'उड़ान' ने बदली थी देश की सोच, आज फिर ऐसे ही कंटेंट की टीवी को जरूरत: शेखर कपूर

फिल्म मेकर शेखर कपूर ने भारतीय टेलीविजन के सुनहरे दौर को याद किया और मूल्य आधारित एवं समाज को दिशा देने वाली कहानियों के घटने पर चिंता व्यक्त की।
अभिनेता और अभिनेत्री एक साथ अभिनय करते हुए।
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फिल्ममेकर शेखर कपूर ने भारतीय टेलीविजन के सुनहरे दौर को याद किया और मूल्य आधारित एवं समाज (Society) को दिशा देने वाली कहानियों के घटने पर चिंता व्यक्त की। शेखर कपूर ने मशहूर टीवी शो 'उड़ान' को याद करते हुए कहा, ''यह सिर्फ एक धारावाहिक नहीं था, बल्कि एक ऐसा माध्यम था जिसने पूरे देश की सोच को प्रभावित किया। आज के भारत को फिर से ऐसे ही कंटेंट की जरूरत है, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज में सकारात्मक बदलाव ला सके।'' शेखर कपूर ने सोशल मीडिया (Social Media) प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर 'उड़ान' से जुड़ी पुरानी तस्वीर साझा की।

इसके साथ उन्होंने कहा, ''यह सीरियल उस दौर में आया था, जब देश में सिर्फ एक ही टीवी चैनल हुआ करता था और वो था 'दूरदर्शन'। साल 1991 में इसका आखिरी एपिसोड प्रसारित हुआ था, लेकिन इसकी यादें आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। उस समय 'उड़ान' एक जुनून बन चुका था और इसकी लोकप्रियता किसी बड़े आंदोलन से कम नहीं थी।''

उन्होंने बताया, '''उड़ान' के प्रसारण के दौरान पहचान इतनी मजबूत थी कि शो के कलाकार जहां भी जाते, लोग घेर लेते थे। छोटे शहरों और गांवों में कलाकारों को उनके किरदार के नाम से जाना जाता था। लोग मुझे 'कलेक्टर साहब' कहकर बुलाते थे। मैंने इस सीरियल में कलेक्टर की भूमिका निभाई थी।''

शेखर कपूर (Shekhar Kapur) ने कहा, "'उड़ान' का असर सिर्फ लोकप्रियता तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका सामाजिक प्रभाव काफी गहरा था। खासतौर पर महिलाओं पर इस सीरियल ने बड़ा असर डाला। आज भी मैं कई ऐसी महिलाओं से मिलता हूं जो आईएएस, आईपीएस और विदेश सेवा जैसे अहम पदों पर हैं, और वे मानती हैं कि 'उड़ान' ने ही उन्हें आगे बढ़ने और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने की प्रेरणा दी थी।"

उन्होंने कहा, ''यही वजह है कि 'उड़ान' जैसे धारावाहिक आज भी प्रासंगिक हैं। उस दौर का टेलीविजन मूल्यों से भरा हुआ था। कहानियों में संघर्ष था। साथ ही उम्मीद और दिशा भी थी। आज जब समाज में कई तरह की दरारें और तनाव हैं, तब हमें फिर से ऐसे कंटेंट की तलाश करनी चाहिए, जो लोगों को जोड़ सके और सही रास्ता दिखा सके।''

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