

दिल्ली एम्स, सफदरजंग और RML जैसे बड़े सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में डॉक्टरों के पद खाली हैं, जो प्रशासनिक लापरवाही को दिखाता है।
स्वास्थ्य बजट बढ़ने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर न भर्ती हो रही है, न व्यवस्था सुधर रही है।
डॉक्टरों की कमी का सीधा असर गरीब और आम मरीजों पर पड़ रहा है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भरोसा कमजोर हो रहा है।
देश भर से लोग, दिल्ली में अलग-अलग वजह से आते हैं। कुछ लोग न्याय की उम्मीद लेकर सुप्रीम कोर्ट आते हैं तो कुछ लोग बीमारियों से जूझते हुए दिल्ली एम्स और सफदरजंग अस्पताल में आते हैं। देश के अन्य राज्यों से मरीजों का और उनके परिजनों का इलाज की उम्मीद लेकर दिल्ली आना उनका शौक नहीं मज़बूरी है।
पिछले दिनों दिल्ली एम्स के गेट से भारी संख्या में मरीजों और उनके परिजनों को खुले आसमान के नीचे ठंड की रात्रि में सोते हुए देखा गया था। दिल्ली सरकार, इस मामले में सवालों के घेरे में दिखी। जनता की तरफ से बहुत सारे सवाल खड़े किये जाने लगे। हालांकि, सरकार ने समस्या को संज्ञान में लेते हुए कुछ रैन बसेरा की व्यवस्था की। वहीं अब दिल्ली के अस्पतालों के अंदर की खबर निकलकर आ रही है। दिल्ली के एम्स से लेकर सफदरजंग सहित अन्य अस्पतालों में डाक्टरों की कमी से एक बार फिर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा हो गया है।
दिल्ली एम्स में देश भर से लोग इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं। परन्तु राजयसभा में प्रस्तुत आंकड़े के अनुसार, दिल्ली एम्स (Delhi AIIMS) में डाक्टरों की कमी है। बता दें कि दिल्ली एम्स के लिए साल 2025 एक सर्वे हुआ था जिसमें पाया गया कि लगभग 30 से 40 प्रतिशत सीट खली पड़ी है। डॉक्टरों की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थायी भर्ती की प्रक्रिया सालों तक अटकी रहती है। परिणाम यह होता है कि एक-एक डॉक्टर पर दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों मरीजों का भार डाल दिया जाता है। इसका सीधा प्रभाव इलाज की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा और डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
सफदरजंग अस्पताल की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान की गई थी। यह अस्पताल शुरू में केवल 204 बिस्तरों का था और इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध में घायल अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं के सैनिकों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना था। फिलहाल यह अस्पताल 3000 से अधिक बिस्तरों वाला भारत (India) का बहुत बड़ा सरकारी अस्पताल है। सफदरजंग अस्पताल में लगभग 19 प्रतिशत डाक्टरों की सीट खली पड़ी है। वहीं अस्पताल के बाहर सुविधाओं के आभाव में मरीजों का बुरा हाल रहता है। अस्पतालों में अगर डाक्टरों की इतनी सीट खली पड़ी है तो फिर इलाज की व्यवस्था पर बड़ा प्रश्न है। क्योंकि अगर डॉक्टरों की संख्या ही अस्पतालों में नहीं रहेगी तो फिर मरीज इलाज के लिए कहा जाएगा।
दिल्ली के बड़े-बड़े अस्पतालों (Hospitals) का बुरा हाल है। एक तरफ जहां केंद्रीय बजट 2026-27 में लगभग ₹1.06 लाख करोड़ स्वास्थ्य विभाग हेतु आवंटित हुआ है।राज्यसभा के आंकड़ों से जो सच्चाई बाहर आई है उनसे अस्पतालों के विकास और प्रशासन पर सवाल उठने लाज़मी हैं । केवल कागजों में ही अस्पतालों के विकास को दिखाए जाने के बजाए धरातल पर अस्पतालों का विकास कब दिखेगा ?
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भारतीय लिबरल पार्टी के अध्यक्ष मुनीश कुमार रायज़ादा जो कि पेशे से अमेरिका में डॉक्टर हैं, ने कहा है कि देश की राजधानी दिल्ली से अगर इस तरीके से स्वास्थ्य व्यवस्था के बदहाली की खबरें सामने आ रही हैं, तो सरकार की नीतिगत असफलता का आईना है। एम्स, सफदरजंग और राम मनोहर लोहिया जैसे संस्थान वर्षों से देश के गरीब, मज़दूर और मध्यम वर्ग के लिए जीवनरेखा बने हुए हैं। लेकिन आज यही संस्थान डॉक्टरों की भारी कमी, अव्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता से जूझ रहे हैं।
सरकार हर बजट में स्वास्थ्य (Health) को प्राथमिकता देने के बड़े-बड़े दावे करती है। आंकड़ों की भाषा में करोड़ों रुपये आवंटित कर दिए जाते हैं, मगर ज़मीनी सच्चाई यह है कि अस्पतालों में इलाज करने वाले हाथ ही नहीं हैं। अगर डॉक्टर (Doctor) के पद खाली हों, तो यह साफ़ इशारा करता है कि व्यवस्था भीतर से खोखला हो चुका है। सवाल यह नहीं कि पैसा कितना दिया गया, सवाल यह है कि उस पैसे से सिस्टम मजबूत क्यों नहीं हुआ?
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल योजनाओं, उद्घाटनों और प्रमाणपत्रों तक सीमित कर दिया गया है।