दिल्ली के प्रदूषण बजट में 209 करोड़ रुपये की कटौती
पर्यावरण विशेषज्ञों और विपक्ष की कड़ी आलोचना
सरकार का बचाव, लेकिन सवाल बरकरार
1 फरवरी 2026 को संसद के पटल पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने बजट पेश किया, जिसमें कई प्रकार की घोषणाएं हुई थी। रोजमर्रा की चीजें सस्ती हुईं, तो देश में कई विकाशील कार्य को बढ़ावा देने की बात भी कही गई। EV, सोलर पैनल से लेकर रेलवे तक में बड़ी घोषणाएं हुईं। हालांकि, इस आम बजट से कुछ को ख़ुशी हुई, तो कहीं नाराजगी भी देखी गई।
भारत का दिल कहे जाने वाले दिल्ली (Delhi) का दिल इस बजट के बाद मानों टूट सा गया। दिल्लीवासियों को उम्मीद थी कि प्रदूषण में उनके लिए कोई राहत वाली बात निकलकर सामने आएगी लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा। डबल इंजन की सरकार में दिल्लीवासियों को खांसने के लिए छोड़ दिया गया। आइये पूरा मामला समझते हैं।
दिल्ली के लिए प्रदूषण दिन-प्रतिदिन चिंता का सबब बनता जा रहा है। अब तो ऐसा कहा जाने लगा है कि दिल्ली में रहने वाले लोगों की उम्र अब 10 साल कम होते जा रही है और इसके पीछे की जड़ है, प्रदूषण। अब ऐसे में हर कोई ये जानना चाहता है कि इस बजट में निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने दिल्ली वासियों को राहत दी है या नहीं। प्रदूषण से निपटने के लिए कुछ खास इंतजाम हुआ है या नहीं।
तो आपको यह जानकारी हैरानी होगी कि इस बार प्रदूषण कंट्रोल के बजट पर मोदी सरकार ने पिछले साल के मुकाबले कटौती कर दी है। भारत सरकार ने साल 2026-27 के केंद्रीय बजट में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए 1 हजार 91 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं जबकि पिछले साल 2024-25 के केंद्रीय बजट में 1300 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे।
मतलब पूरे 209 करोड़ रुपए की कटौती इस बार मोदी सरकार ने की है। खासकर तब जब दिल्ली में डबल इंजन की सरकार है। केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है और दिल्ली में भी बीजेपी की ही सरकार है।
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इस समय दिल्ली कई बड़े पर्यावरणीय संकटों से गुजर रही है, जिसमें प्रदूषण सबसे मुख्य मुद्दा है और ऐसी परिस्तिथि में कटौती करना सरकार के रवैये पर सवाल खड़े करता है। दिल्ली में लू और खतरनाक चक्रवात आए दिन दस्तक दे रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2026-27 के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को 3 लाख 75 हजार 946 करोड़ रुपये दिए गए हैं। यह साल 2025-26 के बजट से करीब 8 प्रतिशत ज्यादा है। हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों को यह रकम कम लगती है।
पर्यावरण विशेषज्ञ अमित गुप्ता ने इस बजट को “गहराई से निराशाजनक (deeply disappointing)” बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता कार्यक्रम (NCAP) के लिए राशि में कटौती से वास्तविक काम प्रभावित होगा और हवा साफ करने के प्रयास कमजोर रहेंगे।
वहीं, अनुमिता रॉयचौधुरी (Anumita Roychowdhury) जो Centre for Science and Environment (CSE) की कार्यकारी निदेशक हैं। उन्होंने कहा कि बजट में प्रदूषण नियंत्रण के लिए मिल रही राशि प्रदूषण की गंभीर समस्या के पैमाने के अनुरूप नहीं है। यह राशि साधारण आवश्यकताओं से कम है और वायु गुणवत्ता सुधार के लिए पर्याप्त नहीं है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली-NCR जैसे क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के स्तर के हिसाब से बजट आवंटन पर्याप्त नहीं है और प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपायों के लिए अधिक वित्तीय समर्थन चाहिए।
जैसे ही डबल इंजन की सरकार की तरफ से प्रदूषण के बजट में कटौती की गई, तो विपक्षी पार्टियों ने इस डबल इंजन की सरकार को घेरना शुरू कर दिया। इस मामले पर भारतीय लिबरल पार्टी (BLP) के अध्यक्ष डॉ मुनीश रायज़ादा ने बीजेपी पर करारा हमला बोला।
उन्होंने कहा कि दिल्ली के प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार कितनी चिंतित है, ये बजट में कटौती से समझ आ जाता है। एक तरफ़ हर साल हवा ज़हरीली होती जा रही है, बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं, और दूसरी तरफ़ प्रदूषण से निपटने के लिए आवंटित बजट ही घटा दिया गया। यह फैसला बताता है कि डबल इंजन की सरकार के लिए प्रचार ज़्यादा अहम है, समाधान नहीं। अगर नीयत साफ़ होती, तो स्मॉग टावरों के विज्ञापन नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर सार्वजनिक परिवहन, कंस्ट्रक्शन कंट्रोल और इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन पर ठोस निवेश दिखता। प्रदूषण कोई मौसमी मुद्दा नहीं है, यह रोज़ लोगों की ज़िंदगी छीन रहा है और ऐसे में बजट कटौती सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य से समझौता है।
वहीं, कांग्रेस की तरफ से नेताप्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने भी केंद्र की बीजेपी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपात घोषित करना चाहिए और संसद में पूरी चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि वायु प्रदूषण गंभीर स्वास्थ्य खतरा है जबकि देवेंदर यादव जो दिल्ली कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हैं, उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और दिल्ली की सरकार ने प्रदूषण पर ठोस कदम नहीं उठाए, बजट में धूल, नाले और वायु गुणवत्ता सुधार के लिए पर्याप्त निधि नहीं दी।
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गौरतलब है कि जब विपक्ष की ओर से आरोप लगने लगे, तो मोदी सरकार ने अपना बचाव किया। केंद्र सरकार की तरफ से आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने सरकार का पक्ष रखा। उनका कहना है कि प्रदूषण अभी भी उनकी प्राथमिकता है। सरकार कई फंडिंग चैनलों के जरिए हवा और प्रदूषण को कम करने की लगातार कोशिश कर रही है। सीवेज कंट्रोल के साथ-साथ गंदे पानी की उचित निकासी पर भी जरूरी फंड आवंटन किया गया है।
बहरहाल, पक्ष-विपक्ष ने अपनी प्रतिक्रिया दे दी है लेकिन एक बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि दिल्ली के लोग कब तक इस प्रदूषण के संकट को झेलते रहेंगे। कहीं ऐसा ना हो एक दिन दिल्ली में साल के 8 से 9 महीने ‘इमरजेंसी’ घोषित करनी पड़ जाए।