भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र (Democracy) है, जहाँ कहा जाता है कि सत्ता जनता के हाथ में होती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त अक्सर इससे अलग नज़र आती है। जैसे ही किसी ताक़तवर नेता की अचानक मौत हो जाती है या वह किसी बड़े घोटाले में फँसकर जेल चला जाता है, वैसे ही रातों रात उनकी पत्नी को कुर्सी मिल जाती है। जैसे अभी 28 जनवरी 2026 को अजीत पवार (Ajit Pawar) की प्लेन दुर्घटना में मौत के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार (Sunetra Pawar) को महाराष्ट्र का उपमुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister of Maharashtra) बना दिया गया।
सवाल ये उठता है कि यह जनता की पसंद थी या फिर सत्ता बचाने की मजबूरी? दरअसल, भारतीय राजनीति में यह कोई नया चलन नहीं है। इसे सहानुभूति, परिवार का वोट बैंक और राजनीतिक पकड़ बचाने का सबसे आसान तरीका माना जाता है। पति के नाम, चेहरे और लोकप्रियता के सहारे पत्नी को आगे कर दिया जाता है, ताकि सत्ता की कमान उसी परिवार में बनी रहे। तो आइए समझते हैं कि आखिर पति के देहांत के बाद पत्नी को सीधे कुर्सी क्यों ट्रांसफर कर दी जाती है और भारतीय राजनीति में किन-किन महिलाओं को यह “सौभाग्य” मिला है।
किसी साधारण परिवार में यदि किसी की मौत हो जाए या फिर जेल जाने जैसी घटना होती है तो यह पूरे परिवार के लिए एक सदमें की तरह होता है लेकिन राजनीति में ऐसा बिल्कुल नहीं है, राजनीति में इस चीज को एक मौके की तरह लिया जाता है। राजनीति में पति की मौत या जेल जाने के बाद पत्नी को सीधे कुर्सी मिल जाती है और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पार्टियों को सबसे पहले अपनी सीट और वोट बैंक बचाने की चिंता रहती है। ऐसे समय में परिवार का नाम ही सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है, क्योंकि जनता उस नेता को नहीं, बल्कि उसके परिवार और पहचान को वोट देती है।
साथ ही, दुखद हालात में सहानुभूति की लहर (Sympathy Vote) भी काम करती है, जिससे चुनाव जीतना आसान हो जाता है। कई बार पार्टी के पास कोई मजबूत स्थानीय चेहरा नहीं होता, इसलिए जल्दबाज़ी में पत्नी को आगे कर दिया जाता है और असली राजनीतिक फैसले पीछे से वही लोग लेते हैं जो पहले सत्ता चला रहे थे। बिहार में लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में फँसने के बाद राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया जाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, वहीं तमिलनाडु में एम. करुणानिधि की मौत के बाद परिवार के लोगों का सत्ता में बने रहना भी इसी राजनीति को दिखाता है। कुल मिलाकर यह जनता की सरकार से ज़्यादा सत्ता को परिवार में बनाए रखने की राजनीति बन जाती है।
बिहार की राजनीति में राबड़ी देवी (Rabri Devi) का मुख्यमंत्री बनना भारत के सबसे चर्चित उदाहरणों में गिना जाता है। साल 1997 में चारा घोटाले में नाम आने के बाद लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। सत्ता हाथ से न जाए, इसके लिए उसी दिन यानी 25 जुलाई 1997 को उनकी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। खास बात यह थी कि राबड़ी देवी का इससे पहले राजनीति से कोई अनुभव नहीं था, वे पूरी तरह घरेलू जीवन में थीं। ऐसा कहा जाता है कि जब उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए अपना नाम लिखना सीखा। इसके बावजूद पार्टी और परिवार के फैसले से उन्हें राज्य की सबसे बड़ी कुर्सी सौंप दी गई। इस दौरान माना गया कि असली सत्ता पीछे से लालू यादव ही चला रहे थे, इसलिए यह मामला भारतीय राजनीति में “Proxy CM” का सबसे चर्चित और बहस वाला केस बन गया।
सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने अपने पति पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजीव गांधी की हत्या 21 मई 1991 को श्रीपेरंबुदूर, तमिलनाडु में हुई थी जब वे चुनाव प्रचार कर रहे थे। शुरुआत में सोनिया गांधी राजनीति में नहीं आना चाहती थीं, लेकिन समय के दबाव और पार्टी की मुश्किल स्थिति के चलते उन्होंने 1997 में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली और फिर 14 मार्च 1998 को कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभाली। यह उनके लिए बड़ा मोड़ था क्योंकि पार्टी ने उन्हें नेतृत्व दिया ताकि वह गांधी परिवार की विरासत को आगे ले जाएँ और पार्टी को मजबूत करें। इसके बाद उनके नेतृत्व में कांग्रेस की पार्टी ने 2004 और 2009 के आम चुनावों में जीत हासिल की और UPA गठबंधन की सरकार राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में आया।
हरियाणा की राजनीति में प्रेमलता चौटाला (Premlata Chautala) का, नाम काफी महत्वपूर्ण है| साल 2013 में INLD सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला (Om Prakash Chautala) को शिक्षक भर्ती घोटाले में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल भेजा गया। इसके बाद 2014 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उनकी पत्नी प्रेमलता चौटाला को आगे किया और वे कालका सीट से विधायक बनीं। माना गया कि इससे चौटाला परिवार का राजनीतिक प्रभाव बना रहेगा और सीट हाथ से नहीं जाएगी। इस पूरे मामले में सत्ता और संगठन पर परिवार का नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति साफ़ नज़र आती है।
Also Read: सूअर की चर्बी या बीफ...तिरुपति लड्डू में क्या था? CBI की चार्जशीट से खुला राज
पश्चिम बंगाल (West Bengal) की राजनीति में मंजुला मंडल (Manjula Mandal) का मामला भी पति के जेल जाने के बाद कुर्सी संभालने के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। उनके पति, जो तृणमूल कांग्रेस (TMC) के स्थानीय विधायक थे, साल 2016–17 के आसपास एक घोटाले के मामले में गिरफ्तार होकर जेल चले गए। इसके बाद पार्टी को डर था कि इलाके में बना राजनीतिक प्रभाव कमजोर न पड़ जाए, इसलिए मंजुला मंडल को ही टिकट दिया गया और उन्हें सक्रिय राजनीति में आगे लाया गया। माना गया कि इससे सहानुभूति वोट मिलेगा और पार्टी की सीट सुरक्षित रहेगी। यह मामला भी दिखाता है कि राज्य की राजनीति में सत्ता बचाने के लिए परिवार को आगे करना एक आम रणनीति बन चुकी है।
2024 में अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के शराब नीति घोटाले (excise policy scam) से जुड़े मामले में Enforcement Directorate ने गिरफ्तार किया था। ऐसा लग रहा था कि अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) के गिरफ्तार होने के बाद उनकी पत्नी डायरेक्ट सत्ता में नजर आएंगी। हालांकि उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल (Sunita Kejriwal) कभी भी दिल्ली की मुख्यमंत्री नहीं बनी और ना ही उन्हें कोई सरकारी पद सौंपा गया लेकिन उन्होंने अपने पति के समर्थन में और आम आदमी पार्टी की तरफ कई मीडिया ब्रीफिंग और रेलिया में अपना समर्थन दिखाया है। सुनीता केजरीवाल मीडिया में अपने पति के समर्थन में कई बार सामने आई हैं और AAP की तरफ़ से पार्टी का मैसेज देती रही हैं, लेकिन उन्होंने सत्ता (मुख्यमंत्री) का पद ग्रहण नहीं किया।