कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur)  Wikimedia Commons
राजनीति

कभी पक्का मकान नहीं बनवा पाए थे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर!

भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने अपनी सादगी, ईमानदारी और गरीबों के लिए किए गए कामों के कारण लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। उन्हीं नेताओं में एक नाम है कर्पूरी ठाकुर का, जिन्हें लोग प्यार से “जननायक” कहते थे, यानी जनता का नेता।

Author : Sarita Prasad

भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने अपनी सादगी, ईमानदारी और गरीबों के लिए किए गए कामों के कारण लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। उन्हीं नेताओं में एक नाम है कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) का, जिन्हें लोग प्यार से “जननायक” (Jan Nayak) कहते थे, यानी जनता का नेता। वे ऐसे राजनेता थे जो साधारण परिवार से उठकर बिहार की राजनीति (Bihar's Politics) के सबसे ऊँचे पद तक पहुँचे, लेकिन जीवनभर साधारण और ईमानदार बने रहे। उन्होंने समाज के गरीब, पिछड़े और वंचित लोगों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया। उनकी नीतियों और फैसलों का असर सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि पूरे भारत की राजनीति और समाज पर पड़ा। कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) को एक सच्चे समाजवादी नेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। क्या आप जानते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठने वाले कर्पूरी ठाकुर कभी भी अपना पक्का घर नहीं बनवा पाए। तो आईए देखते हैं कर्पूरी ठाकुर के जीवन की एक छोटी सी झलक।

कौन थे कर्पूरी ठाकुर ?

कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) का जन्म 24 जनवरी 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गाँव (आज जिसे कर्पूरी ग्राम कहा जाता है) में हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुल ठाकुर और माता का नाम रामदुलारी देवी था। उनका परिवार बहुत साधारण था और आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। फिर भी उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई पूरी की। युवावस्था में ही वे देश की आज़ादी के आंदोलन से प्रभावित हो गए और भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गए। इस आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और लगभग 26 महीने तक जेल में रहना पड़ा। यह घटना उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई और यहीं से उनका राजनीतिक जीवन शुरू हुआ।

इनका राजनीतिक जीवन और ऐतिहासिक फैसले

आज़ादी के बाद कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) ने कुछ समय तक शिक्षक के रूप में काम किया, लेकिन उनका सपना सिर्फ नौकरी करना नहीं बल्कि समाज में बदलाव लाना था। इसलिए वे जल्द ही सक्रिय राजनीति में आ गए। साल 1952 में वे पहली बार बिहार विधान सभा (Bihar Legislative Assembly) के सदस्य चुने गए और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की असली शुरुआत हुई। समाजवादी (Socialist) विचारधारा से प्रेरित कर्पूरी ठाकुर हमेशा गरीबों, मजदूरों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहे। उनकी सादगी, ईमानदारी और जनता से जुड़ाव ने उन्हें लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। यही कारण था कि आगे चलकर उन्हें दो बार बिहार का मुख्यमंत्री (CM Of Bihar) बनने का अवसर मिला।

कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur)

पहली बार 1970 से 1971 तक और दूसरी बार 1977 से 1979 तक। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने सादगी भरा जीवन नहीं छोड़ा और हमेशा आम जनता की समस्याओं को समझने की कोशिश की। अपने कार्यकाल में उन्होंने शराबबंदी लागू करने की पहल की, शिक्षा व्यवस्था में सुधार किए और मैट्रिक परीक्षा में अंग्रेज़ी को कंपलसरी सब्जेक्ट (English as a complimentary subject) से हटाने का फैसला लिया। उनके ये कदम उस समय काफी चर्चा में रहे और इन्हीं नीतियों के कारण वे जनता के बीच एक ईमानदार और जनप्रिय नेता के रूप में पहचाने जाने लगे। सबसे खास बात यह थी कि वे सत्ता में रहने के बावजूद हमेशा सादा जीवन जीते थे। जब वे बिहार के मुख्यमंत्री थे, तब भी उनका घर बिल्कुल साधारण था। कहा जाता है कि उनके परिवार के पास लंबे समय तक पक्का घर भी नहीं था। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कभी सरकारी सुविधाओं का निजी फायदा नहीं उठाया।

