उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में तैनात सिपाही सुनील कुमार शुक्ला ने खुलासा किया कि लखनऊ कमिश्नरेट सहित पूरे सूबे में नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार की संगठित व्यवस्था बनी है, जहां सिपाही से शुरू होकर थानेदार, डीएसपी, एसपी तक हर स्तर पर वसूली की रकम पहुंचती है। यह आरोप योगी सरकार के सुशासन दावों और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
उत्तर प्रदेश में सरकारी तंत्र के ढीलेपन और भ्रष्टाचार को लेकर पुलिस वाले ने बड़ा खुलासा किया है। पुलिस ने सिस्टम के भीतर ऊपर के अधिकारियों के बारे में जो खुलासा किया है, वह हैरान करने वाला है। भ्रष्टाचार के मामले में उत्तर प्रदेश ने नया रिकार्ड बनाया है। सिपाही का नाम सुनील कुमार शुक्ला बताया जा रहा है।
उत्तर पुलिस विभाग में कार्यरत एक सिपाही ने सूबे की व्यवस्था को लेकर बड़ा खुलासा किया है। सिपाही ने बताया है कि ऊपर से लेकर नीचे तक के अधिकारियों ने भ्रष्टाचार का नया जाल बनाकर रखा है। सिपाही ने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के पुलिस काले अंग्रेज हो गए हैं। पुलिस विभाग के भीतर ही एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर दिया गया है जिसके तहत भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े कारनामों को अंजाम दिया जा सके।
लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट (Lucknow Police Commissionerate) का उदाहरण देते हुए सिपाही ने बताया कि सबसे नीचे के अधिकारी (सिपाही) से भ्रष्टाचार का पैसा इकट्ठा करवाया जाता है। यह पैसा एक-एक करके क्रम दर क्रम ऊपर के अधिकारियों तक पहुंचता है। यह जो पूरा जाल है, इसमें एसपी, डीएसपी से लेकर पुलिस थाने का थानेदार भी शामिल है। लखनऊ मण्डल का उदाहरण देते हुए सिपाही ने बताया कि वहाँ 8-10 लाख रुपए की वसूली होती है और यह पैसा सभी स्तर के अधिकारियों तक पहुंचाया जाता है।
सरकारी व्यवस्था को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक बयान दिया था कि सरकारी खजाने से एक रुपए जनता को भेजा जाता है तो जनता तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं। यह बयान आज भी प्रासंगिक है। पिछले दस साल से उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है। योगी आदित्यनाथ सूबे के मुख्यमंत्री हैं। सरकारी नौकरी को लेकर युवाओं के बीच नाराजगी देखने को मिल रही है। वहीं सरकारी विभाग से इस तरीके की खबरें सामने निकलकर आ रही हैं जो इस बात की गवाही दे रही हैं कि सरकारी विभाग में व्यापक स्तर पर बदलाव की जरूरत है।
सरकार के कामकाज को लेकर सवाल केवल एक दिन ही नहीं उठते, बल्कि कई सालों से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। एक तरफ यह आरोप लगाया जाता है कि पुलिस विभाग में पैसे की कमिशनखोरी आम बात हो गई है तो दूसरी तरफ प्रशासन के सुस्त रवैये पर भी सवाल लगातार खड़े होते रहे हैं। साल 2020 की बात है, हाथरस में मनीषा नाम की दलित युवती का रेप हुआ था। उत्तर प्रदेश पुलिस ने उस युवती की लाश को पेट्रोल छिड़ककर जला दिया। पुलिस ने युवती के घर वालों को भी इसकी सूचना नहीं दी थी। बाद में जब यह मामला प्रकाश में आया तो पुलिस विभाग पर बहुत सारे सवाल खड़े हो गए थे।
उस समय के मुख्यमंत्री योगी आदियानाथ भी इस मामले में बचते नजर आए और उन्होंने कोई विशेष कार्रवाई पुलिस वालों पर नहीं किया था। प्रायः ये कहा जाता है कि पुलिस विभाग के अधिकारी सरकार के आदेशों पर काम करते हैं, तो ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार के किस मंत्रालय से पुलिस विभाग को यह आदेश मिला था कि मनीषा की लाश को पेट्रोल छिड़ककर जला दिया जाए? सिपाही सुनील कुमार मिश्रा को सही माना जाए तो सवाल ये भी उठता है कि BJP की सरकार में किसने अधिकारियों को पैसे देकर मनीषा को पेट्रोल छिड़ककर जलाने का आदेश दिया था?
सरकारी विभाग में लगातार भ्रष्टाचार का दीमक बढ़ता जा रहा है। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक बीमारी है। पुलिस विभाग ही नहीं, अन्य विभागों का भी यही हाल है। बिना पैसे का कहीं कोई काम जल्दी नहीं होता है, यह बात अब आम जनता खुलेआम बोल रही है। योगी सरकार को अपने 'बुलडोजर न्याय' से इतर अपने ही तंत्र के भीतर पनप रहे इस भ्रष्टाचार के कैंसर पर कड़ी चोट करने की आवश्यकता है।
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