

West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से अपने तीखे तेवरों, वैचारिक संघर्ष के लिए जानी जाती रही है। लेकिन इस बार का विधानसभा चुनाव सिर्फ नारों और जनसभाओं तक सीमित नहीं है। चुनाव के दूसरे चरण से पहले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (Association for Democratic Reforms) और पश्चिम बंगाल इलेक्शन वॉच की जो रिपोर्ट सामने आई है, उसने राजनीतिक दलों के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें वो ईमानदारी की बात करते हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि दूसरे चरण के रण में उतरने वाले प्रत्याशियों में से एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिनका नाता या तो अपराध की दुनिया से है या फिर उनकी तिजोरियां करोड़ों की संपत्ति से लबालब हैं।
अपराध का साया: दागी उम्मीदवारों की बढ़ती तादाद
लोकतंत्र में जनता का प्रतिनिधि वह होना चाहिए जिसकी छवि बेदाग हो, लेकिन बंगाल के दूसरे चरण के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। विश्लेषण किए गए 171 उम्मीदवारों में से लगभग 25 प्रतिशत यानी 43 उम्मीदवारों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले होने की घोषणा की है। इनमें से भी सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 17 प्रतिशत (लगभग 29 उम्मीदवार) ऐसे हैं जिन पर हत्या, हत्या का प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच की जंग सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि दागियों को टिकट देने में भी बराबरी की दिख रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के 30 उम्मीदवारों में से 17 और टीएमसी के 30 में से 17 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। वामपंथी दलों और कांग्रेस की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है, उनके भी कई उम्मीदवार अदालती कार्यवाहियों का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या पार्टियां जीतने की क्षमता (Winability) के नाम पर जानबूझकर ऐसे चेहरों को चुन रही हैं जिनसे आम जनता को डर लगता हो?
धनकुबेरों का दबदबा: करोड़पति उम्मीदवारों की फौज
राजनीति अब केवल जनसेवा का माध्यम नहीं रही, बल्कि इसमें धनबल की भूमिका अपरिहार्य होती जा रही है। दूसरे चरण के उम्मीदवारों की संपत्ति का विवरण किसी को भी हैरत में डाल सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, दूसरे चरण में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में से लगभग 26 प्रतिशत करोड़पति हैं। यानी 171 में से 45 उम्मीदवार ऐसे हैं जिनकी घोषित संपत्ति एक करोड़ रुपये से अधिक है।
संपत्ति के मामले में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार सबसे आगे नजर आ रहे हैं। टीएमसी के 30 में से 26 उम्मीदवार करोड़पति हैं। वहीं भाजपा के 30 में से 19 उम्मीदवार इस सूची में शामिल हैं। कांग्रेस जैसी पार्टियों के पास भी करोड़पति उम्मीदवारों की कमी नहीं है। इन उम्मीदवारों की औसत संपत्ति करोड़ों में है, जबकि जिस राज्य में वे चुनाव लड़ रहे हैं, वहां की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है। यह विडंबना ही है कि गरीबों की राजनीति करने वाले दलों के उम्मीदवार खुद इतने अमीर हैं कि वे एक आम आदमी की वास्तविक समस्याओं से शायद ही इत्तेफाक रखते हों।
शिक्षा के स्तर पर नजर डालें तो स्थिति थोड़ी संतोषजनक दिखती है। लगभग 60 प्रतिशत उम्मीदवारों के पास स्नातक या उससे ऊपर की डिग्री है। हालांकि, करीब 35 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे भी हैं जो केवल आठवीं से बारहवीं कक्षा तक पढ़े हैं। उम्र के लिहाज से देखा जाए तो 40 प्रतिशत उम्मीदवार 25 से 50 वर्ष के बीच के हैं, जबकि 60 प्रतिशत उम्मीदवारों की आयु 51 से 80 वर्ष के बीच है। यह दर्शाता है कि बंगाल की राजनीति में अभी भी अनुभवी और उम्रदराज नेताओं का दबदबा कायम है और युवाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में पार्टियां अभी भी हिचकिचा रही हैं।
महिला प्रतिनिधित्व
राजनीतिक दल संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात तो जोर-शोर से करते हैं, लेकिन जब टिकट बंटवारे की बात आती है, तो वे अपनी पुरानी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाते। दूसरे चरण में महिला उम्मीदवारों की संख्या कम है। कुल 171 उम्मीदवारों में से केवल 19 महिलाएं ही मैदान में हैं। यह कुल संख्या का मात्र 11 प्रतिशत है। यह आंकड़ा शर्मनाक है क्योंकि बंगाल जैसे राज्य में, जहां की मुख्यमंत्री खुद एक महिला हैं, वहां राजनीति के मुख्यधारा में महिलाओं की इतनी कम भागीदारी चिंता का विषय है।
जनता के सामने विकल्प और चुनौतियां
एडीआर की यह रिपोर्ट (ADR report) मतदाताओं के लिए एक आईने की तरह है। एक तरफ भाजपा और टीएमसी के बीच सोनार बांग्ला और खेला होबे का शोर है, तो दूसरी तरफ इन नारों के पीछे छिपे दाग और दौलत का सच है। जब मतदाता मतदान केंद्र पर जाता है, तो उसके सामने अक्सर यह दुविधा होती है कि वह किसे चुने उस अपराधी को जो उसकी रक्षा का वादा कर रहा है, या उस करोड़पति को जो गरीबी दूर करने की कसम खा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कि राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास को सार्वजनिक करना होगा और यह बताना होगा कि उन्होंने एक बेदाग व्यक्ति के बजाय एक दागी को क्यों चुना, जमीन पर कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा।
[VT]