पशुपतिनाथ शिव का रहस्य: महादेव किन-किन पशु रूपों में प्रकट हुए? सच जानकर चौंक जाएंगे!

शिवजी को हम सामान्यतः मनुष्य के रूप में योगी, ध्यानकर्ता और संहारक देवता के रूप में जानते हैं, लेकिन हिन्दू पौराणिक कथाओं में उनके पशु-सम्बंधी स्वरूपों का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
भगवान शिव (Lord Shiva) की तस्वीर
एक ऐसा पवित्र अवसर है जब भक्त भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना करते हैं Sora Ai
Published on
Updated on
6 min read
Summary
  • भगवान शिव को पशुपति कहा जाता है, जो यह दर्शाता है कि वे केवल मनुष्यों ही नहीं बल्कि समस्त जीव-जंतुओं और प्रकृति के भी स्वामी व रक्षक हैं।

  • नंदी, शरभ, कीर्तिमुख, वृषभ, सर्प और श्वान जैसे पशु-रूपों के माध्यम से शिव शक्ति, संतुलन, भक्ति, संरक्षण और अहंकार-विनाश का संदेश देते हैं।

  • शिव के ये पशु-आधारित रूप यह सिखाते हैं कि जीवन के हर स्वरूप प्रकृति, जीव और ऊर्जा से उनका गहरा और करुणामय संबंध है

2026 में महाशिवरात्रि (Mahashivratri) 15 फ़रवरी को मनाई जाएगी, एक ऐसा पवित्र अवसर है जब भक्त भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना करते हैं और उनके विविध रूपों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। शिवजी को हम सामान्यतः मनुष्य के रूप में योगी, ध्यानकर्ता और संहारक देवता के रूप में जानते हैं, लेकिन हिन्दू पौराणिक कथाओं में उनके पशु-सम्बंधी स्वरूपों का भी महत्वपूर्ण स्थान है।


शिव को “पशुपति” (Pashupati) कहा जाता है, जिसका अर्थ है “सभी प्राणियों के स्वामी”, जो जीव-जंतु के रक्षक भी हैं और उनके प्रति प्रेम रखते हैं। इससे शिव का संबंध पशु रूप से दर्शाया जाता है। शिव के वाहन नंदी (बैल) को न केवल उनका वाहन बल्कि शिव का एक अवतारी रूप माना जाता है, जो शक्ति, धैर्य और भक्ति का प्रतीक है।

इसके अलावा पुराणों में शिव को विभिन्न प्राणियों से जुड़ी कथाओं और अन्य रूपों में देखा गया है, जैसे कि शरभ, जो उनके शक्ति-स्वरूप को दर्शाता है। इस प्रकार शिवजी ने न केवल मनुष्य रूप धारण किया बल्कि प्राणी-आधारित रूपों में भी दिव्य लीला दिखाई है, जो प्रकृति और जीवन के समस्त रूपों से उनकी गहरी जुड़ाव को दर्शाता है। तो आइये आज हम भगवान शिव के कई पशु रूपों के बारे में जानते हैं।

नंदी

नंदी (बैल) (Nandi) की तस्वीर
नंदी (बैल) (Nandi)Wikimedia Commons

नंदी (बैल) (Nandi) भगवान शिव का सबसे प्रसिद्ध और पूजनीय पशु-रूप माना जाता है। नंदी केवल शिव का वाहन नहीं, बल्कि उनके परम भक्त, गण और अंश हैं। नंदी का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि वे धैर्य, शक्ति, अनुशासन और अटूट भक्ति के प्रतीक हैं। मान्यता है कि नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहने से वह सीधे भगवान शिव तक पहुँचती है। इसी कारण हर शिव मंदिर में नंदी की मूर्ति शिवलिंग के सामने स्थापित होती है। भारत के तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, काशी, उज्जैन और केदारनाथ जैसे क्षेत्रों में नंदी की विशेष पूजा होती है। दक्षिण भारत के मंदिरों में विशाल नंदी प्रतिमाएँ शिव भक्ति की गहराई को दर्शाती हैं।

पशुपति रूप

पशुपति रूप (Pashupati) की तस्वीर
पशुपति रूप (Pashupati) WikimediaCommons

पशुपति रूप (Pashupati) भगवान शिव का वह दिव्य स्वरूप है जिसमें वे सभी जीव-जंतुओं और प्राणियों के स्वामी माने जाते हैं। ‘पशुपति’ का अर्थ है पशुओं के पति, यानी पूरे जीव जगत के रक्षक और नियंत्रक। इस रूप का महत्व यह सिखाता है कि शिव केवल मनुष्यों के नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति और हर जीव के भगवान हैं। यह रूप करुणा, संतुलन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। भारत में काशी, उज्जैन (महाकाल), केदारनाथ, सोमनाथ और पशुपतिनाथ परंपरा से जुड़े कई शिव मंदिरों में शिव की पूजा पशुपति भाव से की जाती है। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का प्रभाव भारत की शिव परंपरा में भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

