अपने 32 साल के बेटे के ईलाज में परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी l सब कुछ त्यागने के लिए राजी हो गए चाहे वह अपना घर, अपनी जमीन-जायदाद या अन्य कोई पुरखों की संपत्ति l अपने बेटे को बचाने के लिए परिवार वालों ने सब कुछ दाँव पर लगा दिया l X
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सबको माफ़ करके जाओ...', जमीन गई, मकान बिका और अब बेटा भी नहीं रहेगा? हरीश राणा की दर्दनाक कहानी

अपने 32 साल के बेटे के ईलाज में परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी l सब कुछ त्यागने के लिए राजी हो गए चाहे वह अपना घर, अपनी जमीन-जायदाद या अन्य कोई पुरखों की संपत्ति l अपने बेटे को बचाने के लिए परिवार वालों ने सब कुछ दाँव पर लगा दिया l

Author : न्यूज़ग्राम डेस्क

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की इच्छामृत्यु वाले अर्जी को स्वीकृति दे दी है l हरीश का परिवार अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर उसका खर्च उठा रहा था l लेकिन अब सब कुछ बिक जाने के बाद कुछ बचा ही नहीं दाँव पर लगाने के लिए या कुछ बेच कर पैसे निकलने के लिए l ऐसे समय में परिवार ने अपना दिल पत्थर कर के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)  से गुहार लगाई कि उसके बेटे को इच्छा मृत्यु दे दी जाए l कोर्ट ने भी उनकी आर्थिक स्थिति  को ध्यान में रखते हुए अंत में यह ऐतिहासिक फैसला सुना ही दिया l यह भारत में पहला ऐसा केस है जहाँ किसी को इच्छा मृत्यु के लिए अनुमति मिली l यह कहानी आप सभी को रुला देगी, यह वास्तव में इतनी मार्मिक है कि….अब समझते है क्या है पूरा मामला l 

हरीश राणा (Harish Rana) चंडीगढ़ की एक इंजीनियरिंग कॉलेज से अपनी पढ़ाई कर रहे थे और वहीं आसपास के इलाके में एक पी.जी, (PG) में रहते थे l हर दिन कि तरह उनका आना जाना लगा था l लेकिन शायद उन्हें पता नहीं था कि 20 अगस्त 2013 उनके खुशहाल जीवन का आखिरी दिन होगा l कुछ रिपोर्ट्स में यह बताया गया है कि उस दिन वो अपनी PG के चौथी मंजिल की सीढ़ियों से गिरे, तुरंत उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और बाद में पता चला कि वह कोमा (Coma)  में चले गए हैं l यह खबर उनके परिवार के लिए एक शोक संदेश की तरह ही था l अपने नौजवान बेटे को इस हालत में देखना उनके परिवार वाले ही इस दुःख को समझ सकते है l 

अपने 32 साल के बेटे के ईलाज में परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी l सब कुछ त्यागने के लिए राजी हो गए चाहे वह अपना घर, अपनी जमीन-जायदाद या अन्य कोई पुरखों की संपत्ति l अपने बेटे को बचाने के लिए परिवार वालों ने सब कुछ दाँव पर लगा दिया l चंडीगढ़ से दिल्ली तक इलाज चला लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकला, बेटे की तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ, बाकी सब नष्ट होते चला गया l देखते-देखते माँ-बाप ने सब गँवा दिया और एक तरह से कंगाल हो गए l अब बेटे के बचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती देख उन्हें अस्पताल से घर लाया गया l 

उनकी माँ दिन-रात अपने बेटे के सेवा में लगी रही और ध्यान रख रही थी l लेकिन फिर भी कोई सुधार नहीं हुआ l कई वर्षों के परिश्रम के बावजूद कोई फल नहीं मिला तो मजबूरन माँ-बाप ने अपने दिल को पत्थर बनाकर सुप्रीम कोर्ट में  इच्छा मृत्यु के लिए अर्जी दायर करी l शुरूआती दौर में 1-2 बार कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी l  वर्ष 2024 में 9 जुलाई को दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कि थी Harish Rana वेंटीलेटर पर नहीं थे और वे प्राकृतिक तरीके से सांस ले रहे थे l इसलिए उस समय कोर्ट ने उनकी इच्छा मृत्यु वाली याचिका ख़ारिज कर दी l फिर उसी साल नवम्बर महीने में परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन उन्हें निराश हो कर वापस आना पड़ा l उस समय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड की बेंच के कहा कि मरीज पूर्ण रूप से मशीनों पर निर्भर नहीं है और सरकार को सूचित किया कि मरीज को home-based care दी जाए l उस समय सुप्रीम कोर्ट ने सीधे Euthanasia की अनुमति नहीं दी l वर्ष 2026 मार्च 11 को हालात बिगड़ते देख अंत में Passive Euthanasia की अनुमति प्रदान करी l 

