

NCERT की कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े उल्लेख पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए अध्याय हटाने का निर्देश दिया।
मुनीश कुमार रायज़ादा ने फैसले पर सवाल उठाते हुए न्यायपालिका में जवाबदेही, निचली अदालतों में भ्रष्टाचार, काले धन और राजनीतिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों को उठाया।
पूर्व मामलों और लंबित मुकदमों की पृष्ठभूमि में न्यायिक जवाबदेही, पारदर्शिता और संस्थागत सुधार को लेकर देशभर में नई बहस शुरू हो गई है।
देश में इस समय भारी बवाल मचा हुआ है। छात्र UGC के मुद्दे को लेकर सड़कों पर हैं, तो सत्ता पक्ष एप्सटीन फाइल और अमेरिका के साथ हुए डील को लेकर घिरी हुई है, विपक्ष इसको लेकर सरकार से सवाल करने में व्यस्त है और इसी बीच एक और मुद्दे ने देश में दस्तक दे दी है। ये दस्तक भ्रष्टाचार की है, जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी (NCERT) को कड़ी फटकार लगाई है।
ये भ्रष्टाचार एनसीईआरटी (NCERT) के भीतर नहीं बल्कि जो किताब छपते हैं, उसके अंदर देखने को मिला है। एनसीईआरटी (NCERT) ने क्लास 8 की एक किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े चीजों का जिक्र किया है। जिसपर कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है और कहा है कि इस लेख को तुरंत किताब से हटाया जाए। अब इस मामले पर तर्क वितर्क का दौर भी शुरू हो गया है। भारतीय लिबरल पार्टी के अध्यक्ष डॉ मुनीश कुमार रायज़ादा (Munish Kumar Raizada) ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही एनसीईआरटी (NCERT) को यह आदेश दिया कि वो क्लास 8 की किताब से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े चीजों को हटाएं, तो इसपर भारतीय लिबरल पार्टी के अध्यक्ष डॉ मुनीश कुमार रायज़ादा (Munish Kumar Raizada) खुलकर सामने आए और सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर प्रश्न खड़े किये।
उन्होंने कहा, ''एनसीईआरटी ने “करप्शन इन ज्यूडिशियरी” नाम से एक अध्याय क्या लिख दिया, हमारे देश का सुप्रीम कोर्ट तिलमिला उठा। सवाल उठाए गएकि यह लोग कौन हैं? यह अध्याय किसने लिखा और किसकी हिम्मत से इसे कक्षा के छात्रों के लिए प्रकाशित किया गया? फिर जवाबदेही की बात होने लगी। पूछा गया कि किस अधिकारी ने यह निर्णय लिया कि ऐसा अध्याय लिखा जाए, जबकि देश में पाँच करोड़ से अधिक मामले अदालतों में लंबित पड़े हैं।
डॉ मुनीश कुमार रायज़ादा (Munish Kumar Raizada) ने निचली अदालतों में होने वाले भ्रष्टाचार की बात करते हुए कहा, ''निचली अदालतों में जाएँ तो खुलेआम रिश्वत माँगने की शिकायतें सुनने को मिलती हैं, फिर भी मामलों का निपटारा नहीं होता। हमारे देश की आपराधिक न्याय प्रणाली चरमराई हुई दिखाई देती है। आम लोगों की समस्याओं पर चिंता कम है, लेकिन न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को लेकर बहस तेज हो जाती है।"
भारतीय लिबरल पार्टी के अध्यक्ष डॉ मुनीश कुमार रायज़ादा (Munish Kumar Raizada) ने राजनीति में होने वाले भ्रष्टाचार पर भी अपनी राय रखी। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली में बढ़ने वाले प्रदूषण पर भी अपनी चिंता ज़ाहिर की।
उन्होंने कहा, ''जवाबदेही की बात होती है, लेकिन राजनीति में काले धन पर ठोस कदम कब उठेंगे? क्या राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने पर गंभीर चर्चा होगी? देश के लोकतंत्र की मजबूती को लेकर चिंता कहाँ दिखाई देती है? विश्व गुरु बनने की बातें की जाती हैं। यह सकारात्मक है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों जवाबदेही पर चर्चा कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। यदि संस्थागत ढाँचे को मजबूत किया जाए और जवाबदेही बढ़ाई जाए तो भ्रष्टाचार कम हो सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि इन मुद्दों पर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई जाती। मैं मानता हूँ कि सभी विभागों में भ्रष्टाचार को उजागर किया जाना चाहिए। भारत की जनता को यह जानने का अधिकार है कि देश को पीछे धकेलने वाली घूसखोरी और अनियमितताओं के पीछे कौन जिम्मेदार है।"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, '' दिल्ली का एयर पॉल्यूशन इंडेक्स 900 से ऊपर पहुँच जाता है, लेकिन इस पर उतनी चिंता नहीं दिखाई देती। प्रधानमंत्री राहत कोष में आए धन का स्रोत और खर्च का विवरण सार्वजनिक करने की माँग भी समय-समय पर उठती रही है। भ्रष्टाचार के कारण आम लोग परेशान हैं, फिर भी इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इन मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।''
