

लगभग 12 साल तक इलाज के बाद भी हरीश की हालत में सुधार नहीं हुआ, इसलिए उनके माता-पिता ने कई बार अदालत में पैसिव यूथेनेसिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मांगी।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने मानवीय आधार पर हरीश राणा का मेडिकल लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दे दी और कहा कि यह जीवन की गरिमा के सिद्धांत के अनुरूप है।
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेसिया को कानूनी मान्यता दी और कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है, जबकि सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी अवैध है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा नाम के एक शख्स को पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दी है। सुप्रीम कोर्ट के जज जे बी परदीवाला ने यह फैसला 11 मार्च 2026 को सुनाया। लगभग 12 साल से कोमा में भर्ती हरीश राणा के पिता ने बहुत बार विनम्रता से जज से इस मामले पर फैसला सुनाने का आग्रह किया था।
दरअसल, हरीश राणा के पिता अशोक राणा उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के रहने वाले हैं। हरीश साल 2013 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पंजाब गए थे। उस समय अपने पीजी के चौथी मंजिल से अचानक गिर गए थे। यह दिन रक्षाबंधन का था। हरीश उस समय लगभग 20 साल के थे। माता-पिता द्वारा बच्चे के इलाज कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। लेकिन हरीश की हालत में बिल्कुल सुधार नहीं हुआ था।
बच्चे के इलाज हेतु माता-पिता ने अपने दिल्ली के घर को बेच दिया था। हरीश की हालत में बिल्कुल सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे माता-पिता की यह उम्मीद अब टूट रही थी कि बच्चे की हालत में सुधार हो सकता था।
हरीश के पिता, अशोक राणा ने साल 2018 में भी हरीश के हालत को देखते हुए अदालत में यह गुहार लगाई थी कि बच्चे को पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दी जाए परंतु इसकी इजाजत उस समय अदालत ने नहीं दी।
फिर साल 2023 में भी याचिका दायर की गई थी लेकिन हरीश के लिए अदालत ने उस समय यह आदेश नहीं दिया था और याचिका को निरस्त कर दिया गया। पिता अशोक राणा और माँ की उम्मीद अब बिल्कुल खत्म हो चुकी थी कि बच्चा हरीश अब कभी ठीक हो सकता है, इसलिए माता-पिता ने अदालत का दरवाजा फिर से खटखटाया।
दिसंबर 2025 में हरीश के पिता अशोक राणा ने अदालत में फिर से याचिका दायर की और बताया कि हरीश की हालत में बिल्कुल सुधार नहीं हो रही है और आगे भविष्य में उसकी हालत में सुधार होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की सुनवाई की और 11 मार्च 2026 को हरीश के लिए पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दे दी।
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सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जेबी परदीवाला (Justice JB Pardiwala) ने इस मामले की सुनवाई करते हुए परिवार वालों के हिम्मत को सराहा। परिवार वालों से जज ने कहा कि आप अपने बच्चे को सिर्फ ऐसे ही जाने नहीं दे रहे हैं, बल्कि आप उसको गरिमा के साथ जाने की इजाजत दे रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी मौत नहीं बल्कि त्याग होती है।
जज ने शेक्सपियर के नाटक हैमलेट के एक लाइन का जिक्र करते हुए कहा कि ‘होना या न होना (To be, or not to be)’ वाक्य आज कोर्ट के समक्ष एक मार्गदर्शन की भूमिका में है, जब सामने जीवन बनाम गरिमा का का प्रश्न है। इस मामले में दो में से किसी एक का चुनाव करना है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की दो सदस्यीय बेंच ने इस मामले पर फैसला देते हुए कहा कि (It is permissible to withdraw CAN (medical support) to Harish Rana in a humane manner) जीवन रक्षक उपाय हटाना कानून के दृष्टि में भी सही है और और मानवीय दृष्टि से भी सही है। जज ने यह भी कहा कि देश की सरकार को इस मामले से संबंधित कानून भी बनाना चाहिए।
पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) वैसे तो भारत में 2018 के पहले वैध नहीं था। लेकिन भारत में साल 2018 में पैसिव यूथेनेसिया की वैधता को स्वीकार कर लिया गया। दरअसल, साल 1973 में अरुणा शानबाग नामक महिला का यौन शोषण हुआ था। यह शोषण इतना दर्दनाक था कि महिला उसी समय से कोमा में थी।
अरुणा शानबाग के नाम से साल 2009 में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी कि अरुणा के लिए पैसिव यूथेनेसिया अर्थात सक्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दी जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने 7 मार्च 2011 को इसकी इजाजत देने से इनकार कर दिया। अरुणा शानबाग की मृत्यु मई 2015 में हो गई। वह लगभग 42 वर्षों तक मौत के जंग से जूझती रही।
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वर्ष 2018 में 'कॉमन कॉज बनाम भारत संघ' (Common Cause vs Union of India) मामले में पाँच जजों की पीठ ने फैसला सुनाया। इस पीठ में जस्टिस दीपक मिश्रा (Justice Dipak Misra) जो कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) थे, जस्टिस ए.के. सीकरी (Justice A.K. Sikri), जस्टिस ए.एम. खानविलकर (Justice A.M. Khanwilkar), जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ (Justice D.Y. Chandrachud), जस्टिस अशोक भूषण (Justice Ashok bhushan) शामिल थे।
पीठ ने अपने फैसले में बताया कि गरिमा के साथ मृत्यु को प्राप्त होने का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। साथ में पीठ ने कहा कि कोई भी 18 वर्ष से ऊपर का शख्स अपने वसीयत में यह घोषणा कर सकता है कि भविष्य में उसके लाइलाज होने की स्थिति में उसे किसी भी प्रकार के मेडिकल लाइफ सपोर्ट के आधार पर जीवित न रखा जाए।
इसी के साथ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई शख्स यह वसीयत नहीं किया और कोमा में है तो फिर उसके घर वालों में सेs बेहद करीबी (जैसे माता-पिता) दो लोग कोर्ट में अपील कर सकते हैं।
भारत में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु (मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके) को ही कानूनी इजाजत है, किसी भी प्रकार से सक्रिय इच्छामृत्यु (जैसे इंजेक्शन देकर मारना) को दंडनीय अपराध माना गया है।