2026 की शुरुआत में अमेरिका ने ईरान और वेनेज़ुएला पर सैन्य कार्रवाई की, जबकि इससे पहले भी वह ईरान में परमाणु ठिकानों पर हमले, जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या और 1953 में सत्ता परिवर्तन जैसे कदम उठा चुका है।
पिछले दशकों में अमेरिका ने तेल, सुरक्षा हितों, आतंकवाद विरोध और राजनीतिक हस्तक्षेप के नाम पर इराक, लीबिया, अफगानिस्तान, यूगोस्लाविया और पनामा जैसे देशों में सैन्य कार्रवाई की और कई जगह शासन परिवर्तन हुआ।
शीत युद्ध और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं के चलते अमेरिका ने 1983 में ग्रेनेडा पर हमला किया और वैश्विक प्रभाव बनाए रखने, रणनीतिक हित सुरक्षित करने तथा सहयोगी देशों की सुरक्षा के नाम पर बार-बार सैन्य हस्तक्षेप किया।
साल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप जब दोबारा राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने खुद को 'मिस्टर पीस प्रेसिडेंट' (Mr. Peace President) के रूप में दुनिया के सामने रखा। इसी चक्कर में उन्होंने कई बार यह कहा कि उन्हें नोबल पीस प्राइज (Nobel Peace Prize) मिलना चाहिए। 2025 में भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाने का दावा करने वाले ट्रंप अब 2026 की शुरुआत से ही आक्रामक हो चुके हैं। साल 2026 की शुरुआत से 'अंकल सैम' यानी अमेरिका के तेवर काफी आक्रामक दिख रहे हैं।
वेनेज़ुएला पर अटैक करने के बाद अमेरिका (America) ने ईरान पर हमला कर दिया है और खूब तबाही और कत्लेआम मचाया है। हालांकि, ये पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने किसी देश के साथ ऐसा किया है। 75 साल के इतिहास में अमेरिका ईरान समेत 8 देशों पर हमला कर चुका है। यहाँ तक कि एक देश के राष्ट्रपति को फांसी पर भी लटका चुका है। आइये जानते हैं, उन देशों के बारे में।
ताजा मामला ईरान का ही है। 28 फ़रवरी 2026 को अमेरिका (America) ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के 9 से अधिक शहरों पर भीषण हवाई हमले किए, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु हो गई। अमेरिका का कहना है कि उसका उद्देश्य ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को पूरी तरह नष्ट करना है और वहां की सत्ता को बदलना है। इसके साथ ही 22 जून 2025 को अमेरिका ने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर चलाया और ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों नटांज, फोर्डो और इस्फहान पर सीधे बम बरसाए।
इसके आलावा 2020 में अमेरिका (America) ने इराक के बगदाद एयरपोर्ट पर एक ड्रोन हमला किया था, नतीजा यह हुआ कि ईरान की कुद्स फोर्स के शक्तिशाली कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत हो गई थी। वहीं, 18 अप्रैल 1988 को अमेरिका ने ऑपरेशन प्रेयिंग मेंटिस चलाया, जिसमें ईरानी नौसेना के जहाजों और तेल प्लेटफार्मों को निशाना बनाया गया। साथ ही 1953 में भी अमेरिका ने ऑपरेशन एजैक्स चलाकर ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को सत्ता से हटा दिया था क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। अमेरिका के ईरान पर हमले की सबसे बड़ी वजह जो सामने आती है, वो है वहां का तेल भण्डार, जिसपर अमेरिका अपना कब्जा चाहता है।
