

NCERT एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि जो विवाद आठवीं कक्षा की पुस्तक के अध्याय-4 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' को लेकर हुआ था। इसमें न्यायपालिका (Judiciary) में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े संदर्भों का उल्लेख किया गया था और एनसीईआरटी ने कहा है कि यह पूरी पुस्तक अब वापस ले ली गई है और फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
सरकार ने पूरे NCERT सिलेबस की समीक्षा करने के लिए निर्देश जारी कर दिए है l वहीँ सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की बेंच ने राज्य, केंद्र,अन्य विश्वविद्यालयों को कहा है कि NCERT (National Council of Educational Research and Training) का विवादास्पद ड्राफ्ट तैयार करने वाले तीनों अधिकारियों (उनमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार शामिल हैं) से किसी तरह का कोई संपर्क न हो l कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि ये तीनों अब कभी कोई भी सरकारी नौकरी नहीं कर पाएंगे।
अदालत ने कहा कि उसके आदेश का उद्देश्य न्यायपालिका के कार्यों की किसी भी तर्कपूर्ण एवं वस्तुनिष्ठ आलोचना को रोकना नहीं है। इसके साथ ही बेंच ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वह विधि अध्ययन पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों की टीम एक सप्ताह के भीतर गठित करे। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने इस पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि हमने एनसीईआरटी में व्यवस्थागत बदलाव शुरू किए हैं। विषय विशेषज्ञों द्वारा जांच-पड़ताल किए बिना कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जाएगा।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर केंद्र एनसीईआरटी (NCERT) को पाठ्यक्रम की समीक्षा करने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन करे तो बेहतर होगा। सॉलिसिटर जनरल ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि केंद्र ने सभी कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। NCERT ने इस विषय पर कोर्ट से बिना किसी शर्त सार्वजनिक माफ़ी भी माँग चुकी है l एनसीईआरटी की ओर से जारी बयान में कहा गया,हमें अपनी करनी पर बेहद अफ़सोस है और न्यायपालिका को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है l एनसीईआरटी शैक्षणिक संवेदनशीलता, सटीकता, और जिम्मेदारी के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है।'
इस मामले में पहले ही उच्चतम न्यायालय ने इस पाठ्यपुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम.पंचोली की पीठ ने पुस्तक की सभी भौतिक तथा डिजिटल प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया था। साथ ही अदालत ने एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह भी पूछा था कि विवादित अध्याय के साथ पुस्तक प्रकाशित करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
विवादित चैप्टर लिखने वालों पर गिरी गाज
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र शासित प्रदेशों, केंद्र सरकार, सभी राज्यों के विश्वविद्यालयों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि जिन लोगों ने संबंधित विवादित चैप्टर का प्रारूप तैयार किया है, उन्हें भविष्य में पाठ्यक्रम तैयार करने के किसी भी कार्य से तुरंत अलग किया जाए. अदालत ने साफ किया है कि आने वाले दिनों में इन व्यक्तियों को ऐसी कोई भी जिम्मेदारी न दी जाए l
मीडिया और अपमानजनक आलोचना पर सख्त कार्रवाई
अदालत ने साफ़ शब्दों में कहा कि यह फैसला न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना पर कोई रोक नहीं लगाता है. हालांकि, इस मामले में संवेदनहीन टिप्पणी करने वाले मीडिया संस्थानों को कोर्ट नहीं बख्शेगा l कोर्ट की ओर से सरकार को कहा गया है कि वे मीडिया के उस हिस्से को चिन्हित करें जिन्होंने इस मामले में अपमानजनक टिप्पणियां की हैं. कोर्ट ने चेतावनी दी है कि ऐसे लोग देश-विदेश में कहीं भी छिपे हों, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी l
अब समझते है कौन होता है सोलिसिटर जनरल:
सॉलिसिटर जनरल का पद संवैधानिक (Constitutional) नहीं है (अनुच्छेद 76 के तहत अटॉर्नी जनरल के विपरीत) बल्कि यह एक वैधानिक (Statutory) पद है।
तुषार मेहता वर्तमान में भारत के सॉलिसिटर जनरल हैं, जिन्होंने 11 अक्टूबर, 2018 को पदभार ग्रहण किया था और उन्हें आगे के कार्यकाल के लिए पुनः नियुक्त किया गया है। अटॉर्नी जनरल के बाद दूसरे सर्वोच्च विधि अधिकारी के रूप में, वे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह पद वैधानिक है, जिसका कार्यकाल तीन वर्ष का होता है और नियुक्ति पर कैबिनेट समिति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
सॉलिसिटर जनरल के प्रमुख पहलू:
सॉलिसिटर जनरल भारत सरकार को कानूनी मामलों पर सलाह देता है और सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों में उसकी ओर से पेश होता है। भारत के अटॉर्नी जनरल को रिपोर्ट करता है और उनकी सहायता करता है। अगर इनके कामकाज की अवधि देखा जाए तो सामान्यतया 3 वर्ष की अवधि के लिए पद पर आसीन होते हैं, पुनर्नियुक्ति भी हो सकती है।सरकारी अनुमति के बिना सॉलिसिटर जनरल भारत सरकार के खिलाफ किसी भी पक्ष को सलाह नहीं दे सकता है या आपराधिक मामलों में आरोपी व्यक्तियों का बचाव नहीं कर सकता है।
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