हालिया ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो रहा है। भारत लगभग 60 फीसदी एलपीजी आयात करता है, इसलिए आपूर्ति में बाधा आने पर देश में गैस की किल्लत बढ़ गई है।
संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलपीजी उत्पादक है और यूरोप सहित कई देशों को सप्लाई करता है। इसके अलावा रूस, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान जैसे देश भी प्रमुख उत्पादक हैं।
इतिहास में भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने युद्धों के दौरान आर्थिक और रणनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की (जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के समय)।
हाल ही में शुरू हुए ईरान-अमेरिका संघर्ष अब पूरे विश्व की राजनीति को एक नई दिशा देते हुए दिखाई दे रहे हैं। युद्ध का असर केवल अमेरिका-ईरान-इजरायल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा विश्व नई चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भारत में भी युद्ध का असर देखने को मिल रहा है। इसी बीच एलपीजी की किल्लत से पूरे भारत में कोहराम मचा हुआ है। भारत लगभग 60 फीसदी एलपीजी का आयात करता है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि जिस एलपीजी को लेकर इतनी हायतौबा मची है, आखिर वो आता कहां से है? किस देश के कारण दुनिया के कई घरों का चूल्हा जलता है आइए जानते हैं।
दरअसल, युद्ध में अमेरिका ने फिर से अपने राष्ट्रीय हितों को साधने में सफलता हासिल की है।
अमेरिका इस पूरे घटनाक्रम के तहत अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को संभालने के लिए एलपीजी को ही आधार बना रहा है। अमेरिका पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा एलपीजी बनाने वाला देश है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अमेरिका के पास आधुनिक हथियारों के साथ में उसके पास बहुत बड़ा रिफाइनरी नेटवर्क है। संयुक्त राज्य अमेरिका का एलपीजी के वैश्विक आपूर्ति में हिस्सेदारी 25% से भी अधिक है। अमेरिका अपने यहाँ से एलपीजी को यूरोप में, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम (UK), स्पेन, तुर्की, कनाडा, ब्राजील, फ्रांस जैसे देशों को सप्लाई करता है।
हालांकि अमेरिका (America) के अलावा अन्य देश जैसे रूस, चीन, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ईरान और अल्जीरिया भी हैं जो एलपीजी बनाने में अग्रणी हैं। एक तरफ एलपीजी की जिस तरीके से किल्लत बढ़ती दिखाई दे रही है, ऐसा लगता है पूरी दुनिया में एलपीजी उत्पादक देशों का ही आने वाले समय में बोलबाला होने वाला है।
अमेरिका, अमेरिका ने लगभग हर युद्ध में यही चाल चलने की कोशिश की है, इसके पहले जब द्वितीय विश्वयुद्ध 1939 में शुरू हुआ तो अमेरिका शुरू में विश्व युद्ध में शामिल नहीं हुआ था बल्कि अन्य देशों को हथियार मुहैया कराकर अपनी अर्थव्यवस्था को नए तरीके से ढालने का प्रयास किया। अमेरिका ने मित्र राष्ट्रों को हथियार बड़ी मात्रा में सप्लाई किया और अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत मजबूत बना लिया। अमेरिका ने लेंड-लीज़ एक्ट (1941) और कैश एंड कैरी नीति (1939) के तहत अपने हथियारों को युद्धरत देशों में बेचा।
बाद में जब जापान (Japan) ने पर्ल हार्बर पर आक्रमण किया तो अमेरिका युद्ध में 8 दिसंबर 1941को शामिल हुआ और तब तक उसने परमाणु बम बनाने की पूरी योजना तैयार कर ली थी। 16 जुलाई 1945 को अमेरिका ने अपना परमाणु परीक्षण किया और जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर 6 अगस्त और 9 अगस्त को 1945 को परमाणु बम गिरकर युद्ध का ही समापन कर दिया। युद्ध समाप्त होते ही वैश्विक राजनीति का चेहरा ही बदल गया और अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी धुरी बनकर वैश्विक राजनीति में उभरा।
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अमेरिका की विदेश नीति में सबसे पहला बिन्दु होता है उसका राष्ट्रहित, देखना यह है कि अमेरिका इस नए संघर्ष को अपने राष्ट्रहित ( में कैसे तब्दील करता है, क्योंकि इस युद्ध की शुरुआत ही अमेरिका ने किया है।
हालांकि इस युद्ध को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास जारी है, डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने हाल ही में कहा है कि ईरान कुछ ही दिनों में युद्ध की समाप्ति पर सहमति देगा, दूसरी तरफ ईरान का बयान है कि अमेरिका ने यह युद्ध शुरू किया था और अब ईरान इस युद्ध का समापन करेगा।
ईरान ने कहा है कि वह अगले छह महीने युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार है। ईरान का साफ संदेश है कि वह फिलहाल झुकने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। वहीं भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री से फोन पर 10-13 मार्च 2026 के बीच बातचीत की है और राजनयिक समझौते पर सहमति स्थापित करने की कोशिश की है।
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