

भारत में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह (Andaman and Nicobar Islands) में बसे जारवा जनजाति (Jarawa Tribe) जैसी एक आदिम और अलग-थलग जनजाति भी मौजूद है, जिसे सरकार ने सुरक्षित रखने और उसके अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर कई सक्रिय कदम उठाए हैं। जारवा लोग मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण अंडमान (South Andaman) के जंगलों में रहते हैं और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क बहुत सीमित रहा है, इसलिए उनका संरक्षण महत्वपूर्ण माना जाता है। 2025 में खबर आई कि पहली बार 19 जारवा जनजाति के सदस्यों को मतदाता सूची में शामिल किया गया और वोटर आईडी कार्ड प्रदान किए गए, जिससे उन्हें भारत के चुनावी अधिकार से जोड़ा गया।
आपको बता दें कि केंद्र और स्थानीय प्रशासन ने जारवा आरक्षित क्षेत्र की निगरानी और सुरक्षा भी बढ़ाई है, ताकि बाहरी लोगों का प्रवेश रोका जा सके और उनकी संस्कृति व जीवन सुरक्षित रहे। इससे साफ़ दिखता है कि सरकार इस आदिम समुदाय की रक्षा, पहचान और अधिकारों को बढ़ाने के लिए लगातार सक्रिय है। आज हम आपको जारवा जनजाति से जुड़े कुछ खास और महत्वपूर्ण बातें बताएंगे।
1.अंडमान की "जारवा जनजाति" ((Jarawa Tribe) हिन्द महासागर के टापुओं पर पिछले 55,000 वर्षों से निवास कर रही है। जारवा जनजाति के लोगों के मूल ओरिजिन अफ्रीका महाद्वीप माना जाता है।
2.यह जनजाति आज भी झुण्ड में रहकर शिकार करती और भोजन को इकठ्ठा करती है। जिस जगह पर जारवा जनजाति रहती है उसको 1979 में अधिसूचना के द्वारा ट्राइबल रिज़र्व एरिया घोषित किया गया था।
3. “जारवा जनजाति" के लोग आज भी धनुष बाण से शिकार करते हैं और इसी से मछलियों और केकड़ों का शिकार करते हैं। लेकिन दिसंबर 2025 में जारवा जनजाति के 19 सदस्यों को पहली बार भारत की मतदाता सूची में शामिल किया गया।
4. अंडमान और निकोबार प्रशासन ने 16 अक्टूबर 2017 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से स्पष्ट किया कि किसी भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस जनजाति से सम्बंधित तस्वीरों और वीडियो को पोस्ट करना कानूनन अपराध है और इसका उल्लंघन करने पर व्यक्ति को 3 वर्ष की सजा भी हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में जारवा का आवास और उसके आसपास का 5 किमी क्षेत्र “नो-गो” जोन घोषित किया, ताकि उनकी सुरक्षा बनी रहे।
5.जारवा जनजाति के लोग सूअर का मांस बहुत चाव से खाते हैं। वे समूह बनाकर सूअर का शिकार करते हैं। लेकिन कुछ बाहरी संपर्क के कारण अब धीरे-धीरे उनका जीवन और खान पान बदलते जा रहा है।
6. बाहरी संपर्क के कारण जारवा जनजाति उन बीमारियों से भी जूझ रहे हैं जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम है, जैसे खसरा और मम्प्स। खसरा और मम्प्स (Measles and Mumps) वायरल संक्रमण हैं, जो संक्रमित व्यक्ति से फैलते हैं और बुखार के साथ त्वचा पर दाने (खसरा) तथा गाल/जबड़े की सूजन (मम्प्स) पैदा करते हैं। 1997 के बाद खसरे का प्रकोप हुआ और जब कुछ जारवा बाहर आये, तब यह बीमारी फैली।
7. SC & ST (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 2016 के सेक्शन 3(1) में यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति इस जनजाति के लिए आरक्षित क्षेत्र में बिना अनुमति के प्रवेश करता है, उनकी तस्वीरें खींचता है, उनकी नग्न अवस्था का वीडियो बनाता है तो उसको तीन साल की सजा और 10,000 रुपये तक का जुर्माना भुगतना होगा।
8. जारवा जनजाति इलाके से केवल एक अंडमान ट्रंक रोड गुजरती है। जारवा इलाके में जाने के लिए लगातार एक साथ गाड़ियाँ बिना रुके गुजरती है और किसी भी गाड़ी को रुकने की इजाज़त नहीं है। "जारवा जनजाति" वाले इलाकों में पर्यटकों के रुकने पर पाबंदी है.
9. पुलिस और रिपोर्टों में पता चला कि कुछ बाहरी लोग शराब/ड्रग्स देकर जारवा महिलाओं का शोषण कर रहे हैं। कुछ यात्रियों ने आदिवासियों को देखने के लिए खुद कोड़ियाँ सार्स की तरह व्यवहार किया, जिससे उनके सम्मान को ठेस पहुंची। सरकार ने 2012 में “आदिवासियों के संरक्षण” नियमों को मंज़ूरी दी, ताकि जारवा को कानूनी सुरक्षा मिले।
10.डॉ. रतन चंद्र कार (Dr. Ratan Chandra Kar) एक भारतीय डॉक्टर हैं जिन्होंने 1998 से 2003 तक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में जारवा जनजाति के साथ काम किया और 1999 में फैले खसरे (measles) के महामारी के दौरान उनकी मदद की थी। जब यह बीमारी उनके लिए विलुप्ति का खतरा बन गई थी। उन्होंने पहले जनजाति का विश्वास जीतने के लिए उनकी भाषा सीखी और जंगलों में जाकर उनका इलाज किया, क्योंकि जारवा लोग बाहरी संपर्क से बेहद डरते थे। डॉ. कार ने कदमतला अस्पताल में खास ‘जारवा वार्ड’ बनाया और 100 से अधिक लोगों को बचाया, जिससे जारवा समुदाय के अस्तित्व को बड़ा नुकसान होने से रोका गया। उनके इन प्रयासों को देखते हुए साल 2023 में उन्हें चिकित्सा में पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। यह काम जारवा जनजाति के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए एक मिसाल माना जाता है। [Rh/SP]