क्या आप जानते हैं कि भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) की जिंदगी में एक ऐसी प्रेम कहानी भी छुपी हुई थी, जिसके बारे में लंबे समय तक बहुत कम लोगों को पता था? हम अक्सर उन्हें आज़ादी की लड़ाई के एक साहसी और दृढ़ नेता के रूप में याद करते हैं, लेकिन उनके जीवन का यह निजी अध्याय रहस्य और भावनाओं से भरा हुआ है।
साल 1934, जब बोस जेल में बीमारी के बाद इलाज के लिए यूरोप गए और वियना (Vienna) में रह रहे थे, तभी उनकी मुलाकात एक विदेशी युवती से हुई। वह युवती ऑस्ट्रिया की रहने वाली थी और शुरुआत में बोस के कुछ कामों में मदद करती थी|खासकर उनके लेख और पत्र टाइप करने में। धीरे-धीरे यह मुलाकातें बातचीत में बदलीं, बातचीत दोस्ती में और फिर यह रिश्ता कुछ और गहरा हो गया। लेकिन उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि इस रिश्ते को दुनिया से छुपाकर रखना पड़ा। यही वजह है कि बोस की यह प्रेम कहानी आज भी लोगों के लिए उत्सुकता और रहस्य का विषय बनी हुई है।
साल 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) के दौरान सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) को ब्रिटिश सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। जेल की कठिन परिस्थितियों और लगातार तनाव के कारण उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई। डॉक्टरों ने उनकी हालत देखते हुए बेहतर इलाज की सलाह दी। इसी वजह से ब्रिटिश सरकार ने उन्हें इलाज के लिए यूरोप जाने की अनुमति दे दी।
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे इलाज और यात्रा का खर्च उनके परिवार ने खुद उठाया। बोस इलाज के लिए यूरोप पहुंचे और कुछ समय तक वियना (Vienna) में रहे। लेकिन उनके लिए यह सफर सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं रहा। विएना में रहते हुए उन्होंने यूरोप में रहने वाले भारतीय छात्रों और प्रवासी भारतीयों को एकजुट करने का फैसला किया। उनका उद्देश्य था—विदेश में रहकर भी भारत की आजादी की लड़ाई को मजबूत बनाना। यही दौर उनके जीवन में कई नए और दिलचस्प अध्यायों की शुरुआत भी लेकर आया।
यूरोप में इलाज के दौरान सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) केवल आराम ही नहीं कर रहे थे, बल्कि भारत की आज़ादी की लड़ाई को दुनिया के सामने रखने की कोशिश भी कर रहे थे। इसी दौरान एक यूरोपीय प्रकाशक ने उन्हें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर एक किताब लिखने का प्रस्ताव दिया, जिसका नाम था भारतीय संघर्ष (The Indian Struggle)।
किताब लिखने के लिए बोस को ऐसी सहायक की जरूरत थी जो अंग्रेज़ी अच्छी तरह जानती हो और टाइपिंग भी कर सके। इस काम में उनके दोस्त Dr. Mathur ने मदद की और दो लोगों के नाम सुझाए। इनमें से एक थीं 23 वर्ष की ऑस्ट्रियाई युवती एमिली शेंकल।
आखिरकार जून 1934 में एमिली ने बोस के साथ काम शुरू किया। शुरुआत में यह रिश्ता केवल लेखक और सहायक का था, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत और साथ काम करने के दौरान दोनों के बीच एक खास अपनापन और गहरी समझ विकसित होने लगी। यही मुलाकात आगे चलकर उनकी जिंदगी का एक अहम मोड़ बन गई।
जब सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) की मुलाकात यूरोप में एक युवा ऑस्ट्रियाई महिला से हुई, तब उनकी उम्र लगभग 37 साल थी। उस समय उनका पूरा जीवन और सोच केवल भारत की आज़ादी के संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती थी। वे राजनीति और आंदोलन में इतने व्यस्त रहते थे कि निजी जीवन के लिए शायद ही कभी समय निकाल पाते थे।एसीएन नांबियार, हेडी मिलर, अमिय बोस के साथ सुभाष चंद्र बोस एवं एमिली शेंकल
लेकिन धीरे-धीरे यह मुलाकात उनके जीवन में एक नया भावनात्मक मोड़ लेकर आई। साथ काम करते-करते दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और एक गहरी समझ विकसित होने लगी। इतिहासकार Sugata Bose के अनुसार, बोस के सामने पहले भी कई विवाह प्रस्ताव आए थे, लेकिन उन्होंने सभी को ठुकरा दिया था, क्योंकि उनका ध्यान केवल देश की आज़ादी पर था।
