साड़ी की उत्पत्ति लगभग 5000 वर्ष पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता से मानी जाती है। वैदिक काल में स्त्री-पुरुष दोनों बिना सिले वस्त्र पहनते थे, जिनका उल्लेख वासस्, निवि और उत्तरीय के रूप में मिलता है। समय के साथ सामाजिक असमानताओं ने साड़ी को मुख्यतः स्त्रियों के परिधान के रूप में स्थापित किया।
उत्तर-वैदिक और मध्यकाल में स्त्रियों को गृह -केंद्रित और सौंदर्य का प्रतीक मानने की धारणा मज़बूत हुई। पर्दा प्रथा, वर्ग-भेद और शहरी-ग्रामीण अंतर के कारण साड़ी के पहनने के तरीकों (सीधी पल्ला, उल्टी पल्ला) में विविधता आई।
आधुनिक नारीवादी विमर्श में साड़ी केवल परिधान नहीं, बल्कि सत्ता और नियंत्रण का प्रतीक भी मानी जाती है। रेडिकल फेमिनिज़्म के अनुसार, स्त्रियों के पहनावे पर पितृसत्ता का नियंत्रण “निजी” नहीं बल्कि “राजनीतिक” है—जिसे कैरोल हैनिस्क ने अपने निबंध Personal is Political (1969) में स्पष्ट किया।
साड़ी भारतीय संस्कृति में लिबास का एक ऐसा पहचान है जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। साड़ी सामान्य तौर पर महिलाओं का परिधान है। हर बालिका का विकास जब एक परिपक्व नारी के रूप में होने लगता है तो उसे साड़ी पहनने की सलाह दी जाने लगती है। साड़ी का अपना एक लंबा इतिहास है, बदलते समय के साथ इसके पहनावे में भी बदलाव होते रहे हैं।
साड़ी का इतिहास (History) काफी पुराना है। आज से 5000 हजार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता में भी साड़ी पहने जाते थे। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे बहुत सारे प्रमाण मिले हैं जिससे यह साबित होता है कि उस समय भी लोग साड़ी पहना करते थे।
वहीं 1500 BC के आसपास शुरू हुई वैदिक संस्कृति में भी साड़ी जैसे परिधान का प्रमाण मिलता है। वैदिक काल में स्त्री और पुरुष दोनों लगभग एक जैसे वस्त्र पहनते थे। परंतु वस्त्र के पहनने के तरीके में अंतर रहता था।
स्त्री (Female) और पुरुष (Male) दोनों बिना सिले हुए लंबे वस्त्र को अपने शरीर के अनुसार लपेटते थे। धीरे-धीरे समय बीता, स्त्री और पुरुष के जीवनशैली में बदलाव होते चले गए।
ऋग्वेद में साड़ी जैसे परिधान का जिक्र वासस्, निवि,उत्तरीय नाम के रूप में मिलता है। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों और पुरुषों के बीच सामाजिक असमानता ने उनके पहनावे पर भी प्रभाव डाला। धीरे-धीरे स्त्रियों को घर के अंदर रहने वाली और सौन्दर्य का प्रतीक माना जाने लगा। घर के अंदर रहने के कारण उनको लंबे कपड़े पहनने पड़े और साड़ी स्त्री के परिधान का एक अहम हिस्सा बनाता चला गया।
विवाह के स्वरूप में बदलाव होने के वजह से स्त्रियों के साड़ी पहनने के तरीके में भी बदलाव हुआ ।
शादी के स्वयंवर प्रथा (Swayamvar Practice) में स्त्री को काफी सजाकर स्वयंवर में भेजा जाता था। इसके वजह से भारी भरकम शृंगार की सूची में साड़ी ने अपनी भूमिका का विस्तार किया।
मध्य काल में सामाजिक बदलाव (Social Change) काफी देखने को मिला। साड़ी को इस तरीके से पहना जाने लगा जिससे पूरे तन के साथ स्त्री अपना चेहरा भी ढक सके। पर्दा प्रथा के प्रचलन को बरकरार रखने में साड़ी का काफी योगदान था और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जैसे-जैसे सामाजिक असमानता के साथ आर्थिक असमानता का विस्तार हुआ राजघराने की महिलाओं के साड़ी पहनने में और सामान्य ग्रामीण इलाके की महिलाओं के साड़ी पहनने मे अंतर दिखाई देने लगा।
इसी क्रम में उत्तर भारत में महिलाओं के साड़ी पहनने में दो तरीके काफी प्रसिद्ध थे। इनमें से एक है सीधी पल्ला (पल्लू) साड़ी पहनना, जिसमें महिलाएं अपने साड़ी को इस तरीके से पहनती हैं कि उनके साड़ी का आँचल (साड़ी का दूसरा छोर) सामने की तरफ आता है और आँचल को वो कंधे के दाहिने तरफ से लाकर कमर के बाएं तरफ खोंस लेती हैं। यह तरीका सामान्य तौर पर ग्रामीण इलाके की कामकाजी महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है।
वहीं दूसरे तरीके का नाम है उल्टी पल्ला (पल्लू) साड़ी पहनना। साड़ी पहनने के इस तरीके में महिलाएं अपने आँचल (साड़ी का दूसरा छोर) को अपने कंधे के बाएं तरफ से पीछे ले जाकर छोड़ देती हैं। साड़ी पहनने का यह तरीका आम तौर पर शहरी इलाके की महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। लेकिन कभी-कभी ग्रामीण इलाके की महिलाएं भी इस तरीके से शौक-शौक में पहनती हैं।
भारत के राजनीतिक इतिहास (Political History) में साड़ी भी बहुत बार राजनीति का मुद्दा बन चुका है। महाभारत काल में द्रौपदी के चीरहरण ने भारत के राजनीतिक इतिहास में पितृसत्तात्मक समाज के बीच एक गहरा सवाल छोड़ दिया। समय के साथ साड़ी को शृंगार के अलावा महिलाओं का पर्दा बना दिया गया और महिलाओं के अधिकारों और उनके वैचारिक विकास को ढक दिया गया।
साड़ी आम तौर पर शृंगार का एक भाग माना जाता है लेकिन साड़ी को लेकर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं में बहस भी होती है।
रेडिकल फेमिनिज़म से सहमति रखने वाले लोगों का मानना है कि साड़ी रूढ़िवादिता की पहचान है। साड़ी महिलाओं को कैद में रखने का साधन है। रेडिकल फेमिनिज़्म वाले लोगों का मानना रहता है कि महिलाओं को घर से लेकर बाहर तक हर जगह पुरुषों के बनाए नियमों ने कैद करके रखा है। कैरोल हैनिस्क (Carol Hanisch) (एक नारीवादी विचारक) ने 1969 में में अपने निबंध Personal Is Political के माध्यम से पितृसत्ता के परंपरागत नियंत्रण की व्याख्या की तो उसमें महिलाओं के पहनावे पर भी पितृसत्ता के नियंत्रण की बात की।