यूरोप (Europe) में इन दिनों सूरज की तपिश सिर्फ लोगों को परेशान नहीं कर रही, बल्कि जान भी ले रही है। कई देशों में 40°C के आसपास पहुंचा तापमान सैकड़ों लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। दूसरी ओर भारत में हर साल कई शहर 45 से 50°C तक की भीषण गर्मी झेलते हैं, फिर भी यहां हालात यूरोप जैसे क्यों नहीं बनते? क्या इसकी वजह सिर्फ तापमान है, या फिर इसके पीछे मौसम, लोगों की जीवनशैली, घरों की बनावट और शरीर की गर्मी सहने की क्षमता भी अहम भूमिका निभाती है? आइए जानते हैं कि आखिर भारत और यूरोप की गर्मी में इतना बड़ा फर्क क्यों देखने को मिलता है।
यूरोप (Europe) इस समय भीषण हीटवेव (Heat Wave) की चपेट में है, जहां 40°C के आसपास पहुंचा तापमान भी लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। फ्रांस (France), इटली (Italy), स्पेन (Spain), जर्मनी (Germany), पुर्तगाल (Portugal) और बाल्कन देशों समेत कई हिस्सों में रेड अलर्ट जारी है, जबकि कई शहरों में जून महीने के अब तक के सबसे अधिक तापमान दर्ज किए गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 21 जून के बाद से पूरे यूरोप में गर्मी से जुड़ी 1,300 से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की जा चुकी हैं और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। कई जगह स्कूल बंद हैं, जंगलों में आग लगी है, सड़कें पिघल रही हैं और अस्पतालों पर मरीजों का दबाव बढ़ गया है। ऐसे में यह हीटवेव केवल मौसम नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य और जलवायु संकट बन गई है।
पहली नजर में यह सवाल हर किसी के मन में आता है कि जब भारत में हर साल कई शहरों का तापमान 45 से 50°C (Temprature In India) तक पहुंच जाता है, तो यूरोप में 40°C के (Temprature In Europe) आसपास ही इतनी बड़ी तबाही क्यों मच जाती है? इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि लोगों के शरीर की गर्मी सहने की क्षमता और वहां का मौसम है। भारत के लोग लंबे समय से तेज गर्मी के आदी हैं, इसलिए उनका शरीर ऐसी परिस्थितियों के अनुसार खुद को काफी हद तक ढाल चुका है। वहीं यूरोप का मौसम आमतौर पर ठंडा रहता है, इसलिए वहां के लोग इतनी भीषण गर्मी के अभ्यस्त नहीं हैं। जब अचानक तापमान कई डिग्री बढ़ जाता है, तो शरीर खुद को जल्दी अनुकूलित (Adapt) नहीं कर पाता। इसका सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है, जिससे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और मौत का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
यूरोप में हीटवेव (Heat Wave In Europe) के जानलेवा असर की एक बड़ी वजह वहां के घरों की बनावट और बुजुर्ग आबादी भी है। अधिकांश यूरोपीय घर ठंड से बचाने के लिए बनाए गए हैं, इसलिए उनमें मोटी दीवारें, कम वेंटिलेशन और सीमित एयर कंडीशनिंग की व्यवस्था होती है। ऐसे में दिनभर की गर्मी घरों के अंदर कैद हो जाती है और रात में भी तापमान ज्यादा बना रहता है, जिससे लोगों को राहत नहीं मिल पाती। दूसरी ओर, यूरोप में बुजुर्गों की आबादी भारत की तुलना में कहीं अधिक है। बढ़ती उम्र के साथ शरीर की गर्मी सहने की क्षमता कम हो जाती है, जबकि हार्ट, फेफड़ों और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए हीटवेव और भी खतरनाक साबित होती है। इसके मुकाबले भारत की आबादी अपेक्षाकृत युवा है और यहां के लोग लंबे समय से गर्म मौसम के अभ्यस्त हैं, इसलिए गर्मी का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं पड़ता।
यूरोप में हीटवेव (Heat Wave In Europe) के लंबे समय तक बने रहने की एक बड़ी वजह 'ओमेगा ब्लॉक' (Omega Block) नाम की मौसम संबंधी स्थिति है। इसमें वायुमंडल में उच्च दबाव (हाई प्रेशर) का एक मजबूत क्षेत्र ग्रीक अक्षर Ω (ओमेगा) जैसा आकार बना लेता है, जो गर्म हवा को एक ही जगह पर फंसा देता है। इसके कारण ठंडी हवाएं और बारिश उस क्षेत्र तक नहीं पहुंच पातीं। यही वजह है कि दिन के साथ-साथ रात में भी तापमान ज्यादा बना रहता है और लोगों को राहत नहीं मिलती। लगातार कई दिनों तक बनी रहने वाली यह गर्मी शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालती है, जिससे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
यह मान लेना गलत होगा कि भारत हीटवेव (Heat Wave In India) के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित है। हर साल देश के कई राज्यों में भीषण गर्मी और लू (Loo) के कारण लोगों की जान जाती है, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कई मामलों में मौतों का सही रिकॉर्ड सामने नहीं आ पाता। जलवायु परिवर्तन के चलते भविष्य में भारत में भी हीटवेव की तीव्रता और अवधि बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में सतर्क रहना और समय रहते बचाव करना बेहद जरूरी है। गर्मी के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें, दोपहर 12 से 4 बजे के बीच तेज धूप में निकलने से बचें, हल्के और सूती कपड़े पहनें तथा शरीर में पानी की कमी न होने दें। खासकर बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखें। छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर ही हीटवेव के गंभीर खतरे से काफी हद तक बचा जा सकता है।
यूरोप और भारत की गर्मी में फर्क सिर्फ तापमान का नहीं, बल्कि मौसम, जीवनशैली, घरों की बनावट, स्वास्थ्य व्यवस्था और लोगों की तैयारी का भी है। यही कारण है कि 40°C की गर्मी यूरोप में जानलेवा साबित हो सकती है, जबकि भारत में लोग अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से इसका सामना कर लेते हैं। हालांकि जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ती हीटवेव पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। ऐसे में भारत समेत हर देश को समय रहते तैयारी और बचाव के उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। [SP]