पश्चिम बंगाल के मंतेश्वर सीट का चुनाव परिणाम सामना आ चुका है। इस सीट से भाजपा उम्मीदवार सैकत पांजा ने 2021 में मिली हार का बदला ले लिया है। उन्होंने टीएमसी के दिग्गज नेता और पश्चिम बंगाल सरकार में जन शिक्षा विस्तार एवं पुस्तकालय सेवाओं के प्रभारी मंत्री रहे सिद्दीकुल्लाह चौधरी को 14798 मतों की अंतर से हरा दिया है।
इस सीट पर हुए चुनाव में भाजपा के सैकत पांजा को 96, 559 वोट मिले। वहीं, टीएमसी के चौधरी सिद्दिकुल्ला को 81, 761 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के अनुपम घोष को 18192 वोट मिले।
चौधरी सिद्दीकुल्लाह टीएमसी उम्मीदवार के तौर पर मंतेश्वर सीट से मैदान में थे। उनकी उम्र 76 साल है और उनकी शैक्षिक योग्यता पोस्ट ग्रेजुएट है। उन पर एक केस दर्ज है। सिद्दीकुल्लाह चौधरी की कुल संपत्ति 1.8 करोड़ है, जबकि उन पर 0 रुपए की देनदारी है।
पूर्व बर्धमान जिले में स्थित मंतेश्वर विधानसभा सीट एक सामान्य श्रेणी की सीट है। 2009 के परिसीमन के बाद यह सीट बर्धमान-दुर्गापुर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बना। इससे पहले, यह कटवा लोकसभा सीट के अंतर्गत आती थी। यह निर्वाचन क्षेत्र मंतेश्वर सामुदायिक विकास खंड की 10 ग्राम पंचायतों और मेमारी 2 ब्लॉक की 7 ग्राम पंचायतों को मिलाकर बना है, जो पूरी तरह ग्रामीण चरित्र को दर्शाता है। कभी टीएमसी में रहे सैकत पांजा ने 2021 में भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन टीएमसी के सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने 31,508 वोटों से सैकत पांजा को हरा दिया था।
1951 में अस्तित्व में आई इस सीट का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। अब तक हुए 19 विधानसभा चुनावों (2016 के उपचुनाव सहित) में वाम मोर्चा ने लंबे समय तक दबदबा बनाए रखा और 11 बार जीत दर्ज की। इनमें सीपीआई(एम) की 10 जीत और 1962 में अविभाजित सीपीआई की एक जीत शामिल है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने भी यहां तीन-तीन बार जीत हासिल की, जबकि एक बार एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की।
हाल के वर्षों में यह सीट राजनीतिक रूप से और भी ज्यादा चर्चा में रही। 2016 के उपचुनाव में सैकत पांजा ने बड़ी जीत दर्ज की, लेकिन 2021 के चुनाव से पहले उनके बीजेपी में शामिल होने के बाद मुकाबला त्रिकोणीय हो गयाऔर उन्हें तृणमूल कांग्रेस के सिद्दीकुल्लाह चौधरी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। टीएमसी का दामन छोड़कर भाजपा में पांजा के आने से भाजपा को यहां मुख्य चुनौती के रूप में उभरने का मौका मिला।
मतदाताओं के लिहाज से भी मंतेश्वर सीट अहम है। 2021 में यहां 2,42,229 पंजीकृत मतदाता थे, जो 2019 के 2,33,450 से ज्यादा थे। सामाजिक संरचना में मुसलमान मतदाता 32.30 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा वर्ग हैं, जबकि अनुसूचित जाति के 23.88 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के 8.41 प्रतिशत मतदाता हैं। यहां मतदान प्रतिशत भी लगातार ऊंचा रहा है।
भौगोलिक रूप से मंतेश्वर बर्धमान के उपजाऊ मैदानों में बसा है, जहां खेती मुख्य आजीविका का साधन है। ब्रिटिश काल में बनी दामोदर नहर आज भी सिंचाई की रीढ़ है, जबकि भागीरथी नदी का प्रवाह इस क्षेत्र की कृषि पद्धतियों को प्रभावित करता है। यहां धान, जूट, सरसों और सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इसके अलावा, डेयरी फार्मिंग और छोटे व्यवसाय भी अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से भी क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार हुआ है। यहां की सड़क कनेक्टिविटी कालना, मेमारी और कटवा जैसे शहरों से जुड़ी हुई है, जबकि रेल सेवा हावड़ा-बर्धमान मेन लाइन के मेमारी और निगन स्टेशनों के जरिए उपलब्ध है। शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल और स्थानीय कॉलेज मौजूद हैं, वहीं स्वास्थ्य सेवाएं ग्रामीण हेल्थ सेंटर और कालना के सब-डिवीजनल अस्पताल पर निर्भर हैं।
मंतेश्वर का जिक्र इतिहास के पन्नों में भी मिलता है। ब्रिटिश शासन के दौरान यह कालना सब-डिवीजन का एक अहम पुलिस स्टेशन क्षेत्र था और 1910 के पीटरसन डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में इसका उल्लेख किया गया है। 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में भी यहां की स्थानीय समितियां सक्रिय रहीं और राष्ट्रवादी गतिविधियों में हिस्सा लिया।
भौगोलिक दृष्टि से अगर हम बात करें तो इसके आसपास कालना, मेमारी और कटवा जैसे शहर हैं, जबकि जिला मुख्यालय बर्धमान 40 किमी दूर है। राज्य की राजधानी कोलकाता यहां से लगभग 110 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा यह क्षेत्र नादिया, हुगली, बीरभूम और मुर्शिदाबाद जिलों से भी सटा हुआ है, जिससे इसकी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और अहमियत बढ़ जाती है। [SP]
(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)