शरभ रूप

शरभ अवतार (Sharabh Avtaar) की तस्वीर
शरभ अवतार (Sharabh Avtaar)Wikimedia Commons

शरभ अवतार (Sharabh Avtaar) भगवान शिव का अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय रूप माना जाता है। इस रूप में शिव आधे सिंह और आधे पक्षी जैसे दिखाई देते हैं। पुराणों के अनुसार, जब भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के नरसिंह अवतार का उग्र रूप शांत नहीं हो रहा था, तब शिव ने शरभ रूप धारण कर उस उग्रता को नियंत्रित किया। इस अवतार का महत्व यह दर्शाता है कि शिव संतुलन और नियंत्रण के देवता हैं, जो असीम शक्ति को भी मर्यादा में ला सकते हैं। भारत में कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ प्राचीन शिव मंदिरों में शरभ रूप की मूर्तियाँ और प्रतीक मिलते हैं। विशेष रूप से दक्षिण भारत की शैव परंपरा में इस अवतार की पूजा और मान्यता गहरी है।

कीर्तिमुख रूप

कीर्तिमुख (Kirtimukh) की तस्वीर
कीर्तिमुख (Kirtimukh) Wikimedia Commons

कीर्तिमुख (Kirtimukh) भगवान शिव द्वारा उत्पन्न किया गया एक विशेष और भयावह प्रतीकात्मक रूप है, जिसका अर्थ है “यश का मुख”। इसे सामान्यतः सिंह-मुख के रूप में दर्शाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार शिव ने इसे अहंकार और घमंड के विनाश के लिए उत्पन्न किया था, लेकिन बाद में यही रूप रक्षक और शुभ प्रतीक बन गया। कीर्तिमुख का महत्व यह है कि अहंकार का अंत ही यश और संरक्षण का मार्ग है। भारत में तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य भारत के कई प्राचीन शिव मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर कीर्तिमुख की आकृतियाँ मिलती हैं, जहाँ इसे मंदिर और भक्तों की रक्षा करने वाला माना जाता है।

वृषभ रूप

वृषभ रूप (Vrishabh) की तस्वीर
वृषभ रूप (Vrishabh) Wikimedia Commons

वृषभ रूप (Vrishabh) भगवान शिव का वह पवित्र स्वरूप है जिसमें वे बैल के रूप में धर्म, सत्य और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं। वृषभ शक्ति के साथ-साथ संयम, स्थिरता और कर्तव्य का भी संकेत देता है। शिव के इस रूप का महत्व यह है कि सच्ची शक्ति वही है जो धर्म के मार्ग पर चलती हो। भारतीय संस्कृति में वृषभ को पवित्र माना गया है और इसे समाज के नैतिक संतुलन से जोड़ा जाता है। भारत के काशी, उज्जैन, केदारनाथ, सोमनाथ, तथा तमिलनाडु और कर्नाटक के प्राचीन शिव मंदिरों में वृषभ रूप की विशेष पूजा होती है। कई स्थानों पर नंदी और वृषभ को शिव के इसी धर्मात्मक स्वरूप के रूप में आदर दिया जाता है।

Also Read: भारत की कुछ ऐसी जगहें जहाँ दीवाली मनाना माना जाता है अपशकुन!

सर्प रूप

सर्प रूप (नाग) की तस्वीर
सर्प रूप (नाग) Wikimedia Commons

सर्प रूप (नाग) भगवान शिव का अत्यंत रहस्यमय और शक्तिशाली स्वरूप है। शिव के गले में विराजमान नाग काल, मृत्यु, कुंडलिनी शक्ति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं। यह रूप दर्शाता है कि शिव मृत्यु और भय से परे हैं और नकारात्मक शक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं। सर्प रूप का महत्व यह भी है कि जीवन और मृत्यु दोनों शिव के संतुलन में हैं। भारत में उज्जैन, काशी, तक्षकेश्वर (महाराष्ट्र), नागनाथ (महाराष्ट्र), नागेश्वर (गुजरात), कर्नाटक और तमिलनाडु के कई शिव मंदिरों में नाग-पूजा शिव भक्ति से जुड़ी हुई है। नाग पंचमी पर इस रूप की विशेष आराधना की जाती है।

भैरव रूप

भैरव और श्वान (कुत्ता) की तस्वीर
भैरव और श्वान (कुत्ता) Wikimedia Commons

भैरव और श्वान (कुत्ता) भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूप का प्रतीक हैं। भैरव को काल का नियंत्रक और धर्म का प्रहरी माना जाता है, जबकि कुत्ता उनका वाहन है, जो सतर्कता, निष्ठा और सुरक्षा का प्रतीक है। इस रूप का महत्व यह सिखाता है कि बुराई और अधर्म से समाज की रक्षा के लिए कठोरता भी आवश्यक है। भैरव रूप विशेष रूप से तंत्र, शक्ति और संरक्षण से जुड़ा हुआ है। भारत में काशी (काल भैरव), उज्जैन, वाराणसी, नेपाल सीमा से लगे क्षेत्र, राजस्थान और महाराष्ट्र में भैरव और श्वान से जुड़ी पूजा परंपराएँ प्रचलित हैं। काशी में तो बिना काल भैरव की अनुमति यात्रा अधूरी मानी जाती है। [Rh/SP]

भगवान शिव (Lord Shiva) की तस्वीर
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी : गौरी पुत्र गणपति को प्रसन्न करने का उत्तम दिन, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल

Related Stories

No stories found.
logo
www.newsgram.in