अफगानिस्तान में महिलाओं की हालत बद से बदतर। Nitin Madhav (USAID), Public domain, via Wikimedia Commons
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अफगानिस्तान में महिलाओं की हालत बद से बदतर, तालिबान ने इस अहम चीज पर लगाया बैन

अफगानिस्तान में औरतों को पढ़ने तक के लिए इज़ाजत नहीं है। अफगान लड़कियों के लिए ये फैसला सीधा संदेश है: तुम्हारा भविष्य हमारे लिए ज़रूरी नहीं।

Author : Preeti Ojha
  • तालिबान शासन में अफगानिस्तान की औरतों से पढ़ाई, नौकरी और सार्वजनिक जीवन छीन लिया गया है।

  • अब निजी अनाथालयों पर कार्रवाई कर बच्चों का सहारा भी तोड़ा जा रहा है, जिससे उनका भविष्य खतरे में है।

  • पूरी दुनिया हालात देख रही है, लेकिन मुस्लिम दुनिया की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल बन गई है।

“किसी भी देश की असली ताकत और तरक्की उस देश में रहने वाली औरतें और बच्चों की तरक्की से जुड़ा हुआ होता हैं, अगर इन्हीं के हिस्से अंधेरा लिख दिया जाए, तो मुल्क का भविष्य भी कैद हो जाता है।”

अफगानिस्तान (Afghanistan) आज उसी कैद का नाम बनता जा रहा है। एक तरफ़ अफगानिस्तान में तालिबान ने महिलाओं की जिंदगी पर ऐसा शिकंजा कसा है कि उनको सांस लेने तक की “इजाज़त” भी मांगनी पड़ती  है, दूसरी तरफ़ अब बच्चों—खासतौर पर बेसहारा और अनाथ बच्चों की दुनिया भी सुरक्षित नहीं बची हैं।

औरतों पर ताला: नौकरी नहीं, पब्लिक लाइफ नहीं, 12वीं के बाद पढ़ाई नहीं

ABC की रिपोर्ट/डॉक्यूमेंट्री “Nine Days in Afghanistan” में कॉरस्पॉन्डेंट मेघना बलि (Meghna Bali )को एक ऐसा मेल ऑनली (Male-Only) पार्क दिखाया गया जो तालिबान मेंबरों के बीच पॉपुलर है—और जहां अफगान महिलाओं की एंट्री ही बैन है। वहीं बातचीत में मेघना बलि उन पाबंदियों पर सवाल करती हैं जिनके तहत महिलाओं को काम करने, पब्लिक लाइफ में शामिल होने और 12वीं के बाद पढ़ने से रोका जा रहा है। ये सिर्फ नियम नहीं हैं—ये एक पूरी जेनरेशन (Generation) को “घर की चारदीवारी” में बंद करने की पॉलिसी है। वो पाबंदी जो पितृसत्तातमक की नींव को मजबूत करती  है, वह पितृसत्तातमक जो औरतों के दमन को  प्रोत्साहित करती है। अफगानिस्तान में औरतों को पढ़ने तक के लिए इज़ाजत नहीं है और जब पढ़ाई छिनती है, नौकरी छिनती है, बाहर निकलने की आज़ादी छिनती है—तो औरत सिर्फ “नज़र से गायब” नहीं होती, वो सिस्टम से मिटा दी जाती है। अफगान लड़कियों के लिए ये फैसला सीधा संदेश है: तुम्हारा भविष्य हमारे लिए ज़रूरी नहीं।

अब बच्चों की बारी: प्राइवेट चिल्ड्रन्स होम्स पर क्रैकडाउन

इसी बीच  तालिबान ने अब प्राइवेट चिल्ड्रन्स होम्स/केयर सेंटर्स (Children’s Home/Care Center) पर भी कार्रवाई तेज कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई निजी संस्थानों को जबरन बंद कराया गया और वहां रहने वाले बच्चों—जिनमें बहुत से अनाथ हैं—को सरकारी/स्टेट रन संस्थानों में शिफ्ट किया जा रहा है। बाहर से इसे “ओवरसाइट” के नाम पर बेचा जा रहा है, लेकिन अंदर की चिंता बहुत गहरी है: इन बच्चों की देखभाल, शिक्षा और सुरक्षा अब किस हाथ में जाएगी? 

ये वही बच्चे हैं जिनके पास घर नहीं, मां-बाप नहीं, और अब जो थोड़ा-बहुत सहारा था—वो भी छिनता दिख रहा है। एक तरफ़ महिलाओं की जिंदगी से विकल्प हटाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ़ बच्चों के “सपोर्ट सिस्टम” को भी तोड़ा जा रहा है। ये सिर्फ सामाजिक संकट नहीं—पूरे देश का भविष्य काटने जैसा है।

दुनिया में आवाज़ उठती है… लेकिन ‘अपनों’ की खामोशी क्यों?

इस पूरे माहौल पर सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाएं हैं, और कई एक्टिविस्ट्स/पूर्व नेता इसे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ खुली ज्यादती मान रहे हैं। 

लेकिन एक सवाल बहुत भारी है—इस्लामी दुनिया के बड़े हिस्से की खामोशी इतनी लंबी क्यों है?

जहां बात फिलिस्तीन, इराक, या किसी और मुद्दे की आती है, वहां “उम्माह” की आवाज़ तेज होती है—तो अफगानिस्तान की औरतों की पढ़ाई, उनकी नौकरी, उनका बाहर निकलना, और अनाथ बच्चों के घर बंद होने पर इतनी चुप्पी क्यों?

इसी बीच तालिबानी नेता द्वारा यह भी बोलै गया की अगर अगले नोटिस तक औरतों की शिक्षा पर पाबंदी है तोह उससे जुड़े सवालों पर भी पाबंदी होनी चाहिए।