उसकी मांग को ठुकरा दिया।
हैरानी की बात यह है कि ASP डीके कश्यप इस मामले की छानबीन कर रहे थे और 20 नवंबर, 1971 को जब वो अपने हनीमून को जा रहे थे, तब उनकी रहस्य्मयी मौत हो गई। इसके बाद नागरवाला ने साप्ताहिक अख़बार करेंट के संपादक डी एफ़ कराका को एक चिठ्ठी लिखी कि वो उन्हें इंटरव्यू देना चाहता है लेकिन कराका की तबियत ख़राब हो गई, तो उन्होंने अपने असिस्टेंट को इंटरव्यू के लिए भेजा लेकिन नागरवाला ने उसे इंटरव्यू देने से मना कर दिया। फिर फ़रवरी 1972 में अपराधी की तबियत ख़राब हुई, इसके बाद उसे तिहाड़ जेल के अस्पताल में भर्ती किया गया। फिर 21 फ़रवरी को जी बी पंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन 2 मार्च को उसकी हालत बहुत ज्यादा ख़राब हो गई और 2 बजकर 15 मिनट पर उसे हार्ट अटैक आया जहाँ वो मर गया।
फिर 1984 में जब इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) की हत्या हुई थी, तब उसके दो साल के बाद कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई कि नागरवाला रॉ नहीं बल्कि CIA के लिए काम करता था। वो इंदिरा गाँधी की सरकार को बदनाम करना चाहता था। हालांकि, नागरवाला इस बारे में कभी कुछ कह नहीं पाया और जिस पत्रकार को वो इंटरव्यू देना चाहता था, वो भी संभव नहीं हो पाया और उसकी मृत्यु हो गई।
दरअसल, साल 1975 में इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) ने देश में आपातकाल लगाया था। इसके बाद 1977 में चुनाव हुए और वो कांग्रेस की सरकार सत्ता में वापस नहीं आ पाई। मोरारजी देसाई पीएम बने और देश में जनता पार्टी की सरकार आई। सरकार बनते ही जनता पार्टी ने नागरवाला की मौत और इस केस की छानबीन शुरू करवाई, जगनमोहन रेड्डी आयोग बना लेकिन कुछ भी सामने नहीं आया।
बाद में यह कयास लगाए गए कि नागरवाला आर्मी में काम करता था, तो वहां से उसने इंदिरा गांधी की आवाज़ और तौर-तरीकों के बारे में जानकारी एकत्र की। शायद उसे राजनीतिक हस्तियों के साथ बातचीत का अनुभव रहा होगा। साथ ही यह भी कहा जाता है कि वो मिमिक्री का उस्ताद था।
यह भी पढ़ें: टी20 वर्ल्ड कप में भारत की हैट्रिक, तीसरी बार चैंपियन, जानिए अब तक 10 सीजन में किन कप्तानों ने जीती ट्रॉफी?
यह घटना 1971 में हुई थी, करीब 55 साल बीत चुके हैं। नागरवाला की मौत हो चुकी है। ASP डीके कश्यप भी रहस्यमयी तरीके से मर गए, इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) की भी मृत्यु हो चुकी है और अब जनता पार्टी की सरकार भी नहीं है, लेकिन 5 ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब आज भी नहीं मिल पाया है और ये इतिहास में पन्ने में दबकर रह गया है। वो सवाल कुछ इस प्रकार हैं:-
कैशियर ने स्टैंडर्ड बैंक वेरिफिकेशन प्रोसेस को फॉलो क्यों नहीं किया?
क्या नागरवाला अकेले काम कर रहा था, या किसी और को बचा रहा था?
60 लाख रुपये की असली शुरुआत और आखिरी मंज़िल क्या थी?
नागरवाला ने प्रधानमंत्री की आवाज़ को एकदम सही कैसे कॉपी किया?
बिना पूरी जांच के केस को इतनी जल्दी क्यों बंद कर दिया गया?
तो कहानी का सार यही निकलता है कि नागरवाला केस सिर्फ़ एक फ्रॉड नहीं था, बल्कि इसने सिस्टम की पोल भी खोली कि इतनी आसानी से कोई कैसे प्रोटोकॉल को बायपास कर सकता है। हम आज डिजिटल बैंकिंग में फ्रॉड देख रहे हैं लेकिन ऐसे कई घपले पहले भी होते रहे हैं बस जमाने के साथ जुर्म का तरीका भी बदला है लेकिन सुरक्षा उपाय भी तभी सफल होते हैं, जब तकनीक के साथ इंसानी सतर्कता भी बराबर हो।