

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को बड़ी सफलता मिली है। राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी), नई दिल्ली ने 3 फरवरी 2026 के आदेश में अल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ चल रही कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (CIRP) को पूरी तरह वापस ले लिया है। ट्रिब्यूनल ने पाया कि यह प्रक्रिया धोखाधड़ी, मिलीभगत और दुर्भावनापूर्ण इरादे से दूषित थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अपराध की कमाई को लॉन्डर करना और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत ईडी की जांच को बाधित करना था।
एनसीएलटी ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016 की धारा 65 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्पष्ट किया कि दिवालियापन ढांचे का दुरुपयोग अपराध की कमाई को वैध बनाने या पीएमएलए कार्यवाही को विफल करने की ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने सीआईआरपी रद्द कर दी, आईबीसी धारा 14 के तहत लगी रोक हटा दी, रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति और उसके द्वारा की गई सभी कार्रवाइयों को शून्य घोषित किया।
ऑपरेशनल क्रेडिटर साई टेक मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड पर प्रक्रिया के घोर दुरुपयोग के लिए 5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। ईडी की जांच कोलकाता (Kolkata) पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस की एफआईआर पर आधारित है। जांच से पता चला कि अल्केमिस्ट होल्डिंग्स लिमिटेड और अल्केमिस्ट टाउनशिप इंडिया लिमिटेड ने निवेशकों को उच्च रिटर्न, प्लॉट, विला या फ्लैट देने के लालच में 1840 करोड़ रुपए से अधिक जुटाए, लेकिन न तो संपत्ति दी गई और न ही पैसा लौटाया गया। ये फंड इंटर कॉर्पोरेट डिपॉजिट (ICD) के रूप में अल्केमिस्ट ग्रुप की अन्य कंपनियों में डायवर्ट कर दिए गए।
ईडी ने 2 मार्च 2021 को अभियोजन शिकायत दायर की, जिसके बाद 19 जुलाई 2024 और 11 सितंबर 2025 को पूरक शिकायतें दाखिल की गईं। एजेंसी ने सात अनंतिम कुर्की आदेशों से 492.72 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्तियां अटैच की हैं। सीआईआरपी साई टेक मेडिकेयर द्वारा आईबीसी धारा 9 के तहत आवेदन से शुरू हुई थी। लेनदारों की समिति (COC) में अल्केमिस्ट ग्रुप की कंपनियां हावी थीं, जिसमें टेक्नोलॉजी पार्क्स लिमिटेड के पास 97 प्रतिशत वोटिंग शेयर थे। ईडी ने ट्रिब्यूनल को सबूत दिए कि सीओसी के प्रमुख सदस्य पीएमएलए (PMLA) के आरोपी थे और अपराध की कमाई के लाभार्थी थे। प्रक्रिया का इस्तेमाल कुर्की संपत्तियों को वापस लेने और आईबीसी धारा 32ए के तहत छूट पाने के लिए किया जा रहा था।
पूर्व कर्मचारी गौरव मिश्रा को रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल बनाना निष्पक्षता पर सवाल उठाता था, जबकि ईडी (ED) को पक्षकार बनाने में जानबूझकर देरी की गई।एनसीएलटी ने निष्कर्ष निकाला कि आईबीसी लाभकारी कानून है, जो वास्तविक दिवालियापन समाधान के लिए है, न कि धोखाधड़ी को साफ करने या अपराध की कमाई को वैध बनाने के लिए।
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