आजादी से पहले ब्रिटिश काल में फांसी पाने वाली बुलबुल और स्वतंत्र भारत में पहली न्यायिक फांसी का सामना करने वाली रतन बाई जैन की मार्मिक दास्तां है। जहां रतन बाई ने वैवाहिक कलह और संदेह के चलते तीन नर्सों को जहर देकर मार डाला, वहीं बुलबुल ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक अत्याचारी अंग्रेज अधिकारी को मौत के घाट उतारा था।
भारतीय सामाजिक संरचना में महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखा गया था। लेकिन समाज के निर्माण में महिलाओं की भूमिका प्राथमिक और महत्वपूर्ण होती है। यह कहानी दो महिलाओं की है जिनमें से एक को आजादी के पहले फांसी दी गई, दूसरी को आजादी के बाद फांसी दी गई। आइए क्रम से दोनों के बारे में समझते हैं।
बुलबुल की कहानी ब्रिटिश कालखंड की है। बुलबुल का जन्म वर्ष 1850 में लखनऊ (Lucknow) में एक मुस्लिम परिवार (Muslim family) में हुआ था। उनके पिता मुमताज हसन लखनऊ में क्रांतिकारी की भूमिका में देश की लड़ाई लड़ने वालों में से एक थे।
जब बुलबुल बहुत छोटी बच्ची थीं, तभी ब्रिटिश शासन के हाथों पिता की मौत होने पर बुलबुल अपनी बहन गौरैया के साथ हरियाणा के पानीपत चली गईं। रोटी कमाने के लिए उन्होंने काम की तलाश की लेकिन कोई खास काम नहीं मिला जिससे रोजी-रोटी चल सके।
इसके बाद बुलबुल ने रोशन महल (तत्कालीन सराफा बाजार क्षेत्र) का ठिकाना लिया। यह ठिकाना वेश्यावृत्ति के लिए प्रसिद्ध था। बुलबुल इस क्षेत्र में कदम रख चुकी थीं और पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।
दरअसल, यह भारतीय इतिहास का ब्रिटिश कालखंड था। साल 1888-89 की बात है। करनाल क्षेत्र का ब्रिटिश जिला कलेक्टर (British District Collector) उस समय रात में कोठे पर पहुंचा। यहाँ पहुंचते ही उसने बुलबुल एवं अन्य महिलाओं के साथ अनैतिक व्यवहार करना शुरू कर दिया। इससे बुलबुल के स्वाभिमान को ठेस पहुंची। बुलबुल ने कोठे की सभी महिलाओं को साथ में लिया और अंग्रेज अधिकारी को सबक सिखाने निकल पड़ीं। महिलाओं के समूह ने अंग्रेज अधिकारी को लाठियों से पीटकर मार डाला। इसके बाद लाश को सीढ़ियों से फेंक दिया।
अंग्रेज अधिकारी को मारने की खबर जैसे ही तत्कालीन प्रशासन को मिली, रोशन महल को घेर लिया गया। इसके बाद बुलबुल (Bulbul) को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
लोगों ने चंदा इकट्ठा करके बुलबुल के वकील को दी फीस और जज का फैसला था एकतरफा
बुलबुल (Bulbul) के लिए आम जनता के बीच से आवाज उठने लगी थी। स्थानीय लोगों ने मिलकर बुलबुल के लिए चार वकील किए। बुलबुल (Bulbul) के वकीलों ने लगभग यह साबित कर दिया कि अंग्रेज अधिकारी की ही गलती थी। लेकिन 10 मार्च 1889 रविवार के दिन जज विलियम हडसन (William Hudson) ने बुलबुल को फांसी की सजा सुना दी।
तवायफ बाजार के बाहर बीच चौराहे पर 8 जून 1889 को बुलबुल को फांसी दे दी गई। स्थानीय लोग बुलबुल से इतना स्नेह करते थे कि उन्होंने चौराहे और आसपास के बाजार को बुलबुल बाजार (Bulbul Market) नाम दे दिया। जिस चौक पर बुलबुल को फांसी दी गई थी, आज उसे संजय चौक कहा जाता है।
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साल 1950 के दशक में जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना मुश्किल था, उस समय रतन बाई (Ratan Bai Jain) दिल्ली में स्वास्थ्य विभाग में एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में काम करती थीं। रतन बाई शादीशुदा थीं, लेकिन उनके वैवाहिक जीवन में भारी उथल-पुथल चल रही थी। रतन बाई के क्लिनिक में कुछ महिलाएं भी नर्स के रूप में काम करती थीं। उनके पति भी क्लिनिक में आया करते थे। कुछ ही समय में रतन बाई (Ratan Bai Jain) को शक हुआ कि उनके पति क्लिनिक में ही तीन महिलाओं के संपर्क में आ चुके हैं।
रतन बाई ने किसी हथियार का इस्तेमाल करने के बजाय जहर से तीनों लड़कियों को मार डाला। उस समय सामने आए सबूतों के अनुसार, उसने घातक पदार्थ को लड़कियों के खाने या पीने की चीजों में मिला दिया था। जहर इतना तीव्र था कि तीनों लड़कियों की उसे पीते ही तुरंत मौत हो गई।
रतनबाई जैन (Ratan Bai Jain) को 3 जनवरी1955 को फांसी दे दी गई, जिससे स्वतंत्र भारत में किसी महिला को फांसी दिए जाने का यह पहला मामला इतिहास में दर्ज हुआ। आधिकारिक रूप से दर्ज रिकॉर्ड में वह आज भी न्यायिक फांसी का सामना करने वाली एकमात्र महिला हैं।
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