कभी पक्का घर नहीं बनवा पाए कर्पूरी ठाकुर

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा (Former Chief Minister Hemwati Nandan Bahuguna) एक किस्सा बताते हैं। वे कर्पूरी ठाकुर के पुश्तैनी गांव पितोंझिया गए थे। वहां उन्होंने देखा कि बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) का घर मिट्टी से बना हुआ था। एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर कर्पूरी ठाकुर के सचिव और आगे चलकर केंद्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा अपनी आत्मकथा रीलेंटलेस में लिखते हैं कि एक दिन वे उनके निजी सचिव लक्ष्मी प्रसाद साहू के साथ समस्तीपुर जिले में उनके गांव गए, वहां उनका परिचय उनकी पत्नी से कराया गया, वह उन्हें देखकर बहुत खुश हुईं लेकिन उनके घर में बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं थी उन्होंने जोर दिया कि वे चाय पीकर जाए उन्होंने लकड़ी का चूल्हा जलाकर चाय बनाई और वे यह देखकर दंग रह गए कि उस घर में आधुनिकता या आराम की एक भी चीज मौजूद नहीं थी। कर्पूरी ठाकुर की बहू आशा रानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कर्पूरी ठाकुर पक्का घर इसलिए नहीं बनवाते थे क्योंकि उनका मानना था कि यदि वह पक्का घर बनवा लेते हैं तो आम लोग उनसे जुड़ाव महसूस नहीं कर पाएंगे।

कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला और सादगी की मिसाल

कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) को सबसे ज्यादा पहचान उनकी सामाजिक न्याय की नीतियों और सादगी भरे जीवन के कारण मिली। उन्होंने समाज के पिछड़े और कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की, जिसे बाद में “कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला” (“Karpoori Thakur Formula”) के नाम से जाना गया। इस नीति का मुख्य उद्देश्य था कि गरीब और पिछड़े वर्गों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में बराबरी का अवसर मिल सके। उनकी इस पहल ने भारत की राजनीति में सामाजिक न्याय की नई दिशा दी और आगे चलकर कई राज्यों तथा राष्ट्रीय स्तर की नीतियों को भी प्रभावित किया। इतना ही नहीं, ऊँचे पद पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने हमेशा बेहद साधारण जीवन बिताया। मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उनके परिवार की जीवनशैली बहुत सादी रही और उनके पिता गाँव में नाई का काम करते थे। कर्पूरी ठाकुर ने कभी अपने पद का निजी फायदा नहीं उठाया। यही सादगी, ईमानदारी और जनता के लिए काम करने की भावना उन्हें लोगों के बीच एक सच्चे “जननायक” के रूप में स्थापित करती है।

दिल का दौरा पड़ने से हुई मौत

17 फरवरी 1988 को कर्पूरी ठाकुर को दिल का दौरा पड़ा और तब उन्हें पटना के मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, वही उनका निधन हुआ। हालांकि 1985 में उनको पहले भी एक बार दिल का दौरा पड़ चुका था। नरेंद्र पाठक अपनी एक किताब कर्पूरी ठाकुर और समाजवाद में लिखते हैं कि कर्पूरी ठाकुर को जब पटना के बांस घाट पर अंतिम संस्कार के लिए रखा जा रहा था तो पुलिस किसी को चिता के पास तक नहीं आने दे रही थी तभी एक फतेहाल बूढी औरत पुलिस का घेरा तोड़कर अंदर जाने लगी, पुलिस ने जब रोका तो वह बोल उठी हटो जी मैं कोई मंत्री प्रधानमंत्री थोड़ी हूं यह तो हमारे अपने हैं रोकते क्यों हो? और यही उन्होंने जीवन भर कमाया था लोगों का प्यार। [SP/MK]