भारत ने विज्ञान और शोध की दुनिया को कई महान वैज्ञानिक दिए हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनकी उपलब्धियाँ दुनिया बदल देने वाली थीं, फिर भी उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे असली हकदार थे। ऐसे ही एक महान भारतीय वैज्ञानिक थे जीएन रामचंद्रन (GN Ramachandran)। उन्होंने मानव जीवन की मूल संरचना को समझने में ऐसा योगदान दिया जिसने आधुनिक बायोलॉजी और मेडिकल साइंस (Medical Science) की दिशा ही बदल दी। प्रोटीन की बनावट को समझाने वाला उनका शोध आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए आधार माना जाता है। उनकी खोज ने यह समझने में मदद की कि हमारे शरीर की कोशिकाएँ कैसे काम करती हैं और जीवन की संरचना किस तरह बनी है। लेकिन दुख की बात यह रही कि इतनी बड़ी खोज के बावजूद उन्हें कभी नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) नहीं मिला। आज भी वैज्ञानिक जगत में यह सवाल उठता है कि आखिर इतनी ऐतिहासिक खोज करने वाले वैज्ञानिक को दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान क्यों नहीं दिया गया।
जीएन रामचंद्रन (GN Ramachandran) का पूरा नाम गोपालसमुद्रम नारायण रामचंद्रन (Gopalasamudram Narayan Ramachandran) था। उनका जन्म 8 अक्टूबर 1922 को भारत के केरल राज्य के एर्नाकुलम जिले में हुआ था। उनके पिता गणित के प्रोफेसर थे, इसलिए बचपन से ही उनके घर में शिक्षा और विज्ञान का माहौल था। रामचंद्रन बचपन से बेहद तेज बुद्धि के छात्र थे और उन्हें गणित तथा विज्ञान में खास रुचि थी। उस दौर में भारत में वैज्ञानिक संसाधन बहुत सीमित थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने ज्ञान और मेहनत के दम पर विश्व स्तर पर पहचान बनाई।
रामचंद्रन ने अपनी शुरुआती पढ़ाई केरल और तमिलनाडु में पूरी की। इसके बाद उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय (University of Madras) से भौतिकी में पढ़ाई की। वे इतने प्रतिभाशाली थे कि कम उम्र में ही शोध कार्यों में रुचि लेने लगे। बाद में उन्होंने भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सी वी रमन के मार्गदर्शन में शोध किया। यही वह समय था जब उनकी वैज्ञानिक सोच और मजबूत हुई।
इसके बाद वे उच्च शोध के लिए इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (University of Cambridge) गए। वहाँ उन्होंने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी पर काम किया। यह तकनीक पदार्थों की सूक्ष्म संरचना को समझने के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसी क्षेत्र में आगे चलकर उन्होंने ऐसी खोज की जिसने उन्हें विश्व विज्ञान में अमर बना दिया।
मानव शरीर करोड़ों कोशिकाओं से बना है और इन कोशिकाओं के भीतर प्रोटीन मौजूद होते हैं। यही प्रोटीन शरीर के निर्माण, विकास और कार्य करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन 1950 के दशक तक वैज्ञानिक यह ठीक से नहीं समझ पाए थे कि प्रोटीन की संरचना आखिर कैसी होती है।
इसी दौरान जीएन रामचंद्रन ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कोलेजन नामक प्रोटीन की संरचना पर शोध शुरू किया। कोलेजन हमारे शरीर की त्वचा, हड्डियों और ऊतकों का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रोटीन है। लंबे शोध और गणनाओं के बाद उन्होंने “ट्रिपल हेलिक्स स्ट्रक्चर” का मॉडल (Model of the "triple helix structure") प्रस्तुत किया। यह खोज उस समय विज्ञान की दुनिया में क्रांतिकारी मानी गई।
रामचंद्रन ने एक और ऐतिहासिक योगदान दिया जिसे आज “रामचंद्रन प्लॉट” (Ramchandran Plot) कहा जाता है। यह एक वैज्ञानिक मॉडल है जो बताता है कि प्रोटीन के अणु किस कोण पर मुड़ सकते हैं और उनकी संरचना कैसे बनती है। आज भी दुनिया भर के बायोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी और मेडिकल रिसर्च संस्थानों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो रामचंद्रन ने यह समझने का रास्ता दिखाया कि “जीवन” बनाने वाले प्रोटीन वास्तव में कैसे आकार लेते हैं। इसलिए उन्हें “जीवन की संरचना का मानचित्रण करने वाला वैज्ञानिक” कहा जाता है। रामचंद्रन का शोध इतना महत्वपूर्ण था कि बाद में डीएनए, प्रोटीन इंजीनियरिंग और आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी के कई शोध उसी आधार पर आगे बढ़े। उनके “रामचंद्रन प्लॉट” (Ramchandran Plot) को आज भी बायोकेमिस्ट्री की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में गिना जाता है। दुनिया के कई बड़े वैज्ञानिकों ने माना कि उनका काम नोबेल पुरस्कार के योग्य था।
रामचंद्रन ने भारत में वैज्ञानिक शोध को मजबूत करने में भी बड़ी भूमिका निभाई। वे भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) और बाद में मद्रास विश्वविद्यालय (University of Madras) में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। उन्होंने भारत में मॉलेक्यूलर बायोफिजिक्स जैसे आधुनिक शोध क्षेत्रों की नींव रखने में मदद की। कई विशेषज्ञों का मानना है कि रामचंद्रन का काम अपने समय से बहुत आगे था। उस दौर में पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों को ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पहचान और संसाधन मिलते थे, जबकि भारतीय वैज्ञानिकों को उतना महत्व नहीं दिया जाता था। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि कोलेजन की संरचना को लेकर बाद में कुछ बहसें हुईं, जिसकी वजह से उनके काम को उतनी मजबूती से नोबेल समिति के सामने नहीं रखा गया। वहीं दूसरी ओर, उनका “रामचंद्रन प्लॉट” इतना तकनीकी और जटिल विषय था कि आम लोगों के बीच उसकी प्रसिद्धि कम रही, जबकि उसका वैज्ञानिक महत्व बेहद बड़ा था।
कई लोग इसे विज्ञान जगत की सबसे बड़ी अनदेखियों में से एक मानते हैं। जिस तरह निकोला टेस्ला को उनके जीवनकाल में पूरा सम्मान नहीं मिला, उसी तरह रामचंद्रन को भी उनकी ऐतिहासिक खोज के बावजूद नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया। जीएन रामचंद्रन सिर्फ एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि यह साबित करने वाले व्यक्ति थे कि सीमित संसाधनों के बावजूद भारत का वैज्ञानिक विश्व स्तर पर इतिहास रच सकता है। उन्होंने दिखाया कि मेहनत, ज्ञान और नई सोच के दम पर कोई भी इंसान विज्ञान की दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकता है। आज भी उनके शोध को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है और उनकी खोज आधुनिक मेडिकल साइंस की रीढ़ मानी जाती है। [SP]