प्लासी की लड़ाई (23 जून 1757) भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना थी, जिसने भारत में अंग्रेज़ों के लिए सत्ता के द्वार खोल दिए और बंगाल का अपार खजाना ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में चला गया।
सिराजुद्दौला के शासनकाल में अंग्रेज़ों की अवैध किलेबंदी, कर न देना और आंतरिक दरबारी षड्यंत्रों ने संघर्ष को जन्म दिया; कलकत्ता पर 20 जून 1756 को कब्ज़ा और ब्लैक होल की घटना इसी टकराव की पृष्ठभूमि बने।
प्लासी के मैदान में अंग्रेज़ों की जीत का मुख्य कारण युद्ध नहीं, बल्कि गद्दारी थी—मीर जाफ़र, राय दुर्लभ और जगत सेठ जैसे लोगों के विश्वासघात के कारण सिराज हार गए, जबकि मीर मदन जैसे निष्ठावान सेनानायक वीरगति को प्राप्त हुए।
जब कभी भारतीय इतिहास की बात की जाती है, तो भारत में ब्रिटिश सत्ता को याद किया जाता है। इतिहासकारों के बीच कभी-कभी ये सवाल बनकर आता है, कि अंग्रेजों के लिए सत्ता के द्वार किस युद्ध के पश्चात खुले थे। जवाब में प्लासी की लड़ाई और बक्सर का युद्ध मुख्य रूप से उभरकर सामने आता है। प्लासी की लड़ाई भारतीय इतिहास में एक ऐसा यद्ध था, जिसके पश्चात यह सुनिश्चित हो गया कि भारत में कौन-सी विदेशी शक्ति राज करेगी। प्लासी की लड़ाई को भारतीय इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई के रूप में देखा जाता है, जिसने भारत में अंग्रेजों के लिए सत्ता के द्वार खोल दिए और अंग्रेजों के हाथ में भारतीय खजाना आ चुका था।
बंगाल में मुर्शिद कुली खान के शासन स्थापित होने के पश्चात् दिल्ली के मुग़ल सत्ता से बंगाल बहुत सारे मामले में लगभग स्वतंत्र हो गया था। बंगाल पर शासन कर रहे मुर्शिद कुली खान की 1727 में मृत्यु के पश्चात् कुर्सी को लेकर हुए घमासान ने पूरे भारत के राजननीतिक दिशा को मोड़ दिया था। मुर्शिद कुली खान के पश्चात् शुजा-उद्दीन मुहम्मद ख़ाँ (1727–1739) ने शासन की बागडोर संभाली थी। शुजा-उद्दीन तक तो बंगाल की स्वायत्तता बरकार रही थी। इसके बाद कुछ समय के लिए बंगाल पर अलीवर्दी ख़ाँ (1740–1756) का शासन स्थापित रहा। इसके बाद बंगाल की कमान सिराजुद्दौला (Siraj-ud-Daulah) ने संभाली।
मात्र 23 साल के युवा (Youth) के हाथ में सत्ता की बागडोर होना, सिराज के बहुत सारे रिश्तेदारों से सहन नहीं हो रहा था। अलीवर्दी खान की सबसे बड़ी बेटी घसीटी बेगम, जो कि सिराजुद्दौला की मौसी भी थी उनसे, यह बिल्कुल सहन नहीं हो पा रहा था, कि सिराजुद्दौला के हाथ में शासन की बागडोर सौंपी जाए। वहीं अलीवर्दी खान के दामाद मीरज़ाफर से भी यह सहन नहीं हो रहा था कि शासन की कमान कोई युवा, जो मात्र 23 वर्ष का है, उसको सौंपी जा रही है।
सत्ता का लालच हर किसी के मन में था। घसीटी बेगम के पति शौकत ज़ंग के समर्थकों का मानना था कि शौकत जंग को सत्ता की कमान सौंपी जानी चाहिए। किसको पता था कि विरोध का यह ज़हर भविष्य में बंगाल की राजनीति में सेंध लगा देगी।
अलीवर्दी खान की बेटी अमीना बेगम से जन्मा सिराज मात्र 23 साल की उम्र में ही सत्ता की शिखर चढ़ गया था। लोगों के आँखों का तारा होने के बजाय सिराज लोगों के आँखों का कांटा बनता चला गया। लोगों ने सत्ता के लालच में अपने ही सिराज के खिलाफ साजिशें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सिराज ने जब बंगाल की कमान संभाली तो उनके समक्ष अनेक चुनौतियां खड़ी थीं लेकिन तात्कालिक चुनौती ब्रिटश ईस्ट इंडिया कंपनी थी। सिराज ने अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन उसके अपने ही करीबियों ने उसके खिलाफ उसको परास्त करने के लिए जाल बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
