तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे प्रमुख आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के चयन में चीन हमेशा से हस्तक्षेप करता रहा है। दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप का कहना है कि यदि चीन 15वें दलाई लामा को भी इसी तरह नियंत्रित करने की कोशिश करता है, तो उसे पहले वाले परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक नेताओं की मान्यता लोगों की आस्था से आती है, सरकार के आदेश से नहीं। चीन को पंचेन लामा वाले अनुभव से सीख लेनी चाहिए कि जबरन थोपे गए धार्मिक नेता लोगों में सम्मान और स्वीकार्यता नहीं पा सकते।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने 1995 में छह वर्षीय लड़के गेधुन चोएक्यी न्यिमा का अपहरण कर लिया था, जिन्हें 14वें दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा के रूप में मान्यता दी थी। चीन ने उनकी जगह ग्याइनकैन नोरबू को नियुक्त किया था।
खेदरूब थोंडुप ने अमेरिकी पत्रिका 'जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी' में लिखा है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा 11वें पंचेन लामा ग्याइनकैन नोरबू की नियुक्ति एक असफल उदाहरण साबित हुई है। इससे यह साबित होता है कि किसी धार्मिक नेता की वैधता जबरदस्ती नहीं थोपी जा सकती और न ही कृत्रिम रूप से बनाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि लगभग 30 साल बाद भी ग्याइनकैन नोरबू को तिब्बती जनता, बौद्ध समुदाय या धार्मिक जगत में वास्तविक मान्यता नहीं मिली है। उनकी पहचान केवल चीनी सरकार द्वारा समर्थित व्यक्ति के रूप में है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन पहले ही संकेत दे चुका है कि वह 14वें दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन को नियंत्रित करना चाहता है और उसका कहना है कि 15वें दलाई लामा को सरकारी मंजूरी लेनी होगी।
थोंदुप का कहना है कि चीन 'गोल्डन अर्न' प्रणाली का हवाला देता है, लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से कमजोर तर्क है। दलाई लामा केवल धार्मिक नेता नहीं हैं, बल्कि करुणा, अहिंसा और संघर्ष के प्रतीक भी हैं।
यदि चीन अपने पसंद के किसी व्यक्ति को दलाई लामा घोषित करता है, तो दुनिया उसे आध्यात्मिक नेता नहीं बल्कि राजनीतिक कठपुतली के रूप में देखेगी। इससे चीन की विश्वसनीयता कम होगी और एशिया के बौद्ध समुदायों में नाराजगी बढ़ेगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तिब्बतियों ने वर्षों से सांस्कृतिक दमन, धार्मिक प्रतिबंध और राजनीतिक उपेक्षा का सामना किया है, लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान को बचाकर रखा है।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि चीन द्वारा किसी व्यक्ति को दलाई लामा घोषित किया जाता है, तो उसे एक आध्यात्मिक गुरु के बजाय राजनीतिक कठपुतली के रूप में देखा जाएगा। इससे चीन की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचेगा और एशिया के बौद्ध समुदायों में नाराजगी बढ़ेगी। यह प्रभाव मंगोलिया से लेकर श्रीलंका, नेपाल और जापान तक महसूस किया जा सकता है। इसके रणनीतिक और कूटनीतिक परिणाम भी दूरगामी होंगे।
तिब्बत पहले से ही चीन के भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। दलाई लामा की वैश्विक प्रतिष्ठा के कारण उनके उत्तराधिकारी के चयन पर दुनियाभर की सरकारों और नागरिक संगठनों की नजर रहेगी। अगर चीन दलाई लामा नियुक्ति का कदम उठाता है तो इससे अंतरराष्ट्रीय आलोचना बढ़ेगी, अविश्वास गहराएगा और चीन के कूटनीतिक संबंध और अधिक जटिल हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इससे स्थिरता आने के बजाय विवाद और संघर्ष बढ़ने की आशंका है।
रिपोर्ट में यह भी जोर दिया गया है कि दशकों के चीनी दमन के बावजूद तिब्बती पहचान को समाप्त नहीं किया जा सका है। तिब्बती लोगों ने सांस्कृतिक मिटाने के प्रयासों, धार्मिक प्रतिबंधों और राजनीतिक उपेक्षा का सामना किया है, फिर भी उन्होंने अपनी परंपराओं, भाषा और धार्मिक आस्था को सुरक्षित रखा है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पंचेन लामा के मामले में किया गया प्रयोग तिब्बती पहचान और आस्था की मजबूती को दर्शाता है। सरकारी नियंत्रण के बावजूद तिब्बतियों ने चीन द्वारा समर्थित आध्यात्मिक नेता को स्वीकार नहीं किया। रिपोर्ट का दावा है कि यही दृढ़ता और प्रतिरोध दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन के समय भी देखने को मिलेगा। [SP]
(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)