ममता बनर्जी की राजनीति लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में अजेय मानी जाती रही, लेकिन विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने इस छवि को झटका दे दिया। करीब एक दशक से ज्यादा समय तक सत्ता में रहने के बाद, उनकी पकड़ पहली बार इतनी कमजोर दिखी कि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2011, 2016 और 2021 के चुनावों में जहां TMC (All India Trinamool Congress) ने लगातार जीत दर्ज की, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) हर बार कोशिश के बावजूद सत्ता तक नहीं पहुंच सकी। लेकिन इस बार समीकरण बदल गए बीजेपी ने 208 सीट जीतकर जीत हासिल कर सियासी माहौल ही बदल दिया, जबकी टीएमसी को सिर्फ 90 वोट मिले| तुष्टीकरण से लेकर ‘कट मनी’ जैसे आरोपों ने जनता के बीच नाराजगी को बढ़ाया, जिसका असर चुनाव नतीजों में साफ दिखा। यह हार सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि बदलते जनमत और राजनीतिक संकेतों की कहानी बन गई। तो आईए जानते हैं कि आखिर ममता बनर्जी की वह कौन सी गलतियां थी जिसकी वजह से उनके हाथ से बंगाल की सत्ता चली गई।
आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (RG Kar Medical College and Hospital) में हुई यह घटना पूरे देश को झकझोर देने वाली थी। यह मामला 9 अगस्त 2024 को सामने आया, जब एक महिला जूनियर डॉक्टर का शव अस्पताल परिसर के अंदर संदिग्ध हालत में मिला। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि उनके साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की गई थी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टर रात की ड्यूटी खत्म करने के बाद अस्पताल के सेमिनार हॉल में आराम करने गई थीं, जहां यह वारदात हुई। अगले दिन सुबह जब उनका शव मिला तो पूरे बंगाल में हड़कंप मच गया और मेडिकल स्टाफ ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच पहले राज्य पुलिस ने शुरू की, लेकिन बाद में इसे Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंप दिया गया। जांच के दौरान पुलिस ने मुख्य आरोपी संजय रॉय (Civic Volunteer) को गिरफ्तार किया। जांच में उसके खिलाफ कई सबूत मिले, जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और मामला अदालत में विचाराधीन है।
पश्चिम बंगाल का शिक्षक भर्ती घोटाला WBSSC भर्ती घोटाला ममता सरकार के लिए सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक बन गया। इस मामले की शुरुआत 2022 में हुई, जब WBSSC (West Bengal School Service Commission) के जरिए हुई शिक्षक और गैर-शिक्षक भर्ती में भारी अनियमितताओं के आरोप सामने आए। आरोप था कि हजारों योग्य उम्मीदवारों को नजरअंदाज कर पैसों, राजनीतिक पहुंच और सिफारिश के आधार पर नियुक्तियां दी गईं। जांच में मेरिट लिस्ट में छेड़छाड़, OMR शीट बदलने और नियमों को ताक पर रखकर नियुक्तियां देने जैसे गंभीर खुलासे हुए।
अप्रैल 2025 में भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 25,000 से ज्यादा शिक्षकों और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दीं। कोर्ट ने पूरी चयन प्रक्रिया को भ्रष्टाचार से ग्रस्त बताया। इस घोटाले में कई बड़े नाम सामने आए। सबसे प्रमुख नाम पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी (Partha Chatterjee) का रहा, जिन्हें जांच एजेंसियों ने मुख्य आरोपी बनाया। उनके करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी (Arpita Mukherjee) के ठिकानों से करोड़ों रुपये नकद बरामद हुए और मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।
इसके अलावा पूर्व SSC चेयरमैन सुबीरेश भट्टाचार्य (Subiresh Bhattacharya), कथित मिडिलमैन प्रसन्ना कुमार रॉय (Prasanna Kumar Roy) और एजेंट चंदन मंडल (Chandan Mondal) के नाम भी जांच में सामने आए। जांच एजेंसियों के मुताबिक इन लोगों पर अवैध नियुक्तियों के बदले पैसे इकट्ठा करने और भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप हैं। आज भी हजारों शिक्षक नौकरी जाने के बाद सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि ED और CBI की जांच जारी है। सरकार ने राहत और पुनर्नियुक्ति के आश्वासन दिए, लेकिन जनता के मन में उठे भ्रष्टाचार के सवाल शांत नहीं हुए। यही शिक्षक भर्ती घोटाला धीरे-धीरे सरकार की साख पर गहरी चोट बन गया और चुनावी माहौल में जनता के गुस्से का बड़ा कारण साबित हुआ।
सिंडिकेट और “कट मनी” का मुद्दा धीरे-धीरे ममता सरकार के खिलाफ सबसे मजबूत नैरेटिव बन गया। बंगाल (West Bengal) में 2016 के बाद से ही यह आरोप जोर पकड़ने लगा कि स्थानीय स्तर पर All India Trinamool Congress के कुछ नेता और कार्यकर्ता हर सरकारी काम जैसे घर बनवाना, सड़क निर्माण या किसी योजना का लाभ लेने के बदले कमीशन मांगते हैं। लोगों ने इसे “कट मनी कल्चर” नाम दिया।