लेकिन जब सब कुछ गंवाने के बाद अब बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं बचे तो कोर्ट ने भी उनकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia)  की अनुमति प्रदान किया l  अब उनकी देख रेख AIIMS दिल्ली अस्पताल में पैलिएटिव केयर वार्ड के आंकोएनेस्थीसिया एवं पैलिएटिव केयर के विशेषज्ञ आठ से नौ डॉक्टरों की टीम के नेतृत्व में होगा l इस टीम में अलग-अलग कई विभागों के चिकित्सक शामिल है l उन्हें अब कोई वेंटिलेटर सपोर्ट नहीं दिया जाएगा l  एम्स के नर्सिंग कर्मचारी और डॉक्टर उनकी देखभाल कर रहे हैं l बता दें कि अब अस्पताल में उनका पैलिएटिव तरीके से देखभाल  होगा l आसान शब्दों में कहे तो मरीज को बिना किसी कष्ट और दर्द के बिना उनका ध्यान रखना और वह कई दिनों तक इस प्रक्रिया से गुजरेंगे जब तक उनकी प्राकृतिक तरीके से मृत्यु नहीं होती l 

सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद अब उनके घर से उनकी आखिरी विदाई हो चुकी है l उनकी अंतिम विदाई से पहले पहले उनके घर पर राजयोग मेडिटेशन कराया गया। उनकी अंतिम विदाई में शामिल होने के लिए मोहननगर स्थित ब्रह्माकुमारीज राजयोग मेडिटेशन केंद्र की संचालिका बीके लवली दीदी पहुंची और कहने लागी की  “जाओ हरीश, वक्त आ गया। सबको माफ़ करते हुए जाओ l तुम्हारी तकलीफों के बस कुछ पल और बचे हैं। अब तुम्हारा लाइफ सपोर्ट सिस्टम एक-एक कर हटा दिया गया है और तुमको कष्टों से मुक्ति मिलने वाली है l 

अब जानते है इच्छा मृत्यु किन किन देशों में लागू है ?

यह वो देश है जहाँ नागरिकों को सक्रीय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia) या सहायता प्राप्त आत्महत्या (Assisted Suicide) की अनुमति सख्त मेडिकल जाँच और कानूनी शर्तों से मिलती है l 

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) की अनुमति देने वाले देश:

इन देशों में डॉक्टर सीधे तौर पर मरीज को घातक दवा देकर जीवन समाप्त करने में मदद कर सकते हैं:

नीदरलैंड (Netherlands): 2002 में इसे वैध बनाने वाला दुनिया का पहला देश।

बेल्जियम (Belgium): यहाँ लाइलाज मानसिक पीड़ा के मामलों में भी अनुमति मिल सकती है।

कनाडा (Canada): यहाँ इसे 'MAID' (Medical Assistance in Dying) कहा जाता है।

कोलंबिया (Colombia): यह दक्षिण अमेरिका का एकमात्र देश है जहाँ यह वैध है।

लक्ज़मबर्ग (Luxembourg): 2009 से कानून प्रभावी है।

स्पेन (Spain): 2021 में कानून पारित किया गया।

न्यूज़ीलैंड (New Zealand): 2021 से लागू।

इक्वाडोर (Ecuador): 2024 में संवैधानिक अदालत के फैसले के बाद वैध।

सहायता प्राप्त आत्महत्या (Assisted Suicide) की अनुमति देने वाले देश

यहाँ डॉक्टर दवा तैयार कर देते हैं, लेकिन मरीज को उसे खुद लेना पड़ता है:

स्विट्जरलैंड (Switzerland): यहाँ 1942 से यह कानूनन संभव है।

ऑस्ट्रिया (Austria): 2022 से कुछ गंभीर स्थितियों में अनुमति दी गई है।

जर्मनी (Germany): अदालती फैसलों के आधार पर इसे मानवीय अधिकार माना गया है।

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): यहाँ पूरे देश में नहीं, बल्कि केवल कुछ राज्यों में वैध है (जैसे ओरेगन, वाशिंगटन, कैलिफोर्निया, और कोलोराडो)।

ऑस्ट्रेलिया (Australia): ऑस्ट्रेलिया के सभी राज्यों (जैसे विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स आदि) में 'सहायता प्राप्त मृत्यु' (Voluntary Assisted Dying) के अलग-अलग नियम लागू हैं।

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