पुडुचेरी में 2026 के विधानसभा चुनाव (2026 Assembly elections in Puducherry) का माहौल है। सत्ता, गठबंधन और रणनीति सब कुछ दांव पर लगा है। लेकिन इस चुनावी हलचल के बीच एक नाम बार-बार चर्चा में है एन. रंगासामी। ये वही नेता हैं, जिन्होंने कभी कांग्रेस के अंदर ही ऐसी बगावत की थी कि पूरी पार्टी की जड़ें हिल गई थीं। कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि “सम्मान बनाम राजनीति” की भी है। जब इन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया, तो इन्होंने चुप रहने के बजाय अपनी अलग राह चुनी नई पार्टी बनाई और वही कांग्रेस, जिसने उन्हें हटाया था, उसे चुनाव में हराकर सत्ता छीन ली। आज वही रंगासामी एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं और उनका राजनीतिक सफर यह साबित करता है कि कभी-कभी एक नेता अकेले ही पूरी राजनीति का खेल बदल सकता है। तो लिए थोड़े विस्तार से जानते हैं पुडुचेरी के इस नेता के बारे में।
एन. रंगासामी (N Rangasamy) का पूरा नाम नटेशन कृष्णासामी रंगासामी (Natesan Krishnasamy Rangasamy) है। इनका जन्म 4 जून 1950 को पुडुचेरी (Puducherry) में हुआ था। इन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत इंडियन नैशनल कांग्रेस से की और थत्तांचावडी सीट से 3 बार विधायक बने । धीरे-धीरे वे पुडुचेरी की राजनीति का बड़ा चेहरा बन गए। अपनी सादगी, जमीन से जुड़ाव और बिना दिखावे वाली जिंदगी के कारण उन्हें “पुडुचेरी का कामराज” ("Kamaraj of Puducherry") कहा जाता है। खास बात ये है कि वे अक्सर बिना किसी बड़े काफिले या तामझाम के लोगों के बीच नजर आ जाते थें, जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ी । बाद में उन्होंने All India N.R. Congress बनाई और साबित किया कि एक मजबूत नेता अकेले भी राजनीति की दिशा बदल सकता है।
एन. रंगासामी (N Rangasamy) पुडुचेरी की राजनीति के उन चुनिंदा नेताओं में हैं, जिनका सफर उतार-चढ़ाव से भरा लेकिन बेहद दिलचस्प रहा है। वे चार बार पुडुचेरी के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कांग्रेस में रहते हुए पहली बार 2001 से 2008 तक वे मुख्यमंत्री रहें। फिर दूसरी बार 13 मई 2006 को दुबारा सीएम पद की कमान संभाली लेकिन 2008 में कहानी ने अचानक मोड़ लिया। कांग्रेस के अंदर ही उनके खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा। कुछ विधायकों ने उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए और हाईकमान पर दबाव बनाया। आखिरकार, उन्होंने 4 सितंबर 2008 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। आमतौर पर ऐसे मौके पर नेता पीछे हट जाते हैं, लेकिन रंगासामी ने यहीं से अपनी सबसे बड़ी चाल चली।
2011 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाई और उसी चुनाव में कांग्रेस को हराकर सत्ता पर कब्जा कर लिया और तीसरी बार मुख्यमंत्री बनें। यह सिर्फ जीत नहीं थी, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक “कमबैक” (Political Comeback) था जिसने दिखा दिया कि अगर जनता का भरोसा साथ हो, तो बगावत भी इतिहास बना सकती है। उन्होंने 2011 में अपनी खुद की पार्टी All India N.R. Congress के जरिए इलेक्शन लड़ा और 2016 तक मुख्यमंत्री पद संभाला। 2021 के चुनाव में रंगास्वामी चौथी बार पुडुचेरी के सीएम बने और अब तक वे कमान संभाल रहें हैं। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि 2026 में क्या रंगस्वामी पांचवीं बार भी अपने इसी पद को संभालने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं?
एन. रंगासामी (N Rangasamy) की पहचान लंबे समय तक एक “क्लीन” और ईमानदार नेता के रूप में रही है। उनके कार्यकाल में शिक्षा, सड़क और बुनियादी ढांचे पर खास जोर दिया गया, साथ ही गरीबों के लिए कई योजनाएं शुरू हुईं। उनकी सबसे बड़ी ताकत रही उनकी “क्लीन इमेज” और आम लोगों से सीधा जुड़ाव, जिसने उन्हें जनता का पसंदीदा नेता बना दिया|पुडुचेरी की राजनीति में जहां अक्सर भ्रष्टाचार के आरोप सुर्खियां बनते हैं, वहीं रंगासामी पर अब तक कोई बड़ा व्यक्तिगत घोटाला साबित नहीं हुआ। उनकी सादगी साधारण जीवनशैली, कम दिखावा और सीधे लोगों से जुड़ाव उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि उनका कार्यकाल पूरी तरह विवादों से मुक्त रहा। उनके शासन के दौरान कई बार प्रशासनिक टकराव सामने आए, खासकर उपराज्यपाल और सरकार के बीच अधिकारों को लेकर खींचतान चर्चा में रही। विपक्ष ने समय-समय पर उनकी नीतियों और फैसलों पर सवाल भी उठाए, लेकिन ठोस भ्रष्टाचार के आरोप साबित नहीं हो सके। यही वजह है कि समर्थकों के लिए वे “ईमानदार नेता” (Honest Leader Of Puducherry) हैं, जबकि आलोचकों के लिए एक “सियासी खिलाड़ी” जो हर परिस्थिति में खुद को संभालना जानते हैं।
एन. रंगासामी (N Rangasamy) ने 2011 में ऐसा राजनीतिक दांव चला, जिसने Indian National Congress (INC) को गहरा झटका दिया। मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी नई पार्टी All India N.R. Congress (AINRC) बनाई और पहली ही चुनावी परीक्षा में 15 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। यह जीत सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की जीत थी। उनकी साफ-सुथरी छवि, जमीनी पकड़ और स्थानीय मुद्दों पर सीधा फोकस कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पर भारी पड़ा। खास बात ये रही कि उन्होंने खुद को “पीड़ित नेता” की बजाय “विकल्प” के रूप में पेश किया, जो जनता को ज्यादा भरोसेमंद लगा। नतीजा यह हुआ कि जिस पार्टी ने उन्हें हटाया था, उसी को हराकर उन्होंने सत्ता हासिल कर ली और साबित कर दिया कि राजनीति में सही समय पर लिया गया फैसला खेल पूरी तरह पलट सकता है। [SP/MK]