दरअसल, एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े आपत्तिजनक विषय को छापा गया था। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। गुरुवार को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश करार दिया और बाजार से किताब को वापस लेने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में एनसीईआरटी (NCERT) की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस सुओ मोटो केस में हम माफी मांगते हैं। इस पर CJI ने कहा कि मीडिया में हमारे दोस्तों ने यह नोटिस भेजा और इसमें माफी का एक शब्द नहीं है। सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि चैप्टर तैयार करने वाले दो लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। वे कभी यूजीसी या किसी मंत्रालय के साथ काम नहीं कर सकेंगे। इसपर अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी।
भ्रष्टाचार की अगर बात करें तो न्यायपालिका भी इससे अछूता नहीं रहा है। समय-समय पर यहाँ भी भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिली है। हालांकि, इतिहास में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज को दोषी बताते हुए, पद से हटाया नहीं गया है लेकिन जांच और महाभियोग प्रक्रिया जरूर शुरू हुई है। कुछ ऐसे ही मामलों पर एक नज़र डालते हैं।
जस्टिस वी. रामास्वामी (1993): जस्टिस वी. रामास्वामी सुप्रीम कोर्ट के पहले जज थे, जिनपर वित्तीय अनियमितताओं के लिए महाभियोग चलाया गया था। उनपर आरोप था कि जब वो पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, तब उन्होंने अपने आधिकारिक आवास के नवीनीकरण के लिए फिजूलखर्ची की थी। उन्होंने चांदी की छड़ें, महंगे कालीन और फर्नीचर अपने आवास के लिए ख़रीदे थे। सुप्रीम कोर्ट के जजों की एक समिति ने उन्हें 85 आरोपों में से कई में दोषी पाया। इसके बाद उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई। सदन में विपक्ष ने उनके खिलाफ वोट दिया, लेकिन तत्कालीन सत्ताधारी दल कांग्रेस के सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। बहुमत ना होने के चलते प्रस्ताव गिर गया और वो पद से हटाए नहीं जा सके। यह भारतीय इतिहास में किसी जज के खिलाफ ऐसा पहला मामला था।
जस्टिस सौमित्र सेन (2011): यह मामला 2011 का है, जब कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग आया था। उनपर आरोप था कि 1984 में जब वो वकील थे, तब उन्हें रिसीवर' नियुक्त किया गया था, जहाँ उन्होंने ₹33.23 लाख की हेराफेरी की और इसे उन्होंने कोर्ट से छिपाया। साथ ही जब जज बने, तो फंड का हिसाब तक नहीं दिया। राजयसभा में अगस्त 2011 में इसको लेकर वोटिंग हुई थी जहाँ 189-17 के बहुमत से उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित हुआ लेकिन जब लोकसभा में वोटिंग होनी थी, उससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। भारत के इतिहास के वो पहले जज बने, जिन्हें औपचारिक रूप से हटाया गया था।
जस्टिस यशवंत वर्मा मामला (2025): जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला साल 2025 में सामने आया था। फरवरी 2025 में ED ने दिल्ली में कुछ संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी की थी, जिसका लिंक जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास तक पहुँचा। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके परिसर से ₹20 करोड़ से अधिक की बेहिसाब नकदी और आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद किए गए। घटना सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत संज्ञान लिया और एक आंतरिक जांच समिति गठित की। उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग चलाने की सिफारिश भी हुई लेकिन अभी तक इसपर संसद में चर्चा नहीं हो पाई है। फिलहाल जस्टिस यशवंत वर्मा वर्तमान में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज के रूप में तैनात हैं, लेकिन वो कार्रवाई प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
तो इन मामलों को देखकर यह कह सकते हैं कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार देखने को मिल सकता है।