मगर इस बार परिस्थितियाँ अलग थीं। समय के साथ यह रिश्ता सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं रहा और धीरे-धीरे एक शांत, गहरी और रोमांटिक प्रेम कहानी में बदल गया।
ऑस्ट्रिया में जन्मी उस युवती का परिवार पारंपरिक कैथोलिक पृष्ठभूमि से जुड़ा था। उनका जन्म 26 जनवरी 1910 को हुआ था और परिवार अपने संस्कारों और सामाजिक मान्यताओं को लेकर काफी सजग था। जब उनके पिता को पता चला कि उनकी बेटी भारत के प्रसिद्ध नेता सुभाष चंद्र बोस के साथ काम कर रही है, तो शुरुआत में वे थोड़ा असहज और चिंतित थे। उन्हें किसी विदेशी, खासकर एक भारतीय व्यक्ति के साथ इतने करीब काम करने पर संदेह था।
लेकिन जब उन्होंने बोस से मुलाकात की और उनके विचारों, सादगी और व्यक्तित्व को करीब से जाना, तो उनका नजरिया बदल गया। धीरे-धीरे वे बोस के स्वभाव और उनके आदर्शों से प्रभावित हो गए और उनकी सोच पहले से कहीं अधिक सकारात्मक हो गई।
भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे सुभाष चंद्र बोस के जीवन में भावनाओं से भरे कई निजी पल भी थे, जिनकी झलक उनके लिखे पत्रों में मिलती है। उस समय दोनों के बीच कई भावनात्मक पत्रों का आदान-प्रदान हुआ। 5 मार्च 1936 को लिखे एक पत्र में बोस ने बेहद स्नेह भरे शब्दों में लिखा कि “तुम मेरे दिल की रानी हो।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर इस जीवन में साथ रहना संभव न हो पाया, तो वे अगले जीवन में मिलने की उम्मीद रखते हैं। उसी पत्र में बोस ने अपने संघर्षपूर्ण जीवन का जिक्र करते हुए लिखा कि आज़ादी की लड़ाई में उन्हें जेल हो सकती है, गोली मारी जा सकती है या फांसी भी दी जा सकती है।
काफी समय तक एक-दूसरे के करीब रहने के बाद सुभाष चंद्र बोस और ऑस्ट्रिया की युवती एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) ने 26 दिसंबर 1937 को ऑस्ट्रिया के Bad Gastein में चुपचाप शादी कर ली। यह विवाह बेहद गोपनीय रखा गया था। कुछ विवरणों के अनुसार, शादी के समय एमिली ने भारतीय परंपरा के अनुसार सिंदूर भी लगाया था। उस दौर में बोस भारतीय राजनीति में एक बड़े नेता बन चुके थे, इसलिए विदेशी महिला से शादी राजनीतिक विवाद का कारण बन सकती थी। यही वजह थी कि दोनों ने अपने इस रिश्ते को सार्वजनिक करने के बजाय गुप्त रखने का फैसला किया।
समय के साथ सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) के जीवन में एक नई खुशी आई। 29 नवंबर 1942 को उनकी बेटी अनीता बोस फाफ (Anita Bose Pfaff) का जन्म हुआ। कहा जाता है कि बेटी का नाम इटली के प्रसिद्ध क्रांतिकारी ग्यूसेप्पे गैरीबाल्डी (Giuseppe Garibaldi) की पत्नी अनीता गरिबाल्डी (Anita Garibaldi) से प्रेरित होकर रखा गया था। उस समय बोस अपने राजनीतिक और सैन्य मिशन में व्यस्त थे, लेकिन दिसंबर 1942 में वे अपनी नवजात बेटी से मिलने के लिए Vienna पहुँचे।
हालाँकि यह मुलाकात ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। इसके बाद बोस अपने मिशन के लिए निकल गए और फिर कभी एमिली और अनीता के पास वापस नहीं आ सके। 1945 के बाद उनकी मृत्यु या रहस्यमयी ढंग से गायब होने की खबरें सामने आईं, जिसने इस प्रेम कहानी को हमेशा के लिए अधूरा छोड़ दिया।
एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) का जीवन भी किसी कहानी से कम नहीं था। सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) से बिछड़ने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन सादगी और आत्मसम्मान के साथ बिताया। एमिली ने लगभग 1996 तक जीवन जिया और इस दौरान उन्होंने अपनी बेटी अनीता बोस फाफ (Anita Bose Pfaff) की परवरिश अकेले ही की। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने बोस के परिवार से किसी तरह की आर्थिक मदद लेना पसंद नहीं किया।
कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा दी और मजबूत संस्कार दिए। आगे चलकर अनीता बोस फाफ जर्मनी में एक जानी-मानी अर्थशास्त्री और प्रोफेसर बनीं। इस तरह एमिली ने न सिर्फ एक मां के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ जीवन जीने का उदाहरण भी पेश किया। [SP/MK]