क्या आप किसी ऐसे लेखक की कल्पना कर सकते हैं, जिसकी किताबों को पढ़ने के लिए देश के प्रधानमंत्री रात-रात भर जागते रहे हों? यह कोई मज़ाक नहीं, बल्कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की हकीकत थी, जो महान लेखक इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) के उपन्यासों के इस कदर दीवाने थे कि उनकी एक किताब को उन्होंने एक ही रात में पढ़ डाला था। इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) शब्दों के वो जादूगर थे, जिन्होंने सस्पेंस, थ्रिलर और जासूसी दुनिया का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया, जिसकी मिसाल आज भी मिलना मुश्किल है।
हलांकी बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी कलम की ताकत सरहदों की मोहताज नहीं थी। हिंदुस्तान के बुकस्टॉल्स पर उनकी किताबों के लिए लगने वाली लंबी कतारें और पाठकों की दीवानगी कभी कम नहीं हुई। आज भी भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में उनका नाम बेहद अदब से लिया जाता है, क्योंकि उनके बनाए अमर किरदार जैसे 'कर्नल विनोद' और 'इमरान' आज भी लाखों दिलों में सस्पेंस का रोमांच जगा देते हैं।
साल 1952 में जब इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) ने 'जासूसी दुनिया' (Spy Stories) और बाद में 'इमरान सीरीज़' (Imran Series) लिखना शुरू किया, तब जासूसी उपन्यासों का एक सुनहरा दौर शुरू हुआ। उनके द्वारा गढ़े गए अमर किरदार "कर्नल विनोद और अली इमरान" पाठकों के बीच इस कदर लोकप्रिय हुए कि बुकस्टॉल्स पर नई किताब आते ही उसे खरीदने के लिए लंबी कतारें लग जाती थीं। लोग एक-एक किताब के लिए घंटों इंतजार करते थे।
इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) का असली नाम असार अहमद सफ़ी (Asar Ahmed Safi) था। उनका जन्म 26 जुलाई 1928 को भारत के उत्तर प्रदेश के इलाहबाद (अब प्रयागराज) के पास अतरौली गांव में हुआ था। देश के विभाजन के बाद भी वे शुरुआती कुछ सालों तक भारत में ही रहे और यहीं से लिखना शुरू किया। हालांकि, साल 1952 में वे अपनी मां और बहन के साथ पाकिस्तान के कराची चले गए। उनके पाकिस्तान जाने की मुख्य वजह पारिवारिक थी, क्योंकि विभाजन के बाद उनका परिवार वहां बस चुका था। पाकिस्तान जाने के बाद भी भारत से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। वे कराची में बैठकर लिखते थे और उनकी कहानियां सरहद पार कर भारत के पब्लिशर्स और लाखों दीवानों तक पहुंचती थीं। उनकी लेखनी में वह ताकत थी जिसने जासूसी साहित्य को एक नया और सम्मानित मुकाम दिया।
इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) की लेखनी का जादू सिर्फ आम पाठकों के सिर चढ़कर ही नहीं बोलता था, बल्कि सियासत के सबसे बड़े गलियारों में भी उनकी किताबों की धमक थी। इससे जुड़ा सबसे मशहूर और दिलचस्प किस्सा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी (Former Prime Minister Lal Bahadur Shastri) का है। शास्त्री जी अपनी सादगी और गंभीर राजनीतिक जीवन के लिए जाने जाते थे, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) के उपन्यासों के इस कदर दीवाने थे कि भारी राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच भी उनके लिए वक्त निकाल लेते थे।
एक बार एक इंटरव्यू के दौरान जब शास्त्री जी से उनकी पसंदीदा किताबों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए इब्ने सफ़ी का जिक्र किया। उन्होंने स्वीकार किया था कि वे उनके सस्पेंस और जासूसी ताने-बाने से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने एक बार इब्ने सफ़ी (Ibn-a-Safi) का एक पूरा उपन्यास महज एक रात में ही पढ़कर खत्म कर डाला था।
