भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda) X
महाराष्‍ट्र

गुमनामी से सम्मान के शिखर तक: 92 वर्षीय आदिवासी कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा की प्रेरणादायक कहानी

महाराष्ट्र के पालघर जिले की जव्हार तालुका के वाळवंडा (Walvanda) गांव के रहने वाले 92 वर्षीय वयोवृद्ध आदिवासी लोक कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda) की कहानी बेहद प्रेरणादायक है।

Author : Sarita Prasad

भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला पद्म श्री पुरस्कार (Padma Shri Award) देश के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में से एक माना जाता है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर घोषित होने वाले इन पुरस्कारों की इस बार की सूची में एक ऐसा नाम शामिल हुआ, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह नाम है भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda)। महाराष्ट्र के पालघर जिले के एक सुदूर आदिवासी गांव से निकलकर देश के सर्वोच्च मंच तक पहुँचने वाले भिक्ल्या जी की कहानी केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन लोक संस्कृति और अनमोल विरासत को जिंदा रखने के संघर्ष की एक अद्भुत मिसाल है।

पद्म पुरस्कार: 'पीपुल्स पद्म' और जमीनी नायकों की पहचान

पद्म पुरस्कारों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री। इनमें से पद्म श्री चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने इन पुरस्कारों को "पीपुल्स पद्म" (People's Padma) का रूप दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य उन जमीनी और 'अनसंग हीरोज' (गुमनाम नायकों) को पहचान दिलाना है जो बिना किसी चकाचौंध या बड़े प्रचार के, वर्षों से समाज, कला और देश की सेवा में लगे हुए हैं। भिक्ल्या ढिंडा को यह सम्मान मिलना इसी दूरदर्शिता का प्रतीक है।

कौन हैं भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा?

आदिवासी लोक कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda) की कहानी

महाराष्ट्र के पालघर जिले की जव्हार तालुका के वाळवंडा (Walvanda) गांव के रहने वाले 92 वर्षीय वयोवृद्ध आदिवासी लोक कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda) की कहानी बेहद प्रेरणादायक है। पिछले 150 वर्षों और लगभग चार पीढ़ियों से उनका परिवार इस पारंपरिक कला को सहेजने का काम कर रहा है, जिसमें उनके दादा नवसू धकल्या ढिंडा और पिता लाडक्या धकल्या ढिंडा भी अपने समय के बेहद प्रसिद्ध कलाकार रहे थे। भिक्ल्या जी का इस कला से नाता तब जुड़ा जब वे मात्र 10 वर्ष के थे और जंगलों व खेतों में अपने मवेशियों को चराने के दौरान उन्होंने इसे सीखना और बजाना शुरू किया था। आज जीवन के इस पड़ाव पर भी वे उसी अद्वितीय ऊर्जा और उत्साह के साथ विभिन्न मंचों पर अपनी प्रस्तुति देकर इस अमूल्य लोक संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं।

क्या है 'तारपा' वाद्य यंत्र, जिसे भिक्ल्या जी ने दिलाई वैश्विक पहचान?

'तारपा' (Tarpa)

भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda) को पद्म श्री सम्मान महाराष्ट्र की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर 'तारपा' (Tarpa) नाम के एक अत्यंत दुर्लभ और पारंपरिक वाद्य यंत्र को संरक्षित करने और उसे जीवंत बनाए रखने के लिए दिया गया है। अगर इस अनोखे वाद्य यंत्र की बनावट की बात करें, तो यह लगभग 5 फीट लंबा होता है, जिसे फूंक मारकर (हवा के दबाव से) बजाया जाता है। इसे सूखी लौकी (दूधी या कद्दू), ताड़ के पत्ते और बांस के टुकड़ों की मदद से बेहद कलात्मक और प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जाता है। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से तारपा संगीत का महत्व अतुलनीय है; यह महाराष्ट्र के वारली (Warli) और अन्य स्थानीय आदिवासी समुदायों के रीति-रिवाजों, कटाई के त्योहारों और लोक नृत्यों की असली जान माना जाता है। इस वाद्य यंत्र की जादुई धुन बजते ही पूरा कबीला और ग्रामीण एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक घेरे में पारंपरिक नृत्य करने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जो उनके आपसी भाईचारे और सामूहिक उल्लास को दर्शाता है।

क्यों मिला पद्म श्री? कला को बचाने का सात दशकों का संघर्ष

आज के आधुनिक युग में जहां पश्चिमी और इलेक्ट्रॉनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक लोक कलाएं दम तोड़ रही हैं, वहीं भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा (Bhiklya Ladkya Dhinda) जी ने पिछले सात दशकों से भी अधिक समय से इस अनमोल विरासत को अकेले दम पर जीवित रखा है। अपने पूरे जीवन में गंभीर आर्थिक तंगहाली और संघर्षों का सामना करने के बावजूद वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं, बल्कि अधिक आय वाली नौकरियों के प्रलोभन को ठुकराकर उन्होंने अपनी आदिवासी संस्कृति और संगीत को ही सर्वोपरि चुना। कला के प्रति उनकी इसी निस्वार्थ भावना का परिणाम है कि वे आने वाली पीढ़ी को भी तारपा संगीत की बिल्कुल मुफ्त ट्रेनिंग दे रहे हैं, ताकि यह प्राचीन लोक कला भविष्य में कभी लुप्त न हो जाए। पद्म श्री सम्मान मिलने से पहले भी कला के क्षेत्र में उनके इस ऐतिहासिक योगदान को सराहा जा चुका है, जिसके तहत उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 'तारपा शिरोमणि' और 'सांस्कृतिक सेनानी' जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

सम्मान पर क्या कहा भिक्ल्या ढिंडा ने?

अपनी सादगी और खुशी जाहिर करते हुए भिक्ल्या जी ने कहा: "मैं बहुत खुश हूँ कि भारत सरकार ने तारपा संगीत के लिए पद्म श्री पुरस्कार की घोषणा की है। इस सम्मान ने न केवल मुझे, बल्कि हमारे पूरे आदिवासी समाज, जव्हार तहसील और पालघर जिले का गौरव बढ़ाया है। तारपा हमारी आदिवासी संस्कृति का अनमोल उपहार है, और यह पुरस्कार मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।" [SP]