कलकत्ता (Calcutta) की किलेबंदी जब ब्रिटिश कंपनी द्वारा की जाने लगी तो सिराज ने इस कार्य को अपने राज्य की सम्प्रभुता के खिलाफ एक चुनौती मान ली। 20 जून 1756 को सिराज ने कलकत्ता पर चढ़ाई करके अंग्रेजों से कलकत्ता को छीन लिया था।
अंग्रेज़ इतिहासकार जॉन ज़ेफेनिया होलवेल के अनुसार, इस घटना के साथ ही ब्लैक होल त्रासदी (Black Hole of Calcutta) की घटना भी घटित होती है। इस घटना में यह बताया गया है कि फोर्ट विलियम के एक बहुत छोटे कमरे, जिसका आकार लगभग (लगभग 14×18 फ़ुट) था। इस छोटे से कमरे में 146 अंग्रेज कैदियों को बंद कर दिया गया था, सुबह तक लगभग 23 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। ब्रिटिश इतिहासकार इस घटना को ब्लैक होल त्रासदी की संज्ञा देते हैं।
भारतीय इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने सिराज को क्रूर शासक साबित करने के लिए इस तरीके के आरोप लगाए थे, जबकि ऐसा सिराज के के आदेश पर बिलकुल नहीं किया गया था। प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार आर. सी. मजूमदार का कहना है कि इस घटना में जो आंकड़े बताए गए हैं वो विश्वसनीय नहीं हैं, 146 कैदियों को बंद किए जाने का दावा सत्य नहीं है।
इस प्रकार सिराज ने अंग्रेजों के कर (Tax) अदा न करने और बिना अनुमति के किलेबंदी की सज़ा देते हुए कलकत्ता के फोर्ट विलियम (Fort William) पर 20 जून 1756 को कब्ज़ा कर लिया। यहीं से ब्रिटिश कंपनी और सिराजुद्दौला के बीच संघर्ष का रास्ता तय हो गया।
किसने की गद्दारी
नवाब सिराजुद्दौला की तरफ से नियुक्त किये गए कलकत्ता के प्रभारी मानिक चंद को अंग्रेजो ने कलकत्ता के समर्पण हेतु एक अच्छी खासी रिश्वत दिए थी।
वहीं रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब के अधिकारियों के आपसी मतभेद का भी फायदा उठाया। अंग्रेजों की तरफ से मीर जाफ़र (नवाब की सेना का सेनापति), राय दुर्लभ, जगत सेठ (बंगाल का एक प्रभावशाली बैंकर) और ओमीचंद (एक धनी व्यापारी) जैसे प्रमुख शख्शियतों के साथ एक संधि कर ली गई थी और यह तय हुआ था कि सिराजुद्दौला की जगह मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाया जाएगा।
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23 जून 1757 को अंग्रेजों (Britishers) और सिराजुद्दौला की सेनाएं भागीरथी नदी के पूर्व में प्लासी के मैदान में खड़ी थीं। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव (Robert Clive) कर रहा था। दूसरी तरफ सिराज अपनी सेना लेकर मैदान में आगे बढ़ रहे थे। सिराजुद्दौला के विश्वसनीय पात्रों में से सेनापति रहे मीरज़ाफर ने अपनी गद्दारी का पहचान युद्ध के मैदान से पीछे हटकर दिया। सिराज के साथ मीरमदान और मोहन लाल पूरी सच्चाई के साथ खड़े रहे। वहीं मीरमदान लड़ाई लड़ते हुए अंग्रेज़ी तोप के गोले का शिकार हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए।
बाद में मीरज़ाफर को भी अंग्रेजों ( Britishers) के असली रूप का पहचान हुआ, परन्तु काफी देर हो चुकी थी। मीरज़ाफर को बाद में अंग्रेजों से संधि का बुरा परिणाम भुगतना पड़ा।वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजों के हाथ में भारतीय खजाना लग गया।