जिस लोकपाल को भ्रष्टाचार मिटाना था, वही सुस्त पड़ गया, राष्ट्रपति तक पहुंचने में लगे 3 साल, कटघरे में मोदी सरकार की नीयत!

मामला यह है कि लोकपाल ने अपनी तीन रिपोर्ट 2022-23, 2023-24 और 2024-25 को राष्ट्रपति के पास एक साथ भेजा है। सवाल ये यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा लोकपाल ने क्यों किया है।
नरेंद्र मोदी और लोकपाल भवन सवालों के घेरे में
लोकपाल ने अपनी तीन रिपोर्ट 2022-23, 2023-24 और 2024-25 को राष्ट्रपति के पास एक साथ भेजा है। सवाल ये यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा लोकपाल ने क्यों किया है। X
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Summary
  • लोकपाल को कानूनन हर साल अपनी वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपनी होती है, लेकिन 2022–23 और 2023–24 की रिपोर्ट समय पर तैयार नहीं हुईं बाद में 2024–25 की रिपोर्ट के साथ तीनों रिपोर्ट एक साथ भेजी गईं

  • जिस संस्था को भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया, वही लालफीताशाही की शिकार होते दिखाई दे रही।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट संसद में समय पर पेश न होना लोकपाल की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

साल 2013-14 में बना लोकयुक्त एक बार पुनःचर्चा का विषय बना हुआ है। लोकपाल ने अपना रिपोर्ट राष्ट्रपति को दिया। मामला यह है कि लोकपाल ने अपनी तीन रिपोर्ट 2022-23, 2023-24 और 2024-25 को राष्ट्रपति के पास एक साथ भेजा है। सवाल ये यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा लोकपाल ने क्यों किया है। क्या लोकपाल द्वारा रिपोर्ट को देरी से तैयार करना, भ्रष्टाचार की तरफ इशारा कर रहा है या फिर यह एक साधारण सी बात है। 

क्या है पूरा मामला?

दरससल, लोकपाल को हर साल अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के पास भेजनी होती है। राष्ट्रपति के पास पहुंचने के बाद इस रिपोर्ट को देश की संसद में भेजा जाता है। मामला यह है कि लोकपाल ने अपनी तीन रिपोर्ट 2022-23, 2023-24 और 2024-25 को राष्ट्रपति के पास एक साथ भेजा है। सवाल ये यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा लोकपाल ने क्यों किया है। । 

दरअसल, जस्टिस एएम खानविलकर ने मार्च 2024 में लोकपाल की कमान संभाली और अध्यक्ष बने। अध्यक्ष बनने के बाद जस्टिस एएम खानविलकर ने 2022-23 की रिपोर्ट मांगी जिसे राष्ट्रपति को दिया जाना था। लेकिन रिपोर्ट सही समय पर तैयार नहीं थी। अगले 6 महीने में साल 2022-23 और 2023-24 की रिपोर्ट को तैयार किया गया। फिर खानविलकर ने यह रिपोर्ट राष्ट्रपति को देने के उद्देश्य से समय मांगी। राष्ट्रपति भवन से इसके लिए अनुमति नहीं मिल सकी। 

जानकारी के अनुसार,राष्ट्रपति से मिलने के लिए लोकपाल की तरफ से लगभग चार औपचारिक पत्र भी भेजे गए, पत्राचार और बातचीत का सिलसिला अगस्त 2025 तक चलता रहा परंतु कोई जवाब नहीं मिला । 

समय बीतता गया और तीसरी रिपोर्ट भी तैयार करने की बारी आ चुकी थी। लोकपाल के अधिकारियों ने इसी बीच साल 2024-25 की रिपोर्ट तैयार कर ली। अब तीनों रिपोर्ट तैयार किया जा चुका था। लोकपाल की तरफ से तीनों रिपोर्ट को एक साथ राष्ट्रपति के पास डाक के माध्यम से भेज दिया गया।

लोकपाल द्वारा जारी किए गए एक पत्र (18 नवंबर 2025) में रिपोर्ट को तैयार करने में हुई देरी के कारणों का जिक्र किया गया है। पत्र में यह बताया गया है कि राष्ट्रपति (President of India) से मिलने के लिए समय मांगा गया था लेकिन समय आवंटित न होने के कारण रिपोर्ट भेजने में देरी हुई। इसी बीच तीसरी रिपोर्ट भी तैयार की गई। अब तीनों रिपोर्ट को एक साथ अध्यक्ष की अनुमति से भेजा जा रहा है। 

क्या लोकपाल में व्याप्त है लालफीताशाही?

दरअसल,लोकपाल बनाने का उद्देश्य यह था कि देश की संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सके। समय के साथ लोकपाल (Lokpal) के द्वारा की जा रही कार्यवाहियों पर ही अब लोगों को संदेह होने लगा है।

यह प्रश्न उठने लगा है कि अगर लोकपाल को अपनी वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजनी होती है तो इस कार्य में विलंब क्यों किया गया। साथ ही साथ राष्ट्रपति के बाद यह रिपोर्ट संसद के पटल पर नहीं रखा गया जिससे इस पर चर्चा भी नहीं हो सका। 

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क्या है लोकपाल और  कैसे करता है काम?

लोकपाल और लोकयुक्त अधिनियम 2013 के अनुसार, देश में केंद्र सरकार के लिए एक लोकपाल और राज्यों के लिए एक लोकयुक्त की स्थापना की बात गई। इस अधिनियम के माध्यम से पूरे देश के अंदर से भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश की गई।

इसके क्षेत्राधिकार में देश के समूह A के अधिकारी से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का नाम शामिल है। लोकपाल और लोकयुक्त अधिनियम 2013 के अनुच्छेद 48 में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि लोकपाल अपनी वार्षिक रिपोर्ट को राष्ट्रपति के पास समय पर भेजेगा लेकिन पिछले दो साल की रिपोर्ट में हुई देरी और तीन सालों के रिपोर्ट को एक साथ भेजा जाना एक संदेह को जन्म देता है।

यह संदेह ऐसा है कि जिस संस्था को भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए बनाया गया था, कहीं उसी संस्था में भ्रष्टाचार ने जड़ें जमाना शुरू तो नहीं कर दिया है? यह सवाल सिर्फ रिपोर्ट तैयार करने में हुई देरी के आधार नहीं उठ रहे हैं बल्कि लोकपाल की नयुक्ति की प्रक्रिया की पारदर्शिता के आधार पर भी ऐसे सवाल उठ रहे हैं। 

क्या है लोकपाल के नियुक्ति की प्रक्रिया?

लोकपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति लोकपाल की नियुक्ति एक चयन समिति की सिफारिश पर करती हैं।  लोकपाल के चयन समिति में भारत के प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष का नेता, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या फिर उनके द्वारा नामित व्यक्ति और राष्ट्रपति के द्वारा नामित एक न्यायविद शामिल होते हैं।

इस चयन समिति का बारीक अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि लोकपाल अध्यक्ष की नियुक्ति में सत्तापक्ष की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।

व्यावहारिक रूप में समझा जाए तो पूर्ण बहुमत वाली किसी भी सरकार का राजनीतिक (Political) प्रभाव लोकपाल पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का सवाल है कि वर्तमान में लोकपाल की प्रक्रिया पर राजनीतिक प्रभाव है जिसके कारण कार्रवाई सही तरीके से नहीं हो पा रही है। 

वहीं दूसरी तरफ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर कुछ समय से लगातार संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव डालने का आरोप भी लगता रहा है। यह पूरा प्रकरण मोदी सरकार को फिर से सवालों के कटघरे में खड़ा करता है।

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