3 जनवरी 2026 को जब पूरी दुनिया नए साल में प्रवेश कर चुकी थी, तब किसको पता था कि अमेरिका (America) एक नया खेल खेलने जा रहा है, जिसको उसने 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' (Operation Absolute Resolve) कोडनेम दिया था। स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग 2:00 बजे, अमेरिकी सेना राजधानी काराकास और उत्तरी वेनेजुएला के कई हिस्सों में हवाई हमले और बमबारी करती है ताकि वहां के एयर डिफेन्स सिस्टम को खत्म किया जा सके। अमेरिका की डेल्टा फोर्स स्टील्थ हेलीकॉप्टर के जरिये वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति आवास पर उतरती है और हमला शुरू कर देती है।
इस ऑपरेशन में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को अमेरिकी सेना गिरफ्तार कर लेती है और उन्हें न्यूयॉर्क की जेल में बंद कर देती है। इस समय उन पर ड्रग तस्करी और नार्को-टेररिज्म के आरोप में मुकदमा चलाया जा रहा है। बता दें कि वेनेजुएला के पास भी दुनिया का सबसे बड़ा 300 बिलियन बैरल से भी ज्यादा का तेल भंडार है, जिसपर अब अमेरिका का कब्जा हो चुका है।
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यह घटना साल 2011 की है जब अमेरिका (America) ने नाटो देशों के साथ मिलकर लीबिया में सैन्य कार्रवाई की थी। 2011 में लीबिया में एक भीषण जनविद्रोह और गृहयुद्ध हुआ था। गद्दाफी ने इसे कुचलने के लिए अपनी सेना का इस्तेमाल किया। गद्दाफी 42 यानी 1969 से लेकर 2011 तक बिना किसी चुनाव के शासन कर रहा था। लीबिया के पास तेल का भंडारा था लेकिन इसका पूरा फायदा गद्दाफी के परिवार को ही होता था।
इससे वहां के युवाओं के बीच बेरोजगारी बढ़ रही थी और यही आंदोलन की वजह बनी। अमेरिका ने इसी का फायदा उठाया क्योंकि उसके और गद्दाफी के बीच दशकों से तनाव था। गद्दाफी पर पूर्व में आतंकवाद को बढ़ावा देने और अमेरिकी हितों के खिलाफ काम करने के आरोप थे। विद्रोहियों ने राजधानी त्रिपोली पर जब कब्जा किया, तब गद्दाफी वहां से भागा लेकिन 20 अक्टूबर 2011 को वो पकड़ा गया। सिरते में उसकी हत्या कर दी गई। इस जन आंदोलन को समर्थन देने में अमेरिका का पूरा हाथ था।
इतिहास में अमेरिका (America) ने इराक पर कुल 2 बार हमला किया है। सबसे पहले 1990 में जब इराक ने कुवैत पर हमला किया, तब 1991 में अमेरिका ने 'ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म' चलाया और इराक पर हमला किया। कुवैत छोटा देश था और उसके पास तेल का भंडार था और बताया जाता है कि अमेरिका इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था। अमेरिका ने यह हमला करके बताया कि वो कुवैत की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा करना चाहता था, इसलिए ऐसा किया।
इसके बाद 2003 में अमेरिका (America) ने दूसरी बार इराक पर हमला किया। इसे USA ने ऑपरेशन इराकी फ्रीडम बताया, जिसके मकसद था सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाना। सद्दाम हुसैन एक तानाशाह नेता था, जिसने इराक में कत्लेआम मचा रखा था। उसने साल 1982 में दुजैल शहर में 148 लोगों को अपना विरोधी बताकर मौत के घाट उतार दिया था। इस नरसंहार के लिए अमेरिका की अदालत ने सद्दाम हुसैन को मौत की सजा 2006 में दी थी। 30 दिसंबर 2006 को उसे फांसी दे दी गई और अमेरिका ने इसका वीडियो भी बनाया था।
