राम मंदिर चढ़ावा चोरी और अयोध्या में जमीन घोटाले ने भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या धार्मिक नगरी से रियल एस्टेट हब बनी, जहां सर्किल रेट से कई गुना अधिक कीमत पर जमीन सौदे हुए। दलित परिवारों से संदिग्ध तरीके से जमीन खरीद, अफसरों के रिश्तेदारों की संलिप्तता और दबाई गई जांच रिपोर्ट ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया।
अयोध्या: हाल ही में राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में भाजपा सरकार चारों तरफ से घिरती नजर आ रही है। मंदिर से हुई चोरी की खबर में चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव भी चपेट में आ गए हैं। हालांकि, इन लोगों पर अभी तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है। लेकिन मामला सिर्फ राम मंदिर में चोरी का नहीं है, बल्कि पूरे अयोध्या में जमीन खरीद-फरोख्त का मामला सुनियोजित तरीके से हुआ है। आइए समझते हैं पूरी कहानी।
अयोध्या में सिर्फ राम मंदिर में चोरी का मामला नहीं है। दरअसल, राम मंदिर (Ram Mandir) में हुई चोरी ने एक बार फिर अयोध्या के उस विवाद की तरफ लोगों का ध्यान खींचा है। 9 नवंबर 2019 को राम मंदिर (Ram Mandir) पर फैसला जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया, अयोध्या धार्मिक नगरी से रियल एस्टेट नगरी (Real Estate city) में तब्दील होती चली गई। जमीन की कीमतें सातवें आसमान पर पहुँचने लगीं। 22 जनवरी 2024 राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तक कई वीवीआईपी (VVIP) लोगों ने अयोध्या का दौरा किया और मंदिर में दर्शन के साथ जमीन की सौदेबाजी भी हुई। इसी बीच खबर निकलकर आई कि सर्किल रेट से कई गुना ज्यादा कीमत पर अयोध्या की जमीन खरीदी और बेची गई।
बता दें कि रहाता माझा गाँव में महर्षि रामायण विद्यापीठ ट्रस्ट (Maharishi Ramayan Vidyapith Trust) ने 90 के दशक में जमीन खरीदी थी। आरोप लगे कि 21 बीघा जमीन दलित परिवारों से एक दलित कर्मचारी को माध्यम बनाकर खरीदी गई। दलित कर्मचारी के नाम पर दानपत्र तैयार हुआ। बाद में यह जमीन ट्रस्ट के नाम कर दी गई। साल 2019 में दलित ग्रामीण महादेव ने शिकायत की कि जमीन का हस्तांतरण अवैध तरीके से हुआ है। साल 2021 में मामला राजस्व न्यायालय पहुँचा। बाद में जमीन को राज्य में निहित करने योग्य घोषित कर दिया गया।
इस ट्रस्ट के माध्यम से जिन गतिविधियों को अंजाम दिया गया, उनमें कुछ प्रशासनिक महकमे में काम करने वाले लोगों के रिश्तेदारों के नाम आए। इनमें चीफ रेवेन्यू कमिश्नर पुरुषोत्तमदास गुप्ता के रिश्तेदार, डिविजनल कमिश्नर के रिश्तेदार और डीआईजी दीपक कुमार के रिश्तेदारों के नाम सामने निकलकर आए।
गौरतलब है कि अयोध्या में जो जमीनें वीआईपी (VVIP) लोगों द्वारा खरीदी गईं, वे वीआईपी एरिया में आती हैं। सवाल यह उठता है कि यह सिर्फ संयोग था या कुछ और, क्योंकि जिन लोगों ने जमीनें खरीदीं, उनमें से ज्यादातर लोग उन्हीं अफसरों के रिश्तेदार थे, जो जांच टीम का हिस्सा थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए सख्त जांच के आदेश दिए। इस जांच से संबंधित रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई। फाइल सार्वजनिक न किए जाने पर बहुत से लोगों के मन में संदेह पैदा हुआ और तमाम सवाल खड़े होने लगे।
इस पूरे प्रकरण में विपक्ष सरकार पर हमलावर है। एक तरफ जहाँ राम मंदिर (Ram Mandir) में हुई चोरी के मामले में चंपत राय और अन्य पर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई, जिसे लेकर कहा जा रहा है कि सरकार बड़ी मछलियों को बचाना चाहती है। वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में दलित परिवारों से जबरदस्ती अवैध रूप से जमीन खरीदने वाले तमाम अफसरों के रिश्तेदारों के नाम सामने आए, जिसकी जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।
ऐसे वक्त में भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि जिस राम मंदिर (Ram Mandir) का नाम लेकर वह सत्ता में आई थी, उसी राम मंदिर से जुड़े मामलों ने अब चारों तरफ से भाजपा को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
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