1957 का केरल चुनाव दुनिया के लिए एक मिसाल बना, क्योंकि इतिहास में पहली बार कोई कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) लोकतांत्रिक चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी।
नंबूदिरीपाद सरकार ने भूमि सुधार और शिक्षा विधेयक जैसे साहसिक कदम उठाए, जिससे जमींदार और निजी स्कूल प्रबंधक नाराज हो गए।
केरल में सीपीआई सरकार के विरोध में विमोचन समरम आंदोलन छिड़ गया, जिसके आधार पर महज 28 महीने बाद ही राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 356 लगाकर पहली चुनी हुई गैर-कांग्रेसी सरकार को बर्खास्त कर दिया।
देश में पांच राज्यों के चुनाव की घोषणा हो चुकी है। सभी दलों ने जनता के ऊपर वादों कसमों का जाल फेंकना शुरू कर दिया है। एक समय था कि कांग्रेस का पूरे देश में बोलबाला था। लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस का अच्छा प्रभाव था। लेकिन उस समय विपक्ष की भूमिका में सोशलिस्ट पार्टी और साम्यवादियों ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा संभाला था। केरल में साम्यवादियों ने कांग्रेस को साल 1957 में हराकर पूरे विश्व में एक संदेश दे दिया। यह चुनाव वैश्विक संदेश कैसे बना इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है
दरअसल, आजादी के बाद लगभग पूरे भारत में कांग्रेस की लहर थी। महात्मा गांधी से प्रमणित होने के बाद नेहरू निर्विवाद रूप से एक बड़े चेहरे थे। उत्तर भारत में तो नेहरू के नाम से चुनाव को काफी हद तक प्रभावित किया जाता था और कांग्रेस को सफलता हासिल हो रही थी। लेकिन कुछ राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ मजबूत विपक्ष के रूप में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उभरकर सामने आई थी।
साल 1956 में राज्य पुनर्गठन के बाद 1 नवंबर 1956 को केरल राज्य बनाया गया। यहाँ पर साम्यवादियों की मजबूत पकड़ थी। उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन (Sukumar Sen) ने केरल चुनाव की घोषणा करते हुए 28 फरवरी से 11 मार्च 1957 तक चुनाव को तीन चरणों में सम्पन्न करने का पत्र जारी किया।
1957 में केरल विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी (Communist party of India) को 60 सीट मिला था। कांग्रेस (Congress) को इस चुनाव में 43 सीट पर सफलता हासिल हुई थी। इसके अलावा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (Praja Socialist Party) को 9 सीट पर सफलता हासिल हुई थी। वहीं इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) को 8 सीट हासिल हुई थी। 6 निर्दलीय प्रत्याशियों ने इस चुनाव में अपने जीत का अलग झण्डा बुलंद किया।
कम्युनिस्ट पार्टी जादुई आँकड़े से महज 4 कदम दूर थी अर्थात सीपीआई को सरकार बनाने के लिए 4 विधायकों की आवश्यकता थी। उस समय केरल के राज्यपाल बी. रामकृष्ण राव (B. Ramakrishna Rao) ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल करने में सीपीआई सफल रही और 5 अप्रैल 1957 को ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद (E.M.S. Namboodiripad) ने केरल के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया।
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केरल में ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद ने सरकार बनते ही क्रांतिकारी भूमि सुधार (Land Reforms) लागू करने की योजना बनाई। क्रांतिकारी भूमि सुधार के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि जमींदारी प्रथा को जड़ से खत्म किया जाएगा। इसके बदले जमीन को जोतने वाले किसानों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाएगा। यह फैसला जैसे ही आया सरकार के खिलाफ कुछ संगठन और बहुत सारे बड़े जमींदार लामबंद हुए। इसी के साथ सरकार ने केरल में शिक्षा विधेयक (Education Bill) लाया था।
इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया था कि निजी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती और वेतन पर सरकार का नियंत्रण रहेगा। केरल में कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने जमींदारों के साथ मिलकर आंदोलन को हवा दे दी।
इस आंदोलन को केरल में विमोचन समरम (Liberation Struggle) कहा गया। राज्य में हिंसक आंदोलन तेज हो गया था। इसके बाद राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने राज्यपाल बी. रामकृष्ण राव (B. Ramakrishna Rao) की रिपोर्ट को आधार बनाकर ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद की सरकार को बर्खास्त कर दिया। केरल में ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद (E.M.S. Namboodiripad) की सरकार महज 2 वर्ष 4 महीने ही चल पाई थी।
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