यह किस्सा सिर्फ एक राजनेता के शौक को नहीं दर्शाता, बल्कि यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कैसे इब्ने सफ़ी के शब्दों में वो ताकत थी जो भारत और पाकिस्तान के बीच की कड़वाहट, राजनीति और सरहदों की मजबूत दीवारों को पल भर में तोड़ देती थी। जहाँ दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर रहता था, वहीं इब्ने सफ़ी (Ibn-a-Safi) की कहानियां एक अदृश्य पुल का काम करती थीं, जिसने सरहद के दोनों तरफ के लोगों को एक ही रोमांच के धागे में बांध रखा था।
इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) का पाकिस्तान में बैठकर लिखना और उनकी किताबों का भारत में धड़ल्ले से छपना और बिकना, सिर्फ एक साहित्यिक सफलता नहीं थी बल्कि यह कानूनी और राजनीतिक विवादों (Controversies) का केंद्र भी रही। उस दौर में जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर था, उनकी किताबों को लेकर कई बड़े 'बवाल' और कानूनी मुद्दे सामने आए।
इस विषय पर हुए मुख्य विवाद और कानूनी मुद्दों का विवरण नीचे दिया गया है:
इब्ने सफ़ी (Ibn-e-Safi) की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि भारत के कई प्रकाशकों (Publishers) ने उनके नाम का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। चूंकि इब्ने सफ़ी पाकिस्तान में थे, इसलिए भारत के कुछ स्थानीय पब्लिशर्स ने उनके मूल उपन्यासों की पायरेटेड कॉपियां (Pirated Copies) तो छापी हीं, साथ ही उनके किरदारों (कर्नल विनोद और अली इमरान) का इस्तेमाल करके नकली लेखकों से कहानियां लिखवाईं और उन्हें 'इब्ने सफ़ी' के नाम से ही बाजार में बेच दिया।
इस बात से तंग आकर इब्ने सफ़ी ने खुद अपनी किताबों में और भारतीय अखबारों में नोटिस जारी किए थे। उन्होंने साफ किया था कि इलाहाबाद का 'नुकूश पब्लिकेशन' (Asrar Publications) ही भारत में उनकी किताबों को छापने के लिए आधिकारिक रूप से अधिकृत (Authorized) है।
चूंकि उनकी किताबों में जासूसी, खुफिया तंत्र, कोड वर्ड और इंटरनेशनल क्रिमिनल्स के नेटवर्क की कहानियां होती थीं, इसलिए दोनों देशों की खुफिया एजेंसियां उन्हें संदेह की नजर से देखती थीं। एक पाकिस्तानी लेखक द्वारा लिखी गई जासूसी कहानियां जब हर महीने हजारों की तादाद में भारत आती थीं, तो भारतीय खुफिया एजेंसियों को कई बार यह शक हुआ कि इन कहानियों और किरदारों के संवादों के पीछे कहीं कोई 'सीक्रेट कोड' या जासूसी संदेश (Espionage Signals) तो नहीं छुपा है। इस वजह से उनकी किताबों की कई बार कड़ाई से जांच की जाती थी।
विवाद सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी हुआ। उनके सबसे लोकप्रिय किरदार 'अली इमरान' (Imran Series) को लेकर पाकिस्तानी हुकूमत को आपत्ति थी। इमरान का किरदार एक ऐसे जासूस का था जो बहुत लापरवाह और मजाकिया दिखता था, लेकिन असल में बेहद चालाक था। तत्कालीन पाकिस्तानी अधिकारियों को लगा कि यह किरदार उनकी खुफिया एजेंसियों (जैसे ISI) का मजाक उड़ाता है। हालांकि, अपनी बुद्धिमत्ता और भारी जनसमर्थन के कारण इब्ने सफ़ी इस विवाद से बाहर निकल आए।
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इब्ने सफ़ी ने अपने जीवनकाल में लगभग 245 जासूसी उपन्यास लिखे, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड है। लेकिन शब्दों के इस जादूगर का सफर बहुत लंबा नहीं चल सका। साल 1970 के दशक के में वे कैंसर (Pancreatic Cancer) से पीड़ित हो गए थे। इस गंभीर बीमारी से लड़ते हुए, अपने 52वें जन्मदिन के ठीक अगले दिन, 27 जुलाई 1980 को पाकिस्तान के कराची में उनका निधन हो गया।
भले ही इब्ने सफ़ी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उर्दू अदब (Urdu Literature) और पल्प फिक्शन (Suspence Stories) में उनके ऐतिहासिक योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने जासूसी जैसे 'अंडररेटेड' जॉनर को मुख्यधारा के साहित्य में लाकर खड़ा किया और समाज को पढ़ने की एक नई लत दी। उनकी लिखी कहानियां और किरदार आज भी उतने ही प्रासंगिक और रोमांचक लगते हैं जितने पांच दशक पहले थे। वे एक ऐसे सच्चे फनकार थे जिनकी विरासत को सरहदें कभी बांध नहीं पाईं। [SP]