त्रावणकोर: स्तन ढकने पर देना पड़ता था टैक्स ! महिलाओं को स्तन ढकने का नहीं था अधिकार, नंगेली ने किया था प्रतिकार

18वीं और 19वीं शताब्दी के त्रावणकोर में मूलाकरम या ब्रेस्ट टैक्स जातिगत और लैंगिक शोषण का एक वीभत्स रूप था। यह कर विशेष रूप से नादार और एझावा समुदाय की महिलाओं पर लगाया जाता था।
राजा और महिलाएं
नादार और एझावा जाति की महिलाएं जब अफसरों और ऊंची जाति के लोगों के सामने से गुजरती थीं तो उनको अपना स्तन खुला रखना पड़ता था। अगर महिलाएं स्तन ढकना चाहें तो उन्हें इसके बदले ब्रेस्ट टैक्स (Breast Tax) देना पड़ता था। X
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  • 18वीं और 19वीं शताब्दी के त्रावणकोर में मूलाकरम या ब्रेस्ट टैक्स जातिगत और लैंगिक शोषण का एक वीभत्स रूप था। यह कर विशेष रूप से नादार और एझावा समुदाय की महिलाओं पर लगाया जाता था।

  • चेरथला की नंगेली ने इस पितृसत्तात्मक ब्रेस्ट टैक्स व्यवस्था को अपने प्राणों की आहुति देकर चुनौती दी। जब अधिकारियों ने उनसे कर माँगा, तो उन्होंने टैक्स देने के बजाय अपने दोनों स्तन काटकर उन्हें सौंप दिए।

  • नंगेली के बलिदान ने न केवल एझावा समुदाय को तात्कालिक राहत दिलाई, बल्कि इसने पूरे दक्षिण भारत में आत्मसम्मान आंदोलनों (Self-Respect Movements) के लिए एक वैचारिक बीजारोपण किया।

भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय एक अनकहा महत्वपूर्ण विषय है। इस विचारधारा का प्रभाव अलग-अलग राजनीतिक दलों में अलग-अलग  रूप में होता है। प्रायः क्षेत्रीय पार्टियों के उद्देश्यों में सामाजिक न्याय के विचार की धार काफी तेज होती है। दक्षिण भारत में ई वी रामास्वामी नायकर पेरियार के द्रविड़ आंदोलन (Dravidian Movement) और आत्मसम्मान आंदोलन ने सामाजिक न्याय के जड़ों को मजबूत करने में काफी प्रभावी भूमिका निभाई।

दक्षिण भारत में त्रावणकोर में एक घटना का जिक्र उस समय जरूर होता है जब महिलाओं के अधिकारों की मांग पर बहस होती है। यह कहानी है त्रावणकोर में एझावा समुदाय (Ezhava community) के नंगेली की, जिसने पूरे पितृसत्तात्मक विचारधारा को खुले तौर पर चुनौती दी।

महिलाओं को स्तन ढकने का नहीं था अधिकार !

यह बात त्रावणकोर (Travancore) की है जब 18 वीं शताब्दी में वहाँ के राजा ने अपने साम्राज्य के खजाने को बढ़ाने के लिए अलग-अलग तरीके से जनता के ऊपर करों (TAX) को थोपना शुरू किया था। इसी में एक कर (Tax) मूलाकरम था। बता दें कि उस समय महिलाओं को अपना स्तन ढकने का अधिकार नहीं था। यह व्यवस्था नादार और एझावा समुदाय (Nadar and Ezhava communities) की स्त्रियों पर बड़े सख्ती से लागू किया गया था। किसी बड़े व तथाकथित उच्च कुल वाले शख्स के सामने जाने पर स्त्रियों को अपना स्तन हमेशा खुला रखना पड़ता था। यह एक अनिवार्यता थी और जो स्त्री इस नियम के विरुद्ध जाकर अपना स्तन ढकना चाहती थी उसे अपने राजा को कर देना पड़ता था। 

मूलाकरम क्या था ?

दरअसल, यह एक प्रकार का कर था। त्रावणकोर में यह नियम था कि कुछ जाति (नादर और एझावा) की महिलाएं सिर्फ कमर तक कपड़ा पहन सकती थी। नादर और एझावा जाति की महिलाएं जब अफसरों और ऊंची जाति के लोगों के सामने से  गुजरती थीं तो उनको अपना स्तन खुला रखना पड़ता था। अगर महिलाएं स्तन ढकना चाहें तो उन्हें इसके बदले ब्रेस्ट टैक्स (Breast Tax) देना पड़ता था। कर (Tax) देने के प्रावधान में यह सम्मिलित था कि जिस महिला का स्तन जितना छोटा होता था उसको उतना कम टैक्स और जिस महिला का स्तन जितना बड़ा होता था उसे उतना ज्यादा कर (Tax) देना पड़ता था। 

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नंगेली ने अपने दोनों स्तन तलवार से काटकर अधिकारियों को सौंपा !

19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में केरल (Kerala) के चेरथला (Cherthala) में एझावा समुदाय की एक महिला ने इस अपमानजनक कर व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद किया। दरअसल, लगभग 1803 के आस-पास की बात है जब दक्षिण भारत में जाति आधारित शोषण अपने चरम पर था। नंगेली उसी समुदाय से आती थी जिसके लिए यह अपमानजनक व्यवस्था बनाया गया था। नंगेली ने यह निश्चय किया कि वह अपना स्तन भी ढकेगी और ब्रेस्ट टैक्स भी नहीं देगी।

जब यह बात अधिकारियों के पास पहुंची तो अधिकारी नंगेली के घर टैक्स वसूलने पहुँच गए। नंगेली ने पूरे साहस का परिचय देते कहा कि वह टैक्स नहीं देगी। इसके बाद जब अधिकारी नहीं माने तो नंगेली ने कहा कि रुको कर लाकर देती हूँ।

नंगेली घर में गई और कुछ देर बाद बाहर निकली तो सारे अधिकारियों के होश उड़ चुके थे। नंगेली ने अपने दोनों स्तन तलवार रूपी हथियार से काटकर एक पत्ते (केला का पत्ता) पर लाकर अधिकारियों के सामने रख दिया और बोली ले लो अपना कर (Tax)।

इसके बाद नंगेली के शरीर से इतना रक्तस्राव हुआ कि वह जिंदा न रह सकी और नंगेली की मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे त्रावणकोर में ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ महिलाओं ने बिगुल फूँक दिया और उन्होंने कहा कि बिना कर दिए पूरा स्तन ढकेंगी। उस समय के राजा अविट्टम थिरुनल बलराम वर्मा के अधिकारियों से यह विरोध दबाया न जा सका और उनको एझावा (Ezhava) समुदाय को छूट देना पड़ा। 

नंगेली के बलिदान ने सिर्फ एझावा समुदाय की महिलाओं को न्याय ही नहीं दिलाया, बल्कि पूरे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ खुली चुनौती का बीजारोपण कर दिया। 

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