वैचारिक मतभेदों के कारण 1972 में एमजीआर ने अपनी अलग पार्टी AIADMK बनाई, जिससे तमिलनाडु में 'द्वि-ध्रुवीय' (Two-party) राजनीति की शुरुआत हुई। X
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026

पटकथा से राजनीति के शिखर तक: कैसे 'राजनीति के हीरो' बने करुणानिधि और एमजीआर? जानिए द्रविड़ राजनीति का पूरा इतिहास

तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा और पटकथा का गहरा प्रभाव रहा है। एम. करुणानिधि (कलाइग्नार) एक प्रखर पटकथा लेखक और नास्तिक नेता थे, जबकि एमजी रामचंद्रन (MGR) जनता के बीच 'मक्कल थिलागम' (जनता का रत्न) के रूप में जाने गए थे।

Author : Pradeep Yadav

  • तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा और पटकथा का गहरा प्रभाव रहा है। एम. करुणानिधि (कलाइग्नार) एक प्रखर पटकथा लेखक और नास्तिक नेता थे, जबकि एमजी रामचंद्रन (MGR) जनता के बीच 'मक्कल थिलागम' (जनता का रत्न) के रूप में जाने गए थे। दोनों ने सी.एन. अन्नादुराई के नेतृत्व वाली DMK में एक साथ काम किया, लेकिन वैचारिक मतभेदों के कारण 1972 में एमजीआर ने अपनी अलग पार्टी AIADMK बनाई, जिससे राज्य में 'द्वि-ध्रुवीय' (Two-party) राजनीति की शुरुआत हुई।

23 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु के 234 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होने वाले हैं। सभी प्रमुख गठबंधनों के लिए चुनावी मैदान तैयार है और मौजूदा द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम के नेतृत्व वाला धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (एआईएडीएमके) के नेतृत्व वाला गठबंधन चुनावी समर में आमने-सामने हैं। दोनों तरफ से चुनावी रैलियाँ ताबड़तोड़ हो रही हैं। 

एम.के. स्टालिन द्वारा 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की विरासत को आगे बढ़ाते हुए जीत हासिल करने से बहुत पहले ही राज्य का राजनीतिक परिदृश्य आकार ले चुका था। इसका श्रेय काफी हद तक एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और एम. करुणानिधि को जाता है, जो तमिलनाडु की राजनीति के दो दिग्गज नेता थे जिन्होंने द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (एआईएडीएमके) के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

तमिल फिल्म उद्योग और द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम में एक साथ काम करने से लेकर कट्टर प्रतिद्वंद्वी बनने तक, एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और एम. करुणानिधि तमिल समुदाय में "भगवान" के रूप में कैसे पूजनीय बन गए?

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एम. करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन कैसे बने राजनीति के हीरो 

सी.एन. अन्नादुराई ने 1949 में डीएमके की स्थापना की, जो भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता पेरियार ई.वी. रामासामी के द्रविड़ कज़गम से प्रभावित एक गुट था। अन्नादुराई के नेतृत्व में, डीएमके भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलावा पहली ऐसी राजनीतिक पार्टी बनी जिसने राज्य स्तरीय चुनाव में बहुमत से जीत हासिल की। 

1969 में अन्नादुराई के निधन के बाद, एम. करुणानिधि डीएमके के अध्यक्ष बने और 2018 में अपनी मृत्यु तक इस पद पर बने रहे। एम. करुणानिधि को  कलाइग्नार (कलाकार) के नाम से भी जाना जाता था और वो एक नास्तिक थे। वे एक भारतीय पटकथा लेखक और राजनीतिज्ञ थे, जो बाद में तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में सबसे शक्तिशाली और अमिट शक्तियों में से एक बन गए। उन्होंने पराशक्ति (1952), मनोहरा (1954) और पनम (1952) जैसी प्रमुख तमिल फिल्मों की पटकथाएँ लिखीं, जिनमें दिग्गज अभिनेता शिवाजी गणेशन ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

इसी दरमियान, करुणानिधि के करीबी लोगों में से एक और शख्सियत राजनीति में उभर रहे थे जिनका नाम  एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) था। जनता के बीच वे मक्कल थिलागम अर्थात ‘जनता का रत्न’ के नाम से जाने जाते थे। 

एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) को तमिल फिल्म उद्योग की सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक माना जाता है। वे एक अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे, जिन्होंने बाद में राजनीति में कदम रखा। शुरुआत में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे, लेकिन बाद में अपने मित्र एम. करुणानिधि के साथ ही सीएन अन्नादुरई की डीएमके में शामिल हो गए। करुणानिधि ने एमजीआर की फिल्म राजकुमारी (1947) की पटकथा भी लिखी थी।

एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और एम. करुणानिधि ने द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम में एक साथ काम किया, लेकिन यह समय अधिक लंबा नहीं चला। जिस तरीके से दो तलवार एक म्यान में नहीं रह सकते, उसी तरीके से दोनों के मजबूत व्यक्तित्व और वैचारिक मतभेदों के कारण उनका विभाजन हो गया, जिससे तमिलनाडु की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। इसके बाद जो हुआ वह अपरिहार्य था क्योंकि एमजीआर ने 1972 में अपनी खुद की नई राजनीतिक पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (AIADMK) का गठन किया। 

एम. करुणानिधि ने 1969 से लेकर 2018 में अपनी मृत्यु तक डीएमके के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके बाद उनके बेटे एम.के. स्टालिन ने पदभार संभाला , जो वर्तमान में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हैं।

करुणानिधि के नाम कई रिकॉर्ड हैं, जिनमें राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी शामिल है। वे पहली बार 1969 से 1976 तक मुख्यमंत्री रहे और इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल (भारत 1975-1977) के सबसे मुखर विरोधियों में से एक थे। हालांकि, 1977 के विधानसभा चुनाव में उनका दबदबा कायम नहीं रह सका। उस समय तक एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने नवगठित एआईएडीएमके के अध्यक्ष के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर लिया था। एमजीआर ने एम. करुणानिधि को 1977 के चुनाव में हराकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का पद हासिल किया। 

एम. करुणानिधि 1987 में एम.जी. रामचंद्रन (एम.जी.आर.) की मृत्यु तक सत्ता से बाहर रहे। एम.जी.आर. ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया और अपने नेतृत्व और परोपकारी कार्यों से जनता का दिल जीत लिया। उन्होंने 1978 में राज्य में 10+2 शिक्षा प्रणाली शुरू की और उच्च माध्यमिक शिक्षा को स्कूली शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया। उनकी नीतियों ने स्कूली प्रयोगशालाओं में सुधार किया और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को अधिक सुलभ बनाया।

इन दोनों उद्योगपतियों ने तमिलनाडु की  राजनीति को नई  दिशा दी और अपने राजनीतिक जीवन में और अपनी मृत्यु के बाद भी लोगों के दिलों पर राज किया।

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