

2026 चुनाव से पहले बढ़ा सियासी टकराव: एसआईआर मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए और इसे बंगाल के मतदाताओं के अधिकारों पर हमला बताया।
मतदाता सूची को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुहार: ममता बनर्जी ने सर्वोच्च न्यायालय से अपील की कि आगामी विधानसभा चुनाव 2025 की मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएँ, क्योंकि नए पुनरीक्षण से लाखों वैध मतदाता बाहर हो सकते हैं।
खुद कोर्ट में रखी बात: ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेकर न्यायालय में अपनी दलीलें पेश कीं और बंगाल को चुनकर निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया।
पश्चिम बंगाल की राजनीति दिनों-दिन गर्म होती जा रही है। साल 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 साल के वामपंथ के राजनीतिक किले को ध्वस्त करके मुख्यमंत्री बनी ममता बनर्जी के लिए साल 2026 एक चुनौती है। एक तरफ जहाँ एसआइआर को लेकर ममता बनर्जी ने केंद्र की मोदी सरकार को और चुनाव आयोग को घेरा है तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में विपक्षी दल भी ममता बनर्जी को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। एसआइआर (SIR) मामले को लेकर ममता बनर्जी दिल्ली तक पहुंचकर मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर बहुत कुछ बोलीं। 4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी पहुंचकर न्याय की गुहार लगते हुए दिखाई दे रही थी। बंगाल एसआईआर (SIR) मामले में न्याय न मिलने की शिकायत करते हुए बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने मुख्य न्यायाधीश की अदालत में ढाई घंटे से अधिक इंतजार किया और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट (SUpreme Court) को यह बताते हुए अपनी दलीलें शुरू कीं, कि पश्चिम बंगाल के लोगों को कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा है।
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देते हुए, ममता बनर्जी ने सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना की है कि अगला विधानसभा चुनाव वर्तमान में 2025 की मतदाता सूची के आधार पर होना चाहिए। एसआइआर (SIR) के आधार पर तैयार की गई सूचि से चुनाव न कराया जाए। इसके कारणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि लाखों वैध मतदाताओं के इससे बाहर होने का खतरा है। ये बंगाल के लोगों के साथ अन्याय है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में कहा,"जो बेटियां अपने ससुराल चली गई हैं... उनके नाम तक मिटा दिए गए हैं। कभी-कभी गरीब लोग काम के लिए घर बदलते हैं या पता बदलते हैं, लेकिन 'तार्किक विसंगति' की श्रेणी में उनके नाम भी मिटा दिए गए हैं।"
ममता बनर्जी ने एसआइआर का ज़िक्र करते हुए जज से कहा,"चुनाव आयोग के उत्पीड़न के कारण 100 से अधिक बीएलओ (बंगाल लोक अभियोजक) मारे गए हैं... और कई अन्य अस्पताल में भर्ती हैं। बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है महोदय, मुझे बताइए... असम क्यों नहीं (जहां इस साल चुनाव होने हैं) पूर्वोत्तर क्यों नहीं?"
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बता दें कि ममता बनर्जी वकील नहीं हैं। हालांकि, उन्होने कानून की डिग्री यानी एलएलबी (LLB), जोगेश चंद्र चौधरी विधि महाविद्यालय (Jogesh Chandra Chaudhuri Law College) से हासिल की है।
उनकी अन्य शैक्षणिक डिग्रियों की बात करें तो उन्होंने कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज (Jogamaya Devi College) से बीए (B.A) की डिग्री इतिहास में हासिल किया है। इसके बाद इस्लामिक इतिहास (Islamic History) में परास्नातक की डिग्री (MA) कलकत्ता विश्वविद्यालय (University of Calcutta) से हासिल की है। इसके साथ ही ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) ने अपना राजनीतिक सफर भी शुरू कर दिया था। साल 2011 में पश्चिम बंगाल (West Bengal) में 34 साल के वामपंथ राजनीतिक किले को ध्वस्त करके मुख्यमंत्री बनी।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में कोई भी याचिका एडवोकेट आन रिकॉर्ड एसोसिएशन (AOR) के माध्यम से ही दायर की जा सकती है। अब सवाल यह आता है कि ममता बनर्जी कैसे सुप्रीम कोर्ट में बोल सकी और अपने पक्ष को अच्छे से जज के सामने रखा।
बता दें कि भारत में कोई भी व्यक्ति, जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में है, वह खुद ही न्यायलय में अपनी बात रख सकता है। इसके लिए वकील होना ज़रूरी नहीं है। ऐसे व्यक्ति को “पार्टी-इन-पर्सन” कहा जाता है। हालांकि पहले सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से इसके लिए अनुमति लेनी होती है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से अनुमति मिलने के पश्चात् वह अपनी बात न्यायालय में खुद रख सकता है। अनुमति मिलने के पश्चात्,वह व्यक्ति खुद लिखित दलील दे सकता है और न्यायाधीश के समक्ष मौखिक बहस भी कर सकता है।