इसके साथ ही “सिंडिकेट” का जिक्र भी खूब हुआ, जहां आरोप लगे कि निर्माण से लेकर फिल्म इंडस्ट्री तक में कुछ खास समूहों का दबदबा है और बिना उनकी मंजूरी के कोई काम नहीं हो पाता। भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और जनता के बीच यह बात बैठाने में कामयाब रही कि राज्य में कैडर आधारित दबाव और गुंडागर्दी बढ़ गई है। नौकरियों की कमी, बड़े उद्योगों का न आना और रोजमर्रा के कामों में कथित भ्रष्टाचार ने आम लोगों की नाराजगी को और बढ़ा दिया। फिलहाल अभी यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है और आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। यही सिंडिकेट और कट मनी का आरोप जनता के गुस्से का बड़ा कारण बना और इसी वजह से इस बार चुनाव में ममता बनर्जी की जमीन खिसक गई।
अल्पसंख्यक वोटों में आई दरार भी इस चुनाव में ममता बनर्जी की मुश्किलों की बड़ी वजह बनी। लंबे समय तक ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और उनकी पार्टी TMC खुद को बंगाल के अल्पसंख्यक समुदाय की सबसे मजबूत राजनीतिक आवाज बताती रही। खासकर बंगाल (West Bengal) के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और बीरभूम जैसे जिलों में टीएमसी का यह वोट बैंक बेहद मजबूत माना जाता था। लेकिन 2024–2025 के दौरान पार्टी के भीतर असंतोष और स्थानीय राजनीतिक बदलावों ने इस समीकरण को बदलना शुरू कर दिया।
सबसे ज्यादा चर्चा हुमायूं कबीर (Humayun Kabir) जैसे नेताओं के बागी तेवरों को लेकर रही, जिन्होंने कई बार पार्टी लाइन से अलग बयान देकर संगठन के भीतर खींचतान को खुलकर सामने ला दिया। वहीं शेख सुफियान (Sheikh Sufiyan) और कुछ स्थानीय जिला स्तर के प्रभावशाली नेताओं के समर्थकों में भी असंतोष देखने को मिला, जिसका असर बूथ स्तर की एकजुटता पर पड़ा। दूसरी तरफ, अब्बास सिद्दीकी (Abbas Siddiqui) की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (Indian Secular Front) ने कई मुस्लिम बहुल सीटों पर उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया।
मुर्शिदाबाद, भांगड़, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे इलाकों में स्थानीय मुस्लिम वोट टीएमसी, आईएसएफ और कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच बंटता दिखाई दिया। इसी दौरान BJP ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर जोर दिया, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया।
नतीजा यह हुआ कि जिन सीटों पर पहले टीएमसी को अल्पसंख्यक वोटों का सीधा और मजबूत फायदा मिलता था, वहां इस बार बगावत, स्थानीय असंतोष और नए राजनीतिक चेहरों की वजह से वोटों का बंटवारा हुआ। यही बदलता समीकरण और अल्पसंख्यक वोट बैंक में आई दरार ममता बनर्जी के लिए इस चुनाव में बड़ा झटका साबित हुई।
विकास और शासन से भटककर राजनीति पर ज्यादा ध्यान देना भी ममता बनर्जी की हार की बड़ी वजह माना गया। ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने 2011 में वामपंथी सरकार को हराकर पश्चिम बंगाल (West Bengal) में सत्ता संभाली थी, और शुरुआत में लोगों को बदलाव की उम्मीद भी दिखी। लेकिन धीरे-धीरे उनकी राजनीति का फोकस बदलता गया। 2019 के बाद खासकर केंद्र की नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार के साथ उनका टकराव बढ़ा। “बाहरी बनाम मां, माटी और मानुष” जैसे नारों के जरिए उन्होंने राजनीतिक माहौल को ज्यादा आक्रामक बना दिया। आरोप लगा कि राज्य के अंदरूनी विकास जैसे उद्योग, रोजगार और शहरी सुविधाओं की बजाय राष्ट्रीय राजनीति पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा।
इसके साथ ही पार्टी के अंदर भी अनुशासन की कमी की बातें सामने आईं, जहां टीएमसी के कुछ नेता सरकार से ज्यादा प्रभावशाली दिखने लगे। शहरों के पढ़े-लिखे और युवा वर्ग को यह रवैया असहज लगा। वहीं, बीजेपी को घेरने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर लगातार बयानबाजी भी होती रही, जिससे ध्रुवीकरण और बढ़ा। राज्य में यही बहस जारी है कि विकास पीछे छूट गया और राजनीति आगे निकल गई यही वजह इस बार चुनाव में ममता बनर्जी की हार का कारण बन गई।
कभी अजेय मानी जाने वाली ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की राजनीति को इस बार जनता ने साफ संदेश दिया है कि विकास, पारदर्शिता और भरोसा सबसे ऊपर हैं। बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां पुराने समीकरण टूट रहे हैं और नई सोच जगह बना रही है। यह हार एक सवाल भी छोड़ जाती है कि क्या ममता बनर्जी वापसी के लिए खुद को बदलेंगी, या बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह नई दिशा में आगे बढ़ेगी? आने वाला समय ही इसका जवाब देगा, लेकिन इतना तय है कि इस चुनाव ने सत्ता की नींव हिला कर रख दी है। [SP]