अमेरिका (America) के ट्विन टॉवर्स पर ओसामा बिन लादेन ने 11 सितंबर 2001 को आतंकी हमला किया था, जिसका बदला लेने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान में 'ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम' चलाया। इसके तहत अमेरिकी सरकार ने तालिबान समेत आतंकी संगठन अलकायदा के कई ठिकानों पर बम बारूद बरसाए। अमेरिका ने अफगानिस्तान को अपने कब्जे में लिया और तालिबान के मुल्ला उमर की सरकार को हटा दिया। करीब 20 साल तक अमेरिका ने वहां अपने इशारे पर सरकार चलवाई लेकिन 2021 में फिर से तालिबानी सरकार की वापसी हुई है।
साल 1999 में अमेरिका (America) ने फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूगोस्लाविया के खिलाफ एक्शन लिया। वजह थी राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविक द्वारा कोसोवो में अल्बानियाई लोगों पर जातीय जुल्म ढाना। यह जुल्म देख अमेरिका हरकत में आया और उसने नाटो देशों के साथ मिलकर यूगोस्लाविया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की और कोसोवो को सीधे संयुक्त राष्ट्र के अधीन कर दिया।
इसके बाद साल 2003 में यूगोस्लाविया स्टेट यूनियन ऑफ सर्बिया और मोंटेनेग्रो बना। वहीं, साल 2006 में सर्बिया और मोंटेनेग्रो अलग-अलग आजाद देश बने। फिर 2008 में कोसोवो ने भी खुद को आजाद देश घोषित किया। खास बात यह रही कि अमेरिका समेत कई अन्य देशों ने इसे मान्यता दी लेकिन भारत ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
साल 1989 में अमेरिका (America) ने ऑपरेशन जस्ट कॉज चलाया और पनामा पर हमला किया। इस कार्रवाई का मकसद था, पनामा के तानाशाह शासक मैन्युएल नोरिएगा को सत्ता से हटाना। अमेरिका ने जनरल मैनुअल नोरीगा पर शीली दवाओं की तस्करी के आरोप लगाए थे। इसलिए वो नोरीगा को न्याय के कटघरे में लाना चाहता था। अमेरिका जब हमले का प्लान कर रहा था, उससे पहले ही पनामा में एक अमेरिकी मरीन अधिकारी की हत्या हुई और अन्य नागरिकों के साथ बदसलूकी हुई थी।
राष्ट्रपति जॉर्ज बुश वहां रहने वाले 35,000 अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना चाहते थे। 1989 में जब नोरीगा ने चुनाव के परिणामों को रद्द किया, तब अमेरिका न्याय दिलाने के इरादे से वहां उतरा। डर के कारण जनवरी 1990 में नोरीगा ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसे अमेरिका लाया गया जहाँ उसे 40 साल की जेल की सजा हुई।
1983 में अमेरिका (America) ने ग्रेनेडा में सैन्य कार्रवाई की और इसका नाम 'ऑपरेशन अर्जेंट फ्यूरी' रखा गया। अमेरिका को इस बात का डर था कि कहीं करीब 1000 अमेरिकी छात्रों का जीवन संकट में ना आ जाए जो ग्रेनाडा के सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। कुछ ऐसा ही 1979 में ईरान में हुआ था। इसके साथ ही ग्रेनाडा की सोवियत संघ और क्यूबा से नजदीकियां बढ़ रही थीं।
अमेरिका को डर था कि कहीं ग्रेनाडा कैरेबियन क्षेत्र में कम्युनिस्टों का एक मजबूत अड्डा ना खड़ा हो जाए। हुआ भी कुछ ऐसा ही अक्टूबर 1983 में ग्रेनाडा के प्रधानमंत्री मौरिस बिशप की एक हिंसक तख्तापलट में हत्या कर दी गई, जिसके बाद पड़ोसी कैरेबियन देशों ने अमेरिका से हस्तक्षेप करने की मांग की। अमेरिकी सेना ने कुछ ही दिनों में द्वीप पर काबू पा लिया और सैन्य सरकार को हटाकर लोकतंत्र को बहाल किया।
तो ये थे वो 8 देश जिनपर अमेरिका